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Tuesday, September 25, 2018



            _*खिलाफते सिद्दीक़ ए अकबर*_
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_*ⓩ अहले सुन्नत व जमाअत का इस बात पर इज्माअ है कि अम्बिया अलैहिस्सलातो वत्तसलीम के बाद ज़मीन पर सबसे बड़ा मर्तबा अगर किसी का है तो वो है सिद्दीक़े अकबर का फिर फारूक़े आज़म का फिर उसमान ग़नी और फिर मौला अली रिज़वानुल्लाहि तआला अलैहिम अजमईन का, और यही तर्तीब नबी अलैहिस्सलाम के बाद खलीफा बनने की भी रही मगर शिया यानि राफजियों का ये कहना कि मौला अली खलीफये अव्वल थे और उनकी खिलाफत को खुल्फये सलासा ने ग़सब कर लिया निहायत ही गलत और बे महल है बल्कि कुछ मायनों में उनके इसी ऐतराज़ की ज़द में खुद मौला अली भी आ जाते हैं, ज़ैल में कुछ हवाले क़ुर्आनो हदीस व इज्माअ से पेश करता हूं मुलाहज़ा फरमायें*_

_*कंज़ुल ईमान - बेशक अल्लाह के यहां तुममें सबसे ज़्यादा इज़्ज़त वाला वो है जो तुममें सबसे ज़्यादा परहेज़गार है*_

_*📕 पारा 26, सूरह हुजरात, आयत 13*_

_*ⓩ इस आयत से उन लोगों की इस बात का रद्द होता है जो मौला अली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु को हुज़ूर सल्लललाहु तआला अलैहि वसल्लम के चचा ज़ाद भाई और आपका दामाद होने पर खिलाफत का मुस्तहिक़ जानते हैं, और जब रब तआला ने खुद फरमा दिया कि सबसे बड़ा परहेज़गार ही उसके सबसे ज़्यादा क़रीब है तो फिर मौला तआला से ही पूछ लेते हैं ऐ मौला तआला सबसे बड़ा परहेज़गार कौन है ये भी बता दे तो मौला तआला फरमाता है कि*_

_*कंज़ुल ईमान - और उससे बहुत दूर रखा जायेगा जो सबसे बड़ा परहेज़गार है.जो अपना माल देता है कि सुथरा हो.और किसी का उस पर कुछ एहसान नहीं कि जिसका बदला वो दे.सिर्फ अपने रब की रज़ा चाहता है जो सबसे बुलंद है और बेशक क़रीब है कि वो राज़ी होगा*_

_*📕 पारा 30, सूरह वल्लैल, आयत 17-21*_

_*तफसीर - इस आयत में मौला तआला ने सिद्दीक़े अकबर रज़ियल्लाहु तआला अन्हु को सबसे बड़ा परहेज़गार कहा, इसका शाने नुज़ूल ये है कि हज़रते सिद्दीक़े अकबर रज़ियल्लाहु तआला अन्हु ने हज़रते बिलाल को बहुत ज़्यादा कीमत देकर खरीदा और आज़ाद कर दिया क्योंकि हज़रते बिलाल को इस्लाम क़ुबूल करने पर काफिर बहुत ज़्यादा ईज़ा दिया करते थे, जब काफिरों ने इतनी बड़ी कीमत पर उनको खरीदकर आज़ाद करते देखा तो कहने लगे कि शायद बिलाल का कुछ एहसान रहा होगा सिद्दीक़े अकबर पर जिसकी वजह से ऐसा किया होगा, तो ये आयत नाज़िल हुई और मौला तआला ने साफ फरमा दिया कि सिद्दीक़ पर किसी का कोई एहसान नहीं बल्कि वो सिर्फ मेरी रज़ा के लिए ऐसा करता है*_

_*📕 खज़ाइनुल इर्फान, सफह 708*_

_*कंज़ुल ईमान - तुममे बराबर नहीं वो जिन्होंने फतह मक्का से क़ब्ल खर्च किया*_

_*📕 पारा 27, सूरह हदीद, आयत 10*_

_*तफसीर - इस आयत से माअलूम हुआ कि सहाबा में भी आपस में मर्तबे हैं और सब बराबर नहीं है, और सबसे पहले जिसने माल राहे खुदा में खर्च किया वो कोई और नहीं बल्कि सिद्दीक़े अकबर रज़ियल्लाहु तआला अन्हु ही हैं*_

_*📕 खज़ाइनुल इर्फान, सफह 726*_

_*कंज़ुल ईमान - सिर्फ दो जान से जब वो ग़ार में थे*_

_*📕 पारा 10, सूरह तौबा, आयत 40*_

_*तफसीर - फुक़्हा फरमाते हैं कि 124000 सहाबये किराम हैं मगर किसी भी सहाबी की सहाबियत का इनकार कुफ्र नहीं है सिवाए सिद्दीक़े अकबर रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के, क्योंकि उनकी सहाबियत क़ुर्आन से साबित है और क़ुर्आन का इनकार कुफ्र है*_

_*📕 खज़ाइनुल इर्फान, सफह 230*_

_*ⓩ ऐसी बहुत सी आयतें हैं जिनसे सिद्दीक़े अकबर का अफज़ल सहाबी होना साबित होता है मगर बस इतने पर ही इक्तिफा करता हूं कि मौज़ू बहुत ज़्यादा तवील हो जायेगा, अब कुछ हदीस की भी सैर कर लिया जाये*_

_*हदीस - खुदा ने बा ज़रियये जिब्रील हज़रते अबू बक्र सिद्दीक़ को सलाम कहलवाया*_

_*📕 तफसीरे अज़ीज़ी, पारा 30, सफह 208*_

_*हदीस - हुज़ूर सल्लललाहु तआला अलैहि वसल्लम इरशाद फरमाते हैं कि मेरे दो वज़ीर आसमान में हैं जिब्रील व मीकाईल और दो ज़मीन पर हैं अबु बक्र व उमर*_

_*📕 तिर्मिज़ी, जिल्द 2, सफह 208*_

_*हदीस - हज़रते मौला अली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के बेटे हज़रत सय्यदना इमाम मुहम्मद बिन हनफिया फरमाते हैं कि मैंने अपने वालिद से अर्ज़ की कि हुज़ूर सल्लललाहु तआला अलैहि वसल्लम के बाद सब आदमियों में सबसे ज़्यादा अफज़ल कौन है तो फरमाया अबु बक्र मैंने अर्ज़ की फिर तो फरमाया उमर*_

_*📕 बुखारी, जिल्द 1, सफह 518*_

_*हदीस - एक शख्स ने मौला अली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु से कहा कि ऐ अमीरुल मोमेनीन आपके होते हुए अनसार व मुहाजेरीन ने किस तरह अबू बक्र व उमर को आप पर मुक़द्दम कर दिया जब कि मर्तबे में आप उनसे बेहतर हैं तो मौला अली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु फरमाते हैं कि अगर ये बात ना होती कि अल्लाह मोमिन को नाजायज़ अमल से बचा लेता है तो मैं तुझे क़त्ल कर देता*_

_*📕 कंज़ुल उम्माल, जिल्द 6, सफह 318*_

_*हदीस - मौला अली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के खिलाफत के ज़माने में कुछ लोगों ने आपको सिद्दीक़े अकबर व फारूक़े आज़म से अफज़ल कहा जिस पर आप फरमाते हैं कि इस बारे में अगर मैंने पहले से हुक्म सुना दिया होता तो ज़रूर सज़ा देता मगर आजसे जिसको ऐसा कहते हुए सुनूंगा तो मेरे नज़दीक वो फितना फैलाने वाला कमीना होगा और उसकी सज़ा 80 कोड़े होगी, बेशक नबी के बाद सबसे अफज़ल अबु बक्र हैं फिर उमर, उस महफिल में हज़रते इमाम हसन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु मौजूद थे आप फरमाते हैं कि खुदा की कसम अगर इसके बाद मौला किसी का नाम लेते तो ज़रूर उसमान का लेते*_

_*📕 किताबुल सुन्नत, सफह 12*_
_*📕 ग़ायतुत्तहक़ीक़, सफह 13*_

_*हदीस - दो शख्स ने अमीरुल मोमेनीन मौला अली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु से उनकी खिलाफत के बारे में सवाल किया कि क्या ये कोई ओहदा या वादा हुज़ूरे अक़दस की तरफ से है या आपकी राय है तो फरमाया हमारी राय है, रहा ये कि क्या मेरे लिए हुज़ूर ने कोई ओहदा या मनसब मुक़र्रर फरमा दिया हो तो खुदा की कसम ऐसा नहीं, अगर हुज़ूर की तरफ से मेरे पास कोई ओहदा होता तो मैं अबू बक्र व उमर को मेम्बरे रसूल पर बैठने ना देता और बेशक उनसे जंग करता अगरचे कि अपनी चादर के सिवा किसी को साथी ना पाता, बात ये हुई कि हुज़ूर मआज़ अल्लाह कोई क़त्ल ना हुए और ना अचानक इन्तेक़ाल फरमाया बल्कि कई रात दिन हुज़ूर मर्ज़ में रहे मुअज़्ज़िन आकर अज़ान दे जाता और हुज़ूर अबू बक्र को इमामत के लिए मुंतखिब करते और बेशक मैं कहीं गायब ना था और खुदा की कसम अज़्वाजे मुतहहरात में से एक बीवी ने ये मामला अबु बक्र से फेरना चाहा तो हुज़ूर ने गज़ब का इज़हार किया और अबू बक्र को इमामत का हुक्म दिया, फिर जब हुज़ूर का इन्तेक़ाल हुआ तो हमने अपने कामों पर नज़र की तो खिलाफत के लिए उसको पसंद किया जिसको हुज़ूर ने हमारे दीन के लिए मुंतखिब फरमाया था लिहाज़ा हमने अबु बक्र से बैयत की और वो उसके लायक थे, पस मैंने उनको उनका हक़ दिया और उनकी इताअत लाज़िम जानी, और उनके साथ लश्करों में जिहाद किया जब वो बैतुल माल से कुछ देते तो मैं ले लेता और जब लड़ाई पर भेजते तो मैं जाता और उनके सामने मुजरिमों को अपने कोड़े से सज़ा देता फिर यही मज़मून हज़रते उमर व हज़रते उस्मान के बारे में फरमाया*_

_*📕 कंज़ुल उम्माल, जिल्द 3, सफह 141*_

_*ⓩ ये तो हुई क़ुर्आनो हदीस से फज़ायल की बात, अब चलते हैं राफजियों के कुछ सवालों की तरफ जिनका जवाब मुलाहज़ा फरमायें और वो भी उन्ही की किताबों से*_

_*शिया - मौला अली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु हुज़ूर सल्लललाहु तआला अलैहि वसल्लम के चचा ज़ाद भाई और आपके दामाद भी थे लिहाज़ा खिलाफत पर पहला हक़ उन्हीं का था*_

_*जवाब - ऊपर गुज़र चुका है कि अल्लाह और उसके रसूल ने नस्ब को नहीं बल्कि तक़वा व परहेज़गारी को मुक़द्दम रखा है*_

_*शिया - खुल्फाये सलासा ने मौला अली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की खिलाफत हड़प ली*_

_*जवाब - तो मौला अली ने तलवार क्यों नहीं उठाई*_

_*शिया - जब तक मददगार ना हों जंग वाजिब नहीं और अली अलैहिस्सलाम के पास मददगार नहीं थे*_

_*📕 अखबारे सदाक़त, सफह 10, 5/1/1956*_

_*जवाब - मददगार नहीं थे, मगर आपकी किताबों में तो कुछ और ही लिखा है, पढ़ लीजिये*_

_*शिया - (जिस्मानी ताक़त बयान करते हुए लिखते हैं कि) मौला अली फरमाते हैं कि खुदा की कसम अगर मैं तन्हा मुक़ाबला करूं और वो तमाम रूए ज़मीन भर तब भी मुझे कुछ परवाह ना होगी और ना मैं घबराऊंगा*_

_*📕 नहजल बलागा, जिल्द 2, सफह 124*_

_*शिया - (रूहानी ताक़त बयान करते हुए लिखते हैं कि) आपके पास असाये मूसवी सुलेमानी अंगूठी और इस्मे आज़म भी था*_

_*📕 उसूले काफी, सफह 40-41*_

_*शिया - (आपके लश्कर के बारे में लिखते हैं कि) हुज़ूर का विसाल हुआ तो फौरन ही हज़रते अब्बास व अबु सुफियान जो कि तमाम मक्का वालों के सरदार थे आपके पास बैयतो खिलाफत के लिए आये मगर मौला अली ने क़ुबूल ना किया*_

_*📕 नहजल बलागा, जिल्द 1, सफह 45*_

_*शिया - जनाबे अमीर के साथ जवानाने बनी हाशिम और क़बीलये बनी हनीफ भी था*_

_*📕 मजालिसे मोमेनीन, सफह 52*_

_*शिया - सअद बिन उबादा जो कि अन्सार के क़बीले का सरदार था वो भी अमीर के साथ था, और सअद की क़ूवत का हाल ये था कि खुल्फये सलासा बावजूद अपनी शानो शौकत के सअद पर ग़ल्बा नहीं पा सकते थे*_

_*📕 मजालिसे मोमेनीन, सफह 101*_

_*शिया - इनके अलावा खालिद बिन सईद, मिक़दाद, अबु ज़र, सलमान, बुरिद, अम्मार, अबू हाशिम, उस्मान बिन हनीफ, खुज़ैमा बिन साबित, अबि बिन कअब, अबु अय्यूब अंसारी, बिलाल, ओसामा बिन ज़ैद,हज़रते अब्बास व तमाम बनी हाशिम हत्ता कि 12000 का लश्करे जर्रार भी अमीर के साथ था और इसमें से 8000 तो खास मदीने में मौजूद था*_

_*📕 हयातुल क़ुलूब, जिल्द 2, सफह 588*_

_*जवाब - जनाब अब आप खुद बतायें कि जिसके बदन में इतनी ताक़त हो कि खैबर का 32 टन का दरवाज़ा हाथों से उखाड़कर फेंक दें,जिसके पास असाये मूसवी हो कि फेंक देते तो सांप बन जाता, जिसके पास सुलेमानी अंगूठी हो कि तमाम जिन्नात आपकी मदद को हाज़िर हो जाते, जिसके पास इस्मे आज़म हो कि पल भर में दुश्मनों की फौज जलकर खाक हो जाती, और फिर जिसके पास 12000 का लश्कर हो और 8000 तो उसी वक़्त मदीने में ही मौजूद था तो क्यों इन सबके होते हुए भी मौला अली ने अपनी खिलाफत को ग़सब होने दिया, सिर्फ और सिर्फ इसलिए कि इंसान दो ही सूरतों में दूसरों का फैसला मानता है पहला या तो वो कमज़ोर हो जो कि मौला अली हरगिज़ नहीं थे और दूसरा या तो सामने वाला हक़ पर हो, और यही हक़ है मौला अली अच्छी तरह जानते थे जब ही तो आपने उनकी बैयत की और खुद उनके साथ हुसने अखलाक़ से पेश आते रहे*_

_*शिया - मौला ने खुल्फाये सलासा के खिलाफ इस लिए भी तलवार नहीं उठाई कि काफिरों और मुनाफिकों की पुश्तों में मोमिन अल्लाह की अमानत है पस अली अलैहिस्सलाम ऐसे ना थे कि अमानतों के नुत्फे से पहले उनके आबा व अजदाद को क़त्ल कर देते*_

_*📕 अखबारे सदाक़त, सफह 10, 5/1/1956*_

_*जवाब - मआज़ अल्लाह इसका मतलब खुल्फये सलासा काफिर व मुनाफिक़ हैं ये सरासर क़ुर्आन का इन्कार है जो कि खालिस कुफ्र है, और अगर उनके खिलाफ तलवार ना उठाने की मौला अली की ये वजह मान भी ली जाये तो जंगे जमल और जंगे सिफ्फीन में क्यों आप सहाबा से लड़े, क्या तब उनके अंदर मोमिन के नुत्फे ना रहे होंगे, हक़ यही है कि मौला अली जब हक़ पर थे तब उम्मुल मोमेनीन के खिलाफ तलवार उठाने में भी ना झिझके मगर खुल्फये सलासा के खिलाफ अगर तलवार नहीं उठाई तो मतलब साफ है कि यहां खुल्फये सलासा हक़ पर थे और खिलाफत पर उनका हक़ था और यही हक़ है हक़ है हक़ है*_
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Al Waziftul Karima 👇🏻👇🏻👇🏻 https://drive.google.com/file/d/1NeA-5FJcBIAjXdTqQB143zIWBbiNDy_e/view?usp=drivesdk 100 Waliye ke wazai...