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Sunday, August 26, 2018



     _*हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम हिस्सा - 1*_
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_*कंज़ुल ईमान - और ज़ुन्नुन को याद करो जब चला गुस्से में भरा तो गुमान किया कि हम उस पर तंगी ना करेंगे तो अन्धेरियों में पुकारा कोई मअबूद नहीं सिवाये तेरे पाकी है तुझको बेशक मुझसे बेजा हुआ*_

_*📕 पारा 17, सूरह अम्बिया, आयत 87*_

_*हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम का लक़ब ज़ुन्नुन और साहिबल हूत है क्योंकि आप मछली के पेट में चले गए थे इसलिए आपको ज़ुन्नुन कहा गया और आप बचपन में ही इंतेकाल फरमा गए थे मगर 14 दिन के बाद हज़रत इल्यास अलैहिस्सलाम की दुआ से आप फिर ज़िंदा हुये*_

_*📕 तफसीरे सावी,जिल्द 3, सफह 73*_

_*ईराक़ के नेनवाह जिसे मौसुल भी कहा जाता है उसकी तरफ आप नबी बनाकर भेजे गए, आपने अपनी क़ौम जो क कुफ्रो शिर्क में मुब्तिला थी उसे समझाया कि ये सब छोड़कर एक अल्लाह की इबादत करो पर वो नहीं माने तब आपने फरमाया कि अगर तुम लोगों ने अपना ये तरीक़ा नहीं छोड़ा तो 40 दिन के बाद अल्लाह का अज़ाब आ जायेगा, हालांकि उन लोगों को मालूम था कि आप जो बोलते हैं वो हक़ ही होता है मगर फिर भी इसकी तरफ तवज्जोह नहीं की जब 35 दिन गुज़र गए तो आसमान पर काले बादल छा गए जिनसे बहुत ज़्यादा धुआं निकलने लगा जिसने पूरे शहर को अपनी आगोश में ले लिया, जब हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम ने देखा तो समझ गए कि अब अज़ाब आने वाला है और आप बस्ती छोड़कर बाहर निकल गए ये दिन जुमा मुहर्रम की दसवीं थी, उधर जब क़ौम को ये एहसास हो गया कि हम पर खुदा का अज़ाब आने वाला है तो वो अपने आलिम के पास पहुंचे और सारी बात बताई तो उन्होंने कहा कि अब तौबा करने का वक़्त आ गया है तो पूरी क़ौम रो रोकर खुदा की बारगाह में अपने गुनाह भी माफी चाहने लगी, अपने सारे मज़ालिम जो उन्होंने एक दूसरे पर किये थे माफ कराये सब का छीना हुआ हक़ वापस किया यहां तक कि किसी का पत्थर भी अगर उसके मकान की बुनियाद में लगा था तो खोदकर उसका पत्थर तक वापस किया गया और बहुत दर्दनाक आवाज़ में बच्चे बूढ़े जवान औरतें सब रो रहे थे और यही कहते जाते थे कि ऐ अल्लाह हम तुझ पर और तेरे नबी पर ईमान लाये तो मौला तआला को उन पर रहम आ गया और उन पर से अज़ाब को टाल दिया*_

                 _*यहां पर एक सवाल उठता है कि क़ौमे यूनुस ने तौबा की तो उनकी तौबा क़ुबूल की गई और जब फिरऔन ने तौबा की तो उसकी तौबा क़ुबूल न हुई ऐसा क्यों जबकि अज़ाब दोनों पर ही आ पड़ा था, तो इसका जवाब ये है कि फिरऔन ने ज़ाहिरन अज़ाब देख लिया था और अज़ाब देखकर तौबा करना क़ुबूल नहीं जबकि क़ौमे यूनुस ने अज़ाब नहीं देखा था बल्कि सिर्फ अलामते अज़ाब देखा था और यही अलामत देखकर वो तौबा करने लगे तो तौबा उनकी सच्ची थी लिहाज़ा क़ुबूल हुई*_

_*📕 तज़किरातुल अम्बिया,सफह 198*_

_*जारी रहेगा......*_
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     _*हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम हिस्सा - 2*_
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_*उधर हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम बस्ती से बाहर निकल चुके थे ये सोचकर कि अब उनकी क़ौम पर अज़ाब तो आ ही चुका है सो मेरा यहां क्या काम मगर वो सब तो माफ हो चुके थे, आप कश्ती में बैठकर सफर को निकले जब कश्ती बीच दरिया में पहुंची तो चारों तरफ से मौजों ने कश्ती को घेर लिया उस वक़्त उनके माअमूल के मुताबिक अगर कोई ग़ुलाम अपने मालिक से दूर जा रहा होता था तो ही ऐसा होता था और उससे बचने का तरीका ये था कि उसे दरिया में फेंक दिया जाए तो सब बच जाते थे, अब उस शख्स के बारे में जानने के लिए कि कौन यहां ऐसा है क़ुरआ निकाला गया और तीनों ही बार हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम का नाम आया तो आप खुद ही दरिया में कूद पड़े, मौला ने फौरन एक मछली को हुक्म दिया कि मेरे नबी को अपने पेट में जगह दे मगर ख्याल रहे कि वो तेरा लुक़्मा नहीं है इसलिए उन्हें तकलीफ ना हो चुनांचे एक मछली आपको निगल गई और आपको लिए इसी तरह इधर उधर समंदर में फिरती रही, आप मछली के पेट में 3 दिन से लेकर 40 दिन तक ठहरने के क़ौल हैं फिर वहीँ से आपने ये दुआ पढ़ी तो मौला ने आपकी दुआ सुन ली और आपको मछली के पेट से निजात मिली इस तरह कि वो आपको साहिल पर छोड़कर चली गयी वहां पर मौला ने एक कद्दू यानि लौकी का दरख्त उगाया जिसके साये में आप आराम फरमाते थे, कद्दू का पेड़ उगाने में हिकमत ये थी कि आप जब मछली के पेट से बाहर आये तो एक नव मौलूद बच्चे की तरह थे कि आपकी खाल बहुत नर्म थी जिस पर मक्खियां बैठती तो आपको परेशानी होती और आप काफी कमज़ोर भी हो चुके थे लिहाज़ा मौला ने कद्दू का पेड़ उगाया कि उस पर मक्खियां नहीं बैठती और उसके पत्ते बड़े बड़े होते हैं जो आपको ढककर रखते और एक बकरी रोज़ाना आकर आपको दूध पिला जाती थी इस तरह आप पहले जैसे सेहतमंद हो गए*_

_*📕 तज़किरातुल अम्बिया, सफह 199-201*_
_*📕 अलइतकान,जिल्द 2, सफह 178*_
_*📕 खाज़िन, जिल्द 4, सफह 258*_

_*ⓩ ये पूरा वाक़िया आपने पढ़ लिया अब कुछ वो बातें बताता हूं जिसमे लोगों ने खयानत से काम लिया, सबसे बड़ी बात तो ये कि जो आयत मैंने शुरू में पेश की उस आयत का तर्जुमा करने में बहुतों ने गलतियां की मसलन किसी ने हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम का मौला के बारे में क़ौल युं लिखा कि हम उन पर काबू ना पा सकेंगे या उस पर गिरफ्त ना कर सकेंगे या हम उसे पकड़ ना सकेंगे मआज़ अल्लाह ये सारे तर्जुमे गलत और सरासर बातिल हैं, ये मुमकिन ही नहीं एक नबी खुदा के बारे में ऐसा अक़ीदा रखे कि उसका खुदा उसे पकड़ नहीं सकता जबकि एक जाहिल से जाहिल मुसलमान भी ये खूब अच्छी तरह जानता है कि उसका खुदा उसे कहीं भी गिरफ्त में ले सकता है, मगर कुछ लोगों ने तो इस आयत के तर्जुमे से खुदा को भी मआज़ अल्लाह आजिज़ क़रार दे दिया हालांकि ये खुला हुआ कुफ्र है*_

_*एक मर्तबा हज़रते अमीर मुआविया रज़ियल्लाहु तआला अन्हु ने हज़रते इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु तआला अन्हु से मुलाक़ात की और कहा कि कल सारी रात मैं क़ुर्आन में गर्क रहा मगर मुझे खलासी ना मिली आप बतायें क्या अल्लाह का नबी ये गुमान कर सकता है कि अल्लाह उसे पकड़ नहीं सकेगा इस पर हज़रते इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु तआला अन्हु फरमाते हैं कि ये लफ्ज़ क़द्र से लिया हुआ है कुदरत से नहीं इसका मायने तंगी ना करना है क़ुदरत ना रखना नहीं जैसा कि क़ुर्आन में कई जगह आया है कि अल्लाह जिसके लिए चाहे रिज़्क़ कुशादा करता है और जिस पर चाहे तंग करता है तो यहां भी वही मायने मुराद है*_

_*📕 तज़किरातुल अम्बिया, सफह 199*_

_*ⓩ एक तर्जुमा ये किया गया जिसमे हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम को ज़ालिम कहा गया मआज़ अल्लाह याद रखें कि महबूब और मुहिब यानि रब और उसके महबूब बन्दे आपस में जो बात करे और जैसी बात करें किसी को कोई हक़ नहीं पहुंचता कि वो उस बात को दलील बनाये मसलन आलाहज़रत फरमाते हैं कि*_

_*जारी रहेगा......*_
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     _*हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम हिस्सा - 3*_
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_*ⓩ एक तर्जुमा ये किया गया जिसमे हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम को ज़ालिम कहा गया मआज़ अल्लाह याद रखें कि महबूब और मुहिब यानि रब और उसके महबूब बन्दे आपस में जो बात करे और जैसी बात करें किसी को कोई हक़ नहीं पहुंचता कि वो उस बात को दलील बनाये मसलन आलाहज़रत फरमाते हैं कि*_

_*हज़रते हारून अलैहिस्सलाम नबी हैं और हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के बड़े भाई मगर जलाले मूसा की ताब में वो भी आ गये कि जब आप तूर से वापस आये और अपनी क़ौम को बुतपरस्ती करते देखा तो अपना होश खो बैठे और जलाल में उनकी दाढ़ी पकड़कर खींचने लगे जबकि नबी की ताज़ीम फर्ज़ है खैर चलिये छोड़िये वो तो उनके भाई ही थे शबे मेराज हुज़ूर सल्लललाहु तआला अलैहि वसल्लम ने सुना कि कोई शख्स तेज़ आवाज़ में रब से बातें कर रहा है तो आपने जिब्रील अलैहिस्सलाम से फरमाया कि ये कौन है जो रब पर तेज़ी करता है तो हज़रत जिब्रील अलैहिस्सलाम फरमाते हैं कि ये मूसा अलैहिस्सलाम हैं मौला जानता है कि उनके मिज़ाज में तेज़ी है चलिये इसे भी जाने दीजिये वो जो उम्मुल मोमेनीन सय्यदना आईशा सिद्दीक़ा रज़ियल्लाहु तआला अन्हा अपने रब से फरमाती हैं कि ये सब तेरे ही फितने हैं यहां क्या कहियेगा, जो अलफाज़ ये नुफूसे क़ुदसिया जलाल में कह गये अगर दूसरा कहे तो गर्दन मारी जाये मगर अन्धो ने तो शाने अब्दियत ही देखी शाने महबूबियत देखने से तो उनकी आंखें फूट गई*_

_*📕 अलमलफूज़, हिस्सा 3, सफह 6*_

_*और साहिबे बहारे शरीयत फरमाते हैं कि "अम्बिया-ए किराम से जो लग्ज़िशें हुई उनका ज़िक्र सिवाये तिलावते क़ुर्आन और रिवायते हदीस के कहीं और करना हराम और सख्त हराम है दूसरों को उन पर लब कुशाई करने की क्या मजाल, मौला उनका मालिक है जिस तरह चाहे ताबीर करे और वो मौला के प्यारे बन्दे हैं अपने आपको जिस तरह चाहें उसके सामने तवाज़े करें तो जो उसको सनद बनायेगा वो मरदूदे बारगाह होगा, फिर जिसको लग़्ज़िश समझा जाता है उसमे भी हज़ार हिकमतें छिपी होती हैं एक लग्ज़िशें आदम को ही देखिये अगर वो ना होती जन्नत से ना उतरते दुनिया आबाद ना होती किताबें ना उतरती रसूल ना आते जिहाद ना होते गर्ज़ कि लाखों करोड़ो नेकियों के दरवाज़े हमेशा के लिए बन्द ही रहते इसिलिये फुक़्हा फरमाते हैं कि अम्बिया की लग्ज़िशें सिद्दीक़ीन की नेकियों से भी अफज़ल है*_

_*📕 बहारे शरीयत, हिस्सा 1, सफह 23*_

_*ⓩ फिर दूसरी जगह तर्जुमा करने वालो ने लिखा कि वो भाग गये माज़ अल्लाह, ये भी एक नबी की शान के लायक़ नहीं कि वो अपनी उम्मत को छोड़कर भाग जायें जबकि मेरे आलाहज़रत ने लिखा कि "बेशक युनुस पैगम्बरों से हैं जबकि वो भरी कश्ती की तरफ निकल गया" यानि हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम ने अपने इज्तिहाद से फैसला किया कि अब तो अज़ाब आ ही गया है अब यहां रूककर क्या फायदा और यही सोचकर आपने बस्ती छोड़ दी और ये ख्याल किया कि मौला मुझसे उनके तअल्लुक़ से बाज़ पुर्स ना करेगा हालांकि उनको अज़ाब आने तक ठहरना चाहिये था क्योंकि मौला ने उनको लाखों से ज़्यादा आदमी की तरफ नबी बनाकर भेजा था, फिर किसी ने तर्जुमा किया गया कि उन पर ये अज़ाब आया कि मछली ने उन्हें निगल लिया जबकि आलाहज़रत फरमाते हैं कि "और हमने उसे लाख आदमियों बल्कि ज़्यादा की तरफ भेजा तो वो ईमान ले आये और हमने उन्हें एक वक़्त तक बरतने दिया" यानि ये अज़ाब नहीं था बल्कि एक यार का यार को इताब था और इताब सज़ा को नहीं कहते बल्कि हिस्से को कहते हैं और ये रब के मुताबिक इसलिये था कि ऐ मेरे प्यारे हमने आपको लाखों का नबी बनाया और आप हमारा अज़ाब आने तक ना रुके और युंही चल दिये हो सकता था कि वो ईमान ले आते और जैसा कि हुआ भी*_

_*कंज़ुल ईमान - फिर उसे मछली ने निगल लिया और वो अपने आपको मलामत करता था, तो अगर वो तस्बीह करने वाला ना होता, ज़रूर उसके पेट में रहता जिस दिन तक लोग उठाये जायेंगे*_

_*📕 पारा 23, सूरह साफ्फात, आयत 142-144*_

_*आयते करीमा - لَا إلٰہَ إلَّا أَنْتَ سُبْحَانَکَ إنِّیْ کُنْتُ مِنَ الظَّالِمِیْنَ यही वो तस्बीह थी जिसे हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम ने मछली के पेट में पढ़ी और मौला ने आपको हर ग़म से आज़ाद कर दिया जबकि फरमाता है कि अगर ये तस्बीह ना पढ़ते तो क़यामत तक वहीं रहते लिहाज़ा अब कोई मुसलमान कितनी भी बड़ी मुसीबत में गिरफ्तार हो या कैसी भी परेशानी हो तो सच्चे दिल से तायब होकर उसकी बारगाह में इसी आयत का कसरत से विर्द करे तो मौला तआला उसकी तमाम मुश्किलें ज़रूर ज़रूर आसान फरमा देगा, इन शा अल्लाह*_

_*📕 तज़किरातुल अम्बिया, सफह 200*_

_*जो बीमारी की हालत में 40 मर्तबा आयते करीमा पढ़े शिफा होगी पर अगर मौला ने उसे हयात ना बख्शी और मर गया तो उसे शहादत का दर्जा मिलेगा*_

_*📕 क्या आप जानते हैं, सफह 572*_

_*आपकी मज़ार मक़ामे निनेवाह में है*_

_*📕 आईनये तारीख, सफह 123*_

_*खत्म......*_
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Al Waziftul Karima 👇🏻👇🏻👇🏻 https://drive.google.com/file/d/1NeA-5FJcBIAjXdTqQB143zIWBbiNDy_e/view?usp=drivesdk 100 Waliye ke wazai...