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Friday, May 1, 2020

_*📚हदीस की रोशनी में  {पोस्ट न. 15}*_
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                _*🌀तबलीग जमाअत🌀*_

            _*✨अल - विदाई कलिमात✨*_

_*💫इस किताब के खातमा पर मैं आप से चन्द आखिरी कलिमात कह कर रुख्सत हो रहा हूँ । अपनी तलाश व जुस्तजू के बाद तबलीगी जमाअत से मुतअल्लिक जितनी हदीसें मेरी नज़र में थीं मैंने आपके सामने पेश कर दीं । अब उन पर पुरखुलूस जज्बे के साथ गौर फरमाएं ।*_

_*✨आप अगर तबलीगी जमाअत के साथ मुंसलिक हैं तो मैं आपकी नीयत पर हमला नहीं करूंगा । हो सकता है कि आख़िरत का शौक़ ही आपको इस तरफ़ खींच कर ले गया हो लेकिन क्या एक लम्हे के लिए आप यह सोचने की ज़हमत गवारा फरमाएंगे कि मैंने अपनी किताब ' तबलीगी जमाअत ” में तबलीगी जमाअत के खिलाफ जितने हकाइक पेश किए हैं क्या वह सब के सब यकलख्त गलत और बेबुनियाद हैं ? फर्ज कीजिए आपके तईं सारे इल्ज़ामात गलत हैं तो क्या इन हदीसों को भी आप गलत कह दीजिएगा जिन के ज़रिया तबलीगी जमाअत से अलाहिदगी में रसूले पाक की खुशनूदी का पता चलता है । बहरहाल आपके तई तबलीगी जमाअत में अगर कुछ खैर का हिस्सा है तो अज़रूए इंसाफ “ शर " का हिस्सा उस से कहीं ज्यादा है । इसलिए थोड़े से खैर के लिए अपने आपको बहुत बड़े शर में मुब्तला कर देना न इस्लाम ही का मुतालबा है और न अक्ल ही का तकाज़ा ।*_

 _*🌀तबलीगी जमाअत का साथ देने में उख़रवी मुज़र्रत का यकीन न सही इस सवाल का एहतमाल तो ज़रूर है कि रसूल की निशानदेही के बावजूद तुम ने ऐसी जमाअत का साथ क्यों दिया ? लेकिन अलाहिदा रहने में कोई खतरा नहीं , न दुनिया का न आख़िरत का ।*_

_*✨इस किताब की आखिरी सतरें लिखते हुए मैं रूहानी इत्मीनान महसूस करता हूँ कि उम्मत को एक अज़ीम ख़तरा से अहादीसे पाक की रौशनी में आगाह करने का फर्ज मैंने अपने सर से उतार दिया अब अंजाम के लिए फैसले की ज़िम्मेदारी उन लोगों पर है जिनके हाथों में यह किताब है । दुआ है कि खुदाए कदीर इस किताब के ज़रिया अपने सादा लौह बन्दों को सलामती की मंज़िल की तरफ वापसी की तौफीक मरहमत फरमाए ।*_
                           _*🤲🏻आमीन !*_

_*💫वसल्लल्लाहु तआला अला सैय्यिदना मुहम्मदिन व आलेही व सहबेही अज्मईन ।*_

_*✍🏻 मुसन्निफ़ : - हज़रत अल्लामा मौलाना अरशदुल क़ादरी रहमतुल्लाह अलैह ।*_

                         _*📍The End*_

_*📕 तबलीग जमाअत हदीस की रोशनी में सफा, 30/31/32*_
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_*📚हदीस की रोशनी में  {पोस्ट न. 14}*_
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                _*🌀तबलीग जमाअत🌀*_

                  _*✨नुस्खेए शिफा✨*_

_*💫अच्छा ! सारी बहस जाने दीजिए कम अज़ कम हदीसों पर यकीन के नतीजे में इतना तो आप भी तस्लीम करेंगे कि अख़ीर ज़माने में एक जमाअत निकलेगी जो मज्कूरा बाला औसाफ की हामिल होगी अगर वह तबलीगी जमाअत नहीं तो फिर आप ही बताइए कि दूसरी वह कौन सी जमाअत है जिस में मासबक हदीसों की बयान करदह अलामतें पाई जा रही हैं ।*_

_*💫इसलिए जेहनी खल्जान का इलाज यह है कि तबलीगी जमाअत को सिर्फ रोज़ा , नमाज़ और चन्द ज़ाहिरी खूबियों के रुख से न देखिए बल्कि अहादीस में इस बेदीन जमाअत की जितनी अलामतें बयान की गई हैं इन सारी अलामतों के आईने में तबलीगी जमाअत का जाइज़ा लीजिए । रोज़ा , नमाज़ और दीनी दावत तो इन अलामतों का सिर्फ एक हिस्सा है । तस्वीर का सिर्फ एक रुख देख कर पूरी शख़्सियत का सरापा मालूम करना बहुत मुश्किल है ।*_

                 _*💫ज़मीर का फैसला💫*_

_*💫इन हालात में अब मोमिन का ज़मीर ही इसका फैसला . करेगा कि रसूले पाक साहिबे लौलाक सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की खुशनूदी तबलीगी जमाअत के साथ मुंसलिक होने में है या उस से इलाहिदा रहने में ? यह सवाल सिर्फ उन लोगों से है जिन्हें सिर्फ खुदा और रसूल की खुशनूदी का जज्बा तबलीगी जमाअत की तरफ खींच कर ले गया है बाकी रहे वह लोग जो किसी माद्दी मन्फअत की लालच या मज्हबी । शकावत के जज्बे में तबलीगी जमाअत के साथ हो गये हैं तो । उनके मुताअल्लिक मैं सिर्फ इतना कहूंगा कि वह अपनी ख़्वाहिशे नफ्स की पैरवी में जितनी दूर जाना चाहें चले जाएं । एहतरामे नुबुव्वत के कानून की अब कोई ज़न्जीर उनके उठे हुए कदमों को नहीं रोक सकती लेकिन सिर्फ इतनी सच्चाई बरकरार रखें कि अपने नफ्स के शैतान की फरमांबरादरी करते वक़्त खुदा व रसूल की खुशनूदी का नाम न लिया करें । बहरहाल यह कहते हुए अब इस बहस का सिलसिला खत्म करता हूँ कि जिन औसाफ़ की वजह से लोग तबलीगी जमाअत पसन्द करते हैं । अफ्सोस की वही औसाफ़ हमें उस गरोह से भी रोशनास कराते हैं जिनकी निशानदेही आज से तक़रीबन चौदह सौ बरस पेश्तर खुदा के आखिरी पैग़म्बर ने फरमाई थी और अपनी वफादार उम्मत को ताकीद की थी कि जब उन निशानियों का कोई गरोह तुम्हें मिले तो तुम उस से दूर रहना अब जिस उम्मती को अपने रसूल की खुशनूदी अज़ीज़ हो वह तबलीगी जमाअत से दूर रहे और अपनी ख्वाहिशे नफ्स का गुलाम हो , उसे एक वफादार मोमिन की रविश अख्तियार करने पर कोई मज्बूर नहीं कर सकता ।*_


_*📕 तबलीग जमाअत हदीस की रोशनी में सफा, 28/29/30*_

_*📮जारी रहेगा इन्शाअल्लाह.....*_
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_*✍🏻 मुसन्निफ़ : - हज़रत अल्लामा मौलाना अरशदुल क़ादरी रहमतुल्लाह अलैह ।*_
_*📚हदीस की रोशनी में  {पोस्ट न. 13}*_
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                _*🌀तबलीग जमाअत🌀*_

            _*✨जेहन का आखिरी कांटा✨*_

_*💫कल इसके कि मज्कूरा बाला अहादीस की रौशनी में आप तबलीगी जमाअत के मुतअल्लिक कोई फैसला करें मुझे चन्द लम्हे के लिए इजाज़त दीजिए कि मैं आपके एहसास की नब्ज़ पर हाथ रख आप से एक बात कहूं । मैं महसूस करता हूँ कि तबलीगी जमाअत के खिलाफ कोई फैसला करते हुए आप को जो सबसे बड़ी उलझन पेश आएगी वह यह है कि एक ऐसी जमाअत जो लोगों को दीन की तरफ बुलाती है । नमाज़ और रोज़ा की खुद भी पाबन्द है और दूसरों को भी तरगीब देती है । लोगों को अच्छी बातों की तल्कीन करना जिस ने अपना मक्सदे हयात ठहरा लिया है उसे क्यों कर गुमराह और बेदीन करार दिया जा सकता है । अगर ऐसी दीन परवर जमाअत भी गुमराह और बेदीन है तो फिर दुनिया में दीनदार और हक परस्त कौन है ? मैं अर्ज करूंगा कि तकरीबन इसी तरह की कशमकश हजरत सैय्यदना अबू बक्र सिद्दीक और हज़रत सैयदना उमर फारूक रज़ि अल्लाहु तआला अन्हुमा को भी इस नौजवान नमाज़ी के मुतअल्लिक पेश आई थी जिसे कत्ल करने का हुक्म हुजूरे अनवर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने सादिर फरमाया था , वह भी यह सोच कर वापस लौट आए थे कि एक नमाज़ी को क्यों कत्ल किया जाए ।*_

_*💫और फिर जब हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने . सहाबा को खबर दी थी कि अखीर ज़माने में एक जमाअत निकलेगी जो कुरआन पढ़ेंगे । अच्छी बातों की तल्कीन करेंगे । नमाज़ व रोज़ा का एहतमाम उनके यहाँ सबसे ज़्यादा होगा और उसके बावजूद दीन से उनका कोई तअल्लुक न होगा तो उस वक़्त भी सहाब - ए - किराम के ज़हन में यह सवाल पैदा हुआ था कि किसी भी शख्स को दीनदार और पसन्दीदा करार देने के लिए यही जाहिरी अलामतें देखी जाती हैं । दिल के अन्दर कौन उतरता है और जब यही अलामतें बेदीन और मुन्हरिफ लोगों के लिए भी हुजूर करार दे रहे हैं तो फिर दीनदार नमाज़ी और बेदीन नमाज़ी के दर्मियान किस तरह इम्तियाज़ किया जाएगा ? गालिबन इसी हैरानी का नतीजा था कि उन्होंने सब कुछ सुन लेने के बाद फिर यह सवाल किया कि वमा सीमाहुम ? या रसूलुल्लाह ! उनकी खास अलामत क्या है ? मतलब यह था कि यही अलामतें तो खुदापरस्त और दीनदार मुसलमानों की भी हैं । कोई ऐसी अलामत बताइए जो इसी बेदीन और गुमराह जमाअत के साथ खास हो तो उसके जवाब में हुजूर ने इरशाद फरमाया था । सीमाहुम अत्तहलीक उनकी खास अलामत सर मुंडाना होगी ।*_


_*📕 तबलीग जमाअत हदीस की रोशनी में सफा, 26/27/28*_

_*📮जारी रहेगा इन्शाअल्लाह.....*_
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_*✍🏻 मुसन्निफ़ : - हज़रत अल्लामा मौलाना अरशदुल क़ादरी रहमतुल्लाह अलैह ।*_
_*📚हदीस की रोशनी में  {पोस्ट न. 12}*_
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                _*🌀तबलीग जमाअत🌀*_

               _*✨निशानियों की तलाश✨*_

_*📚( 11 ) हदीस नम्बर 6 - 13 में बताया गया है कि यह गरोह मुख्तलिफ नामों और मुख्तलिफ़ रंग व रूप के साथ हर दौर में मौजूद रहेगा । यहाँ तक कि उसका आखिरी दस्ता मसीहुद्दज्जाल के साथ निकलेगा । तबलीगी जमाअत पर यह दोनों हदीसें पूरी तरह मुन्तबिक होती हैं । क्योंकि तबलीगी जमाअत जिन अकाइदे बातिला की अलम बरदार है वह बिल्कुल वही हैं जिन्हें इब्ने अब्दुल - वहाब नज्दी , इब्ने तैमिया और इब्ने कैयिम से लेकर मोतज़िला और ख्वारिज तक हर दौर के बातिल परस्तों ने मुख़्तलिफ नामों , मुख्तलिफ जमाअतों और मुख्तलिफ रंग व रूप के साथ परवान चढ़ाया है । सिर्फ नाम नया है बाकी सारी गुमराहियां पुरानी हैं ।*_

_*💫यहीं से इस तावील का दरवाज़ा बन्द हो जाता है कि हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने जिस जमाअत के जुहूर की खबर दी थी वह हज़रत अली रज़ि अल्लाहु अन्हु के जमाने में नीस्त व नाबूद हो गई क्योंकि यहां सवाल किसी मुतऐयन जमाअत का नहीं बल्कि उस काफिराना ज़ेहन का है जो इस वक़्त भी मौजूद था और नामों के इख्तिलाफ़ के साथ आज भी मौजूद है और बदलते हुए जुरूफ व अहवाल के मुताबिक खुरूज दज्जाल तक मौजूद रहेगा ।*_

_*📚( 12 ) हदीस नम्बर 11 - 12 में इस गरोह की एक निशानी यह भी बताई गई है कि यह अपने मिज़ाज व सरिश्त के लिहाज़ से बदतरीन लोग होंगे । तबलीगी जमाअत के हक में अगर आप इस निशानी की तस्दीक करना चाहते हों तो किसी पुख्ता कार तबलीगी जमाअत को टटोल कर देख लीजिए । निहायत खुश्क मिज़ाज , बद खू और मुतकब्बिर उसे आप पाएंगे । रूहानी शगुफ़्तगी , जौके लतीफ़ , गुदाज़ कल्ब और कैफे इश्क से वह यक्सर महरूम नज़र आएंगे बल्कि नज्दियों के हक में शकावते कल्ब की साफ व सरीह हदीस वारिद हुई है । तबलीगी जमाअत को भी इसी पर क्यास कर लीजिए ।*_

_*📚( 13 ) हदीस नम्बर 5 - 12 में इस गरोह की एक निशानी यह भी बताई गई है कि एक बार हक से मुन्हरिफ हो चुकने के बाद दोबारा हक़ की तरफ वापसी उनके लिए नामुम्किन हो जाएगी । तबलीगी जमाअत के हक में इस निशानी की तस्दीक करना चाहते हों तो किसी भी सरगरम तबलीगी जमाअत को जांच लीजिए । लाख आप कोशिश करेंगे कि वह अकीदे के फसाद से हट जाए । रसूले अरबी के गुस्ताखों का साथ न दे , मक्बूलाने हक की बारगाहों से अकीदत रखे लेकिन वह इश्क व ईमान की तरफ कभी पलट कर वापस नहीं आएगा ।*_

_*📕 तबलीग जमाअत हदीस की रोशनी में सफा, 25/26*_

_*📮जारी रहेगा इन्शाअल्लाह.....*_
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_*✍🏻 मुसन्निफ़ : - हज़रत अल्लामा मौलाना अरशदुल क़ादरी रहमतुल्लाह अलैह ।*_
_*📚हदीस की रोशनी में  {पोस्ट न. 11}*_
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                _*🌀तबलीग जमाअत🌀*_

                _*✨निशानियों की तलाश✨*_

_*📚( 9 ) हदीस नम्बर 13 में इस गरोह की एक निशानी यह भी बताई गई है कि वह सादा लौह बेसमझ और नौ उम्र लोगों पर मुश्तमिल होगा । तबलीगी जमाअत के हक में इस निशानी की तस्दीक करना चाहते हों तो उन के किसी भी इज्तिमा में । पहुंच जाइए वहाँ दो ही तरह के लोग आप को मिल जाएंगे । बहुत बड़ी तादाद इन कम पढ़े लिखे सादा लौह अवाम की नज़र आएगी जो अपनी खुश फहमी में दीन का काम समझ कर तबलीगी जमाअत के साथ हो गये हैं और दूसरा गरोह वह स्कूलों , कॉलेजों , मदरसों और मुस्लिम आबादी के उन पुरजोश नौजवानों का मिलेगा जो अपने मज्हबी जज्बे की तस्कीन का ज़रिया समझ कर तबलीगी जमाअत से वाबस्ता हैं । कोई अपनी सादा लौही और हिमाकत मआबी से फरेब का शिकार है । और कोई अपनी नौउम्री और ना तजरेबाकारी के सबब गलत फहमी में मुब्तला है । चेहरे का नकाब उलट कर किसी ने भी असल हकीकत से वाकफीयत भी पहुंचाने की कोशिश नहीं फरमाई है ।*_

_*📚( 10 ) हदीस नम्बर 14 में बताया गया है कि आख़िरी ज़माने में कीड़े मकोड़ों की तरह सिर्फ मुल्ले ही मुल्ले नज़र आएंगे और मस्जिदों को चौपाल बना लिया जाएगा । तजरेबात व मुशाहिदात के आईने में देखिए तो तबलीगी जमाअत इस पेशीनगोई की जीती जागती तस्वीर है । लातादाद ऐसे अफराद इस गरोह में फूट पड़े हैं जो तबलीगी निसाब की चन्द उर्दू किताबें पढ़ कर “ मौलाना " बन गये हैं और बड़े - बड़े उलमा को भी अब वह खातिर में नहीं लाते जैसा कि उसका शिकवा अब इस गरोह के उलमा भी करने लगे हैं । मौलवी अब्दुर्रहीम शाह देवबन्दी के यह अल्फाज़ पढ़िए । “ गौर का मकाम है कि कोई शख्स बेगैर सनद के कम्पोंडर तक नहीं हो सकता मगर ( उन ) लोगों ने दीन को इतना आसान समझ लिया है कि जिस का जी चाहे वअज व तकरीर करने खड़ा हो जाए । किसी सनद की ज़रूरत नहीं , ऐसे ही मौका पर यह मिसाल खूब सादिक आती है " नीम हकीम खतर - ए - जान " नीम मुल्ला खतर - ए - ईमान ।*_

_*📕( उसूले दावत व तबलीग : स० 54 )*_

_*💫इस सिलसिले में मौसूफ की तकरीर का यह हिस्सा भी पढ़ने के काबिल है । “ मेरे बुजुर्गों ! जेब नावाकिफ लोग व ना अहल लोग मन्सबे खिताबत पर फाइज़ होंगे तो वह अपने मुबल्लिगे इल्म के मुताबिक ही नहीं बोलेंगे बल्कि अपने इल्म से आगे नुक्ते पैदा करेंगे उनको . इतनी जुरअत हो गई कि वह लोग अपने खिताबात में उलमा को तन्बीहात फरमाते हैं । " और मस्जिदों का हाल क्या पूछते हैं कि तबलीगी जमाअत के उन खाना बदोशों की बदौलत अब वह मस्जिद के सिवा सब कुछ हैं । खाना पकाने , खाना खाने और लेटने सोने से लेकर ज़िन्दगी के दूसरे मशागिल तक सारे दुनियावी उम्र वहीं अंजाम पाते हैं । मस्जिदों की बेहुर्मती के ऐसे - ऐसे जिगर सोज़ हालात सुनने में आते हैं कि कलेजा फटने लगता है ।*_

_*📕 तबलीग जमाअत हदीस की रोशनी में सफा, 23/24*_

_*📮जारी रहेगा इन्शाअल्लाह.....*_
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_*✍🏻 मुसन्निफ़ : - हज़रत अल्लामा मौलाना अरशदुल क़ादरी रहमतुल्लाह अलैह ।*_
_*📚हदीस की रोशनी में  {पोस्ट न. 10}*_
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                _*🌀तबलीग जमाअत🌀*_

                _*✨निशानियों की तलाश✨*_

_*📚( 7 ) हदीस नम्बर 9 में इस गरोह की पहचान यह भी बताई गई है कि वह नमाज़ इतनी नुमाइशी पाबन्दी या इतने ज़ाहिरी एहतमाम व खुशू के साथ पढ़ेंगे कि दूसरे लोग अपनी नमाज़ों को उनकी नमाज़ों के मुकाबले में हकीर समझने लगेंगे तबलीगी जमाअत का यह वस्फ़ इतना ज़ाहिर है कि अब इसके मुतअल्लिक कुछ कहने सुनने की ज़रूरत नहीं मिसाल के तौर पर आपको ऐसे बेशुमार नमाज़ी मिलेंगे जिन्हें नमाज़ पढ़ते हुए चालीस पचास साल गुज़र गये लेकिन उन की पेशानी नुमाइशी सज्दों के निशान से बेदाग हैं और यहाँ तबलीगी जमाअत के नमाज़ियों को जुमा - जुमा आठ दिन भी नहीं हो पाते कि उनकी पेशानियाँ दागदार हो जाती हैं । अब उसकी वजह सिवाए उसके और क्या तलाश की जा सकती है कि यह लोग सज्दा नहीं करते , पेशानियों को सज्दों से दागा करते हैं ताकि मुसलमानों पर अपनी नमाज़ ख्वानी की धौंस जमाएं ।*_

_*📚( 8 ) हदीस नम्बर 9 , 10 , 15 में इस गरोह की एक पहचान यह भी बताई गई है कि अपनी नमाज़ व इबादत की निखवत में अपने सिवा सब को हिकारत की नज़र से देखना अपने से बड़े बड़ों को बरमला टोकते फिरना यहाँ तक कि अंबिया व औलिया की भी तन्कीस करना इस गरोह का जमाअती शिआर होगा । तबलीगी जमाअत के हक में इस निशानी की तस्दीक करना चाहते हों तो मौलवी अब्दुर्रहीम शाह देवबन्दी की तकरीर का यह हिस्सा पढ़िए । “ मैं हर जुमा को हज़रत मौलाना मुहम्मद यूसुफ साहब मरहूम की खिदमत में बराबर हाज़िर होता था और जमाअत के बेज़ाबता मुकर्रेरीन की शिकायत अर्ज करता कि मैं बहुत से मौकों पर खुद सुन चुका हूँ कि यह लोग उलमाए किराम और मदारिस का मुख्तलिफ अन्दाज़ से इस्तिफाफ़ “ तहकीर " करते हैं । आप हज़रात को जल्द अज़ जल्द उसकी शिद्दत से रोक थाम करना चाहिए । उलमाए किराम को सख्त शिकायात हैं ।*_

_*📕( उसूले दावत व तबलीग : स० 43 )*_

_*💫दूसरी जगह मौसूफ ने मरदुम आज़ारे निखवत का मातम इन अल्फाज़ में किया हैं लिखते हैं । " कुछ अजीब सी बात है कि जो तबलीगी जमाअत से जितना ज़्यादा करीब तर होता है वह उतना ही दूसरे उलमा से बईद तर होता चला जाता है । आखिर ऐसा क्यों ? और जिस ने दो चार चिल्ले दे दिए तो फिर उसकी तरक्कीए दरजात के क्या कहने , फिर तो वह उलमा की भी कोई हकीकत अपने सामने नहीं समझता ।*_

_*📕( उसूले दावत व तबलीग : स० 50 )*_

_*💫और तबलीगी जमाअत के लोगों में तन्कीसे अंबिया का जज़्बा पैदा करने की कोशिश देखना चाहते हों तो बानिए जमाअत मौलवी इल्यास साहब के एक ख़त का यह हिस्सा पढ़िए जिसे उन्होंने तबलीगी जमाअत के कारकुनों के नमा लिखा था , लिखते हैं । “ अगर हक तआला किसी से काम लेना नहीं चाहते तो चाहे अंबिया भी कितनी कोशिश करें तब भी ज़र्रा नहीं हिल सकता और अगर करना चाहें तो तुम जैसे ज़ईफ़ से भी वह काम ले लें जो अंबिया से भी न हो सके ।*_

_*📕( मकातीबे इल्यास : स० 107 )*_


_*📕 तबलीग जमाअत हदीस की रोशनी में सफा, 20/21/22*_

_*📮जारी रहेगा इन्शाअल्लाह.....*_
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_*✍🏻 मुसन्निफ़ : - हज़रत अल्लामा मौलाना अरशदुल क़ादरी रहमतुल्लाह अलैह ।*_
_*📚हदीस की रोशनी में  {पोस्ट न. 09}*_
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                _*🌀तबलीग जमाअत🌀*_

                _*✨निशानियों की तलाश✨*_

_*📚( 4 ) हदीस 12 , 13 में इस गरोह की एक पहचान यह भी बताई गई है कि ऊपर से बातें अच्छी करेंगे लेकिन अन्दर से अमल उसके खिलाफ होगा । कौल व फेअल का यह तजाद देखना चाहते हों तो तबलीगी जमाअत को देख लीजिए । बातों की हद तक वह कितने सरापा इख़्लास इस्लाम दोस्त और खुश नुमा नज़र आते हैं लेकिन किरदार देखिए तो अब तक लाखों खुश अक़ीदा मुसलमानों का ईमान गारत कर चुके हैं । तौहीद का नाम ले कर रिसालत की तन्कीस करना उस गरोह का जमाअती शिआर बन चुका है ।*_

_*📚( 5 ) हदीस 10 में इस गरोह की एक पहचान यह भी बताई गई है कि वह सिर्फ मुसलमानों का खून बहाएंगे । मुश्रिकीन से कोई छेड़ नहीं करेंगे । नज्दी गरोह के बारे में इस ख़बर की तस्दीक करना चाहते हों तो मौलाना मुहम्मद अली जौहर का यह मुन्सिफ़ाना बयान पढ़िए । पिछले सफ्हात में मौलाना हुसैन अहमद साहब का भी इसी तरह का बयान गुज़र चुका है । नज्द और नज्दियों का यही कारनामा है कि मुसलमानों के खून में उनके हाथ रंगे हैं और गालिबन उस वक़्त भी यमन के मुसलमानों पर जंग की तैयारी है ।*_

_*📕( मकालाते मुहम्मद अली , हिस्सा अव्वल स०37 )*_

_*🌀तबलीगी जमाअत और नज्दी गरोह के दर्मियान चूंकि कोई खास फर्क नहीं है इसलिए यह निशानी तबलीगी जमाअत का अंजाम मालूम करने के लिए काफी है ।*_

_*📚( 6 ) हदीस नम्बर 11 , 12 में इस गरोह की एक ख़ास पहचान यह भी बताई गई है कि वह इल्तिज़ाम के साथ अपना सर मुंडाएंगे गोया यह फेअल उनका जमाअती शिआर बन जाएगा । अब इसकी तस्दीक के लिए अरब की मुस्तनद तारीख़ अल - फुतूहात अल - इस्लामिया के मुसन्निफ का यह बयान पढ़ लीजिए ।*_

_*✍🏻...हुजूर अलैहिस्सलात वस्सलाम का यह फरमान कि उनकी खास निशानी सर मुंडाना है यह नज्दी गरोह के हक में बिल्कुल सराहत है क्योंकि यही लोग अपने मुत्तबईन को सर मुंडाने की हिदायत करते हैं । सरकार की बताई हुई यह निशानी ख्वारिज और गुज़िश्ता बद दीन फ़िर्को में से किसी फिर्के के अन्दर मौजूद नहीं थी । यह शिआर सिर्फ वहाबिया नज्दीया का है ।*_

_*📕( अलफ़तूहाते इस्लामिया जिल्द 2 स० 368 )*_

               _*🌀एक अजीब नुक़्ता🌀*_

_*💫लफ्ज़ “ तहलीक की लुगवी तशरीह के सिलसिले में बहस व नज़र का एक गोशा बहुत ज्यादा काबिले तवज्जोह है और वह यह है कि तहलीक का तर्जमा आम तौर पर “ सर मुंडाना किया जाता है लेकिन देवबन्द की मोतमद किताब मिस्बाहुल - लुगात सफ : 148 में उसके हम माद्दह लफ्ज़ का तर्जमा “ चक्कर लगाना ” और “ हल्के में बैठना ” भी किया गया है । खालीयुज्ज़हन हो कर सोचिए तो यह दोनों तर्जमे तबलीगी जमाअत पर पूरी तरह फिट हो जाते हैं । एक तरफ तर्जमा अगर उनकी “ चलत फिरत ” को बताता है तो दूसरा तर्जमा उनके “ इज्तिमा ” की तरफ इशारा करता है ।*_

_*📕 तबलीग जमाअत हदीस की रोशनी में सफा, 18/19/20*_

_*📮जारी रहेगा इन्शाअल्लाह.....*_
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_*✍🏻 मुसन्निफ़ : - हज़रत अल्लामा मौलाना अरशदुल क़ादरी रहमतुल्लाह अलैह ।*_
_*📚हदीस की रोशनी में  {पोस्ट न. 08}*_
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                _*🌀तबलीग जमाअत🌀*_

                _*✨निशानियों की तलाश✨*_

_*📚( 1 ) हदीस 1 ता 8 में बताया गया है कि कुफ्र और शैतान के फिरने का मरकज़ मदीना के मश्रिकी सिम्त पर वाके होने वाला नज्द का खित्ता है । इसी मश्रिकी खित्ते से मुसलमान नाम का एक गरोह उठेगा जो कुरआन पढ़ेगा लेकिन कुरआन उसके हलक के नीचे नहीं उतरेगा । वह लोगों को कुरआन और दीन की तरफ बुलाएगा लेकिन दीन से उसका कोई तअल्लुक न होगा । अब तजुरबात की रौशनी में परख लीजिए कि सिवाए तबलीगी जमाअत के आज वह कौन सा गरोह है जिसका किनारा दिल्ली में है तो दूसरा कनारा नज्द के " रियाज़ ” से मिलता है ।*_

_*📚( 2 ) हदीस 9 , 10 , 11 जुल - खुवैसरह नामी जिस गुस्ताखे रसूल का वाकया बयान किया गया है वहीं यह भी मजकूर है कि वह कबीला बनी तमीम का आदमी था और आखिरी ज़माने में ज़ाहिर होने वाला गरोह उसी की नस्ल से होगा । अब अरब के मुस्तनद मुअरॆखीन का एक ताज़ा इंकिशाफ़ मुलाहिजा फरमाइए । मशहूर मुअरिंख अल्लामा जैनी दहलान अपनी किताब में लिखते हैं ।*_

_*✨और सबसे ज्यादा वाजेह बात यह है कि इब्ने अब्दुल - वहाब नज्दी का सिलसिल - ए - नसब बनी तमीम से है इसलिए कुछ बईद नहीं है कि जुल - खुवैसरह तमीमी की नस्ल से हो जिसके मुतअल्लिक बुखारी शरीफ़ में हज़रत अबू सईद खुदरी रज़ि अल्लाहु अन्हु से एक हदीस भी मन्कूल है ।*_

_*📕( अदुरर : स० 151 )*_

_*✨अलावा अज़ी ख्वारिज के बारे में साहिबे लमआत ने लिखा है कि उन में से कोई भी जुल - खुवैसरह की नस्ल से नहीं था । उनकी इबारत के अल्फाज़ यह हैं लम यकुन फ़िल - ख्वारिज . कौम बिन नस्ल ज़िल - खुवैसरह*_

_*📕( हाशिया मिश्कात : स० 535 )*_

_*💫इसलिए यह मानना पड़ेगा कि हदीस 9 , 10 , 11 में ज़ाहिर होने वाले गरोह से नज्दी गरोह मुराद लेना हकीकते वाकया के ऐन मुताबिक़ है ।*_

_*📚( 3 ) हदीस नम्बर 12 में इस गरोह की पहचान यह भी बताई गई है कि वह लोगों को कुरआन और दीन की तरफ बुलाएंगे हालांकि दीन से उनका कुछ भी तअल्लुक न होगा । इस खबर की तस्दीक करना चाहते हों तो तबलीगी जमाअत के हल्काए दर्से कुरआन और उनके दावती इज्तिमाआत को देख लीजिए लोगों को दीन और कुरआन की तरफ़ बुलाते - बुलाते उनकी ज़बानें खुश्क हो जाती हैं लेकिन किसी रोज़न से झांक कर देखिए तो यह सारी नुमाइश महज़ इसलिए है कि दीन में फ़साद पैदा करें ।*_

_*📕 तबलीग जमाअत हदीस की रोशनी में सफा, 17/18*_

_*📮जारी रहेगा इन्शाअल्लाह.....*_
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_*✍🏻 मुसन्निफ़ : - हज़रत अल्लामा मौलाना अरशदुल क़ादरी रहमतुल्लाह अलैह ।*_
_*📚हदीस की रोशनी में  {पोस्ट न. 07}*_
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                _*🌀तबलीग जमाअत🌀*_

                  _*✨हासिले मुताला✨*_
 
_*💫यह पन्द्रह हदीसें आपकी नज़र के सामने हैं । मैं आप से दरख्वास्त करूंगा कि एक बार फिर उन्हें गौर से पढ़ जाइए । बात पैग़म्बरे ज़ी शान की है जो गैब के रुमूज़ और मुस्तकबिल के असरार से पूरी तरह वाकिफ हैं । इसलिए पश्छिम का सूरज पूरब की तरफ़ डूब सकता है लेकिन नबी की बात कभी ग़लत नहीं हो सकती ।*_

_*✍🏻मैं आपको गैरते हक की कसम देता हूँ ! मज्कूरा बाला हदीसों में ज़रा भी यकीन हो तो हाथ में इंसाफ व दयानत का चिराग लेकर तलाश कीजिए कि आखिरी जमाने में जिस गरोह के जुहूर की पैगम्बर ने खबर दी है आज वह गरोह कहाँ है ?*_

_*🕋खुदा का शुक्र है कि खबर देने वाले ने इस गरोह को मुख्तलिफ निशानियों के जरिया इतना वाजेह कर दिया है कि अब वह दोपहर के उजाले में है । निशानियाँ इसी लिए बताई गई हैं कि उनकी रौशनी में दीन व ईमान के गारतगरों का सुराग लगाया जाए । मैं यकीन करता हूँ कि अगर कोई शख्स नबी की खुशनूदी के मुकाबले में अपनी ख्वाहिशात का गुलाम नहीं है तो उसके लिए इस फित्ने से नजर बचाना बहुत मुश्किल है । मैं वसूक के साथ कह सकता हूँ कि इन पन्द्रह हदीसों के दर्मियान बिखरी हुई जुमला निशानियों को अगर । आप तरतीब के साथ जमा कर दें तो वाकेआत व मुशाहिदात की सतह से नज्दी गरोह या तबलीगी जमाअत की तस्वीर पर अचानक उभर आएगी ।*_

_*✨और ज़हमत न हो तो थोड़ी देर के लिए अपनी निगाह का सर रिश्ता मेरी नोके कलम के साथ जोड़ दीजिए । मैं हदीसों के अंबार से निशानियां चुनता जा रहा हूँ । आप जोड़ते . जाइए । कुछ ही देर में तबलीगी जमाअत की तस्वीर न बन जाए तो मेरे कलम से अपना एतमाद उठा लीजिएगा ।*_

_*📕 तबलीग जमाअत हदीस की रोशनी में सफा, 15/16*_

_*📮जारी रहेगा इन्शाअल्लाह.....*_
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_*✍🏻 मुसन्निफ़ : - हज़रत अल्लामा मौलाना अरशदुल क़ादरी रहमतुल्लाह अलैह ।*_
_*📚हदीस की रोशनी में  {पोस्ट न. 06}*_
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                _*🌀तबलीग जमाअत🌀*_

                   _*📚पन्द्रहवीं हदीस📚*_
 
_*💫मुहद्दिसे कबीर इमाम अबू याला ने हज़रत अनस बिन मालिक रज़ि अल्लाहु अन्हु से इस हदीस की तख्रीज फरमाई और साहिबे इब्रीज़ ने उसे अपनी किताब में नकल किया है । हज़रत अनस बयान करते हैं कि मदीने में एक बड़ा ही आबिद व ज़ाहिद नौजवान था हम ने एक दिन हुजूर से उसका तज़्किरा किया । हुजूर उसे नहीं पहचान सके फिर उस के हालात व औसाफ़ बयान किए जब भी हुजूर उसे नहीं पहचान सके । यहाँ तक कि एक दिन वह अचानक सामने आ गया । जैसे ही उस पर नजर पड़ी हम ने हुजूर को खबर दी यह वही नौजवान है । हुजूर ने उसकी तरफ देख के इरशाद फरमाया उसके चेहरे पर मैं शैतान की खारिश के धब्बे देखता हूँ । इतने में वह हुजूर के करीब आया और सलाम किया हुजूर ने उस से मुखातब हो कर फरमाया क्या यह बात सही नहीं है कि तू अभी अपने दिल में यह सोच रहा था कि तुझ से बेहतर यहाँ कोई नहीं है । उस ने जवाब दिया । हाँ !*_

_*✨उसके बाद वह मस्जिद के अन्दर दाखिल हुआ । हुजूर ने आवाज़ दी कि कौन उसे कत्ल करता है । हज़रत अबू बकर ने जवाब दिया मैं । जब इस इरादा से मस्जिद के अन्दर गये तो उसे नमाज़ पढ़ता देख कर वापस लौट आए और अपने दिल में ख्याल किया कि एक नमाज़ी को कैसे कत्ल करूं । जब कि हुजूर ने नमाज़ी के कत्ल से मना किया है । फिर हुजूर ने आवाज़ दी कौन उसे कत्ल करता है हज़रत उमर ने जवाब दिया मैं । जब वह मस्जिद के अन्दर गये तो उस वक़्त नौजवान सज्दे की हालत में था वह भी उसे नमाज़ पढ़ता देख कर हज़रत अबू बक्र की तरह वापस लौट आए । फिर हुजूर ने आवाज़ दी कि कौन उसे कत्ल करता है हज़रत अली ने जवाब दिया मैं । - हुजूर ने फरमाया तुम उसे ज़रूर कत्ल कर दोगे बशर्ते कि वह तुम्हें मिल जाए । लेकिन जब हज़रत अली मस्जिद में दाखिल हुए तो वह जा चुका था । हुजूर ने इरशाद फरमाया अगर तुम उसे कत्ल कर देते तो मेरी उम्मत के जुमला फित्ना परदाज़ों में से यह पहला और आखिरी शख्स साबित होता । मेरी उम्मत के दो अफराद भी आपस में कभी नहीं लड़ते ।*_

_*📕( इब्रीज़ शरीफ़ स० 277 )*_

_*📕 तबलीग जमाअत हदीस की रोशनी में सफा, 14/15*_

_*📮जारी रहेगा इन्शाअल्लाह.....*_
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_*✍🏻 मुसन्निफ़ : - हज़रत अल्लामा मौलाना अरशदुल क़ादरी रहमतुल्लाह अलैह ।*_
_*📚हदीस की रोशनी में  {पोस्ट न. 05}*_
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                _*🌀तबलीग जमाअत🌀*_

                   _*📚बारहवीं हदीस📚*_

_*💫हज़रत अबू सईद खुदरी और हज़रत अनस बिन मालिक रज़ि अल्लाहु अन्हुमा से मिश्कात शरीफ में यह हदीस नकल की गई है । हुजूर अनवर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इरशाद फरमाया कि मेरी उम्मत में इख्तिलाफ व तफरीक का वाके होना मुकद्दर हो चुका है पर इस सिलसिले में एक गरोह निकलेगा जिसकी बातें बजाहिर दिलफ्रेब व खुशनुमा होंगी लेकिन किरदार गुमराह कुन और खराब होगा वह कुरआन पढ़ेंगे लेकिन उनके हलक के नीचे नहीं उतरेगा वह दीन से ऐसे निकल जाएंगे जैसे तीर शिकार से निकल जाता है फिर दीन की तरफ लौटना उन्हें नसीब न होगा यहाँ तक कि तीर अपने कमान की तरफ लौट आए वह अपनी तबीअत व सरिश्त के लिहाज से बदतरीन मख्लूक होंगे वह लोगों को कुरआन और दीन की तरफ बुलाएंगे हालांकि दीन से उन का कुछ भी तअल्लुक न होगा जो उन से जंग करेगा वह खुदा का मुकर्रब तरीन बन्दा होगा । सहाबा ने फरमाया उनकी खास पहचान क्या होगी या रसूलुल्लाह ﷺ! फरमाया , सर मुंडाना ।*_

_*📕( मिश्कात शरीफ स० 308 )*_

                   _*📚तेरहवी हदीस📚*_ 

_*💫इस हदीस की खुसूसियत यह है कि असल हदीस बयान करने से पहले हदीस के रावी हज़रत अली रजि अल्लाहु अन्हु ने फरमाया है कि कसम खुदा की आसमान से जमीन पर गिर पड़ना मेरे लिए आसान है लेकिन हुजूर की तरफ कोई झूठी बात मन्सूब करना बहुत मुश्किल है उसके बाद असल हदीस का सिलसिला यूं शुरू होता है । फरमाते हैं । मैंने हुजूर अनवर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को यह फरमाते हुए सुना कि अख़ीर ज़माने में नौ उम्र और कम समझ लोगों की एक जमाअत निकलेगी बातें वह बज़ाहिर अच्छी कहेंगे लेकिन ईमान उनके हलक के नीचे नहीं उतरेगा । वह दीन से ऐसे निकल जाएंगे जैसे तीर शिकार से निकल जाता है ।*_

_*📕( बुखारी जिल्द 3 , स० 1024 )*_

                   _*📚चौदहवीं हदीस📚*_

_*💫हज़रत अबू नईम ने हुलिया में अबू अमामा बाहली रज़ि अल्लाहु अन्हु से नकल किया है कि हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इरशाद फरमाया । अखीर ज़माने में कीड़े मकोड़ों की तरह हर तरफ “ मुल्लाने " फूट पड़ेंगे । पस तुम में से जो शख्स वह ज़माना पाए तो उसे चाहिए कि वह उन से खुदा की पनाह मांगे ।( हुलिया )*_

_*✨इसी के साथ यह हदीस भी पढ़ लीजिए जो मिश्कात शरीफ में हज़रत हसन बसरी रज़ि अल्लाहु अन्हु से मरवी है । हुजूरे अनवर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया कि लोगो ! एक ज़माना ऐसा भी आएगा जब किं लोग अपनी मस्जिदों में दुनिया की बातें करेंगे जब ऐसा ज़माना आ जाए तो तुम उनके सामने मत बैठना अल्लाह ऐसे लोगों से बेपर्वा है ।*_

_*📕( मिश्कात )*_

_*📕 तबलीग जमाअत हदीस की रोशनी में सफा, 11/12/13*_

_*📮जारी रहेगा इन्शाअल्लाह.....*_
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_*✍🏻 मुसन्निफ़ : - हज़रत अल्लामा मौलाना अरशदुल क़ादरी रहमतुल्लाह अलैह ।*_
_*📚हदीस की रोशनी में  {पोस्ट न. 04}*_
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                _*🌀तबलीग जमाअत🌀*_

                   _*📚नवीं हदीस📚*_

_*💫मिश्कात शरीफ़ में हज़रत अबू सईद खुदरी रज़ि अल्लाहु तआला अन्हु से मन्कूल है । वह कहते हैं कि हम लोग हुजूरे अनवर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की ख़िदमत में हाज़िर थे और हुजूर माले गनीमत तक़सीम फरमा रहे थे कि जुल - खुवैसरह नाम का एक शख्स , जो कबीला बनी तमीम का रहने वाला था आया और कहा ऐ अल्लाह के रसूल इंसाफ से काम लो । हुजूर ने फरमाया अफ़सोस तेरी जसारत पर मैं ही इंसाफ नहीं करूंगा तो और कौन इंसाफ़ करने वाला है । अगर मैं इंसाफ नहीं करता तो तू खाइब व खासिर हो चुका होता । हज़रत उमर से जब नहीं रहा गया तो उन्होंने अर्ज किया कि हुजूर मुझे इजाज़त दीजिए मैं उसकी गर्दन मार दूं । हुजूर ने फरमाया उसे छोड़ दो यह अकेला नहीं है उसके बहुत से साथी हैं जिनकी नमाज़ों और जिनके रोजों को देख कर तुम अपनी नमाजों और रोज़ों को हकीर समझोगे । वह कुरआन पढ़ेंगे लेकिन कुरआन उनके हलक के नीचे नहीं उतरेगा । ( इन सारी ज़ाहिरी खूबियों के बावजूद ) वह दीन से ऐसे निकल जाएंगे जैसे तीर शिकार से निकल जाता है ।*_

_*📕( मिशकात स० 535 , बुखारी जि० 2 स0 1024 )*_

                   _*📚दसवीं हदीस📚*_ 

_*💫यही वाकया दूसरे सिलसिल - ए - रिवायत से मरवी है जिसके अल्फाज़ यह हैं । एक शख़्स आया जिसकी आंख धंसी हुई थीं , पेशानी उभरी हुई थी , दाढ़ी घनी थी , दोनों गाल फूले हुए थे और सर मुंडा हुआ था । उस ने ज़बान तअन दराज़ की ऐ मुहम्मद ! अल्लाह से डरो हुजूर ने फरमाया मैं ही नाफरमान हो जाऊंगा तो अल्लाह की फरमाबरदारी कौन करेगा । अल्लाह ने तो मुझे ज़मीन वालों पर अमीन बनाया है । लेकिन तुम मुझे अमीन नहीं समझते । इसी दर्मियान में एक सहाबी ने उसके कत्ल की इजाज़त चाही हुजूर ने उन्हें रोक दिया जब वह शख़्स चला गया तो फरमाया कि उसकी नस्ल से एक जमाअत पैंदा होगी जो कुरआन पढ़ेगी लेकिन कुरआन उसके हलक के नीचे नहीं उतरेगा वह दीन से ऐसे निकल जाएंगे जैसे तीर शिकार से निकल जाता है वह मुसलमानों को कत्ल करेंगे और बुत परस्तों को छोड़ देंगे ।*_

_*📕( मिशकात शरीफ स० 535 )*_

                   _*📚ग्यारहवी हदीस📚*_

_*💫यही वाकया हज़रत शरीक इब्ने शिहाब रज़ि अल्लाहु अन्हु से भी मन्कूल है । उसमें उन्होंने उस गुस्ताख़ शख्स के मुतअल्लिक सरकारे रिसालत मआब का यह इरशाद नकल किया है । फिर हुजूर ने फरमाया कि आख़िरी ज़माने में एक गरोह निकलेगा गोया यह शख्स उसी गरोह का एक फ़र्द है । कुरआन पढ़ेंगे लेकिन कुरआन उनके हलक से नीचे नहीं उतरेगा । वह इस्लाम से ऐसे निकल जाएंगे जैसे तीर शिकार से । उनकी खास पहचान “ सरमुंडाना है वह हमेशा गरोह दर गरोह निकलते रहेंगे यहाँ तक कि उनका आख़िरी दस्ता मसीहुद्दज्जाल के साथ निकलेगा जब तुम उन से मिलोगे तो उन्हें अपनी तबीअत व सरिश्त के लिहाज़ से बदतरीन पाओगे*_

 _*📕( मिश्कात : स० 309 )*_

_*📕 तबलीग जमाअत हदीस की रोशनी में सफा, 9/10/11*_

_*📮जारी रहेगा इन्शाअल्लाह.....*_
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_*✍🏻 मुसन्निफ़ : - हज़रत अल्लामा मौलाना अरशदुल क़ादरी रहमतुल्लाह अलैह ।*_
_*📚हदीस की रोशनी में  {पोस्ट न. 03}*_
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                _*🌀तबलीग जमाअत🌀*_

                   _*📚छठी हदीस📚*_

_*💫यही अल्लामा दहलान रहमतुल्लाहि अलैहि यह हदीस भी कुतुबे हदीस से अपनी किताब मरा में तख्रीज फरमाते हैं कि हुजूरे अनवर सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम ने इरशाद फरमाया । कुछ लोग मश्रिक की सिम्त से ज़ाहिर होंगे जो कुरआन पढ़ेंगे लेकिन कुरआन उनके हलक के नीचे नहीं उतरेगा जब उनका एक गरोह ख़त्म हो जाएगा तो वहीं से दूसरा गरोह जन्म लेगा यहाँ तक कि उनका आखिरी दस्ता दज्जाल के साथ उठेगा ।*_

_*📕( अद्दुररुस्सुन्नीया मत्बूआ तुर्की व मिस्र : स० 50 )*_

                   _*✨एक और सुराग✨*_

_*💫दयारे नज्द में बनू हनीफा का वही बद किस्मत कबीला है जहाँ से शैतान की सींग तुलअ हुई और जिस की खाक से ज़लज़लों और फित्नों ने जन्म लिया । अब तारीख़ की एक बड़ी ट्रेजडी मुलाहिजा फरमाइए कि यह दिल आज़ार कबीला शुरू से सरकारे रिसालत मआब सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की रूहानी अजीयत और तबई कराहियत का मूजिब रहा है अहादीस में इस कबीले का ज़िक्र इन अल्फाज़ में किया गया है ।*_

                   _*📚सातवीं हदीस📚*_

_*💫अल्लामा दहलान ने अपनी किताब में कुतुबे हदीस से सरकारे अक्दस सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का इरशाद नकल किया है । कि रिसालत के इब्तिदाई अय्याम में हर मौसमे हज पर बाहर से आने वाले कबाइल के सामने में अपनी दावत पेश किया करता था । बनू हनीफा के जवाब से ज़्यादा कबीह और नापाक जवाब मुझे किसी कबीले ने नहीं दिया ।*_

_*📕( अदुररुस्सुन्नीया : स0 52 )*_

_*📍नोट : वाजेह रहे कि मसऊद आलम साहब नदवी की तस्रीह के मुताबिक वानू हनीफा का दूसरा नाम यमामा भी है ।*_

                   _*📚आठवीं हदीस📚*_

_*💫जामे तिर्मिज़ी में हज़रत इमरान इब्ने हसीन रज़ि अल्लाहु अन्हु से यह हदीस नकल की गई है । उन्होंने बयान किया कि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम तीन कबीलों को ताहयात नापसन्द फरमाते रहे । एक सकीफ , दूसरा बनी हनीफा , तीसरा बनी उमैया ।*_

_*📕( तिर्मिज़ी )_

_*✨पहली हदीस से लेकर आठवीं हदीस तक यह तमाम हदीसें नज्द के फित्ने को मुख्तलिफ़ ज़ावियों से समझने और बारगाहे रिसालत में इस खित्ते के मक्हर होने की जेहत को वाजेह करने के लिए बहुत काफी हैं । अब जेल की हदीसों में इस फित्ने के अलम बरदारों का और खद्दो खाल पढ़िए ।*_

_*📕 तबलीग जमाअत हदीस की रोशनी में सफा, 8/9*_

_*📮जारी रहेगा इन्शाअल्लाह.....*_
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_*✍🏻 मुसन्निफ़ : - हज़रत अल्लामा मौलाना अरशदुल क़ादरी रहमतुल्लाह अलैह ।*_
_*📚हदीस की रोशनी में  {पोस्ट न. 02}*_
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                _*🌀तबलीग जमाअत🌀*_

                   _*📚दूसरी हदीस📚*_


_*💫सही मुस्लिम शरीफ़ में हज़रत अब्दल्ला इब्ने उमर रज़ि अल्लाहु तआला अन्हुमा से यह हदीस नकल की गई है । बयान करते हैं कि एक दिन हुजूरे अनवर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम उम्मुल - मुमिनीन हज़रत हफ्सा के दरवाजे पर खड़े थे वहाँ से मश्रिक की तरफ अपने दस्ते मुबारक से इशारा किया और फरमाया कि फित्ना की जगह यह है यहाँ से शैतान की सींग निकलेगी ।*_

_*📕( मुस्लिम शरीफ़ जिल्द 2 स० 394 )*_

_*📕रावी को शक है कि यह अल्फाज़ हुजूर ने दो बार कहे या तीन बार ।*_

                    _*📚तीसरी हदीस📚*_

_*💫यही हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने उमर रज़ि अल्लाहु अन्हुमा की रिवायत से फिर मुस्लिम शरीफ में है । बयान करते हैं कि हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मश्रिक की तरफ रुख करके फरमाया कि फित्ना यहाँ से उठेगा फ़ित्ना यहाँ से उठेगा ,फित्ना यहाँ से उठेगा यहां से शैतान की सींग निकलेगी ।*_

_*📕( मुस्लिम शरीफ : जिल्द 2 , स० 393 )*_

                   _*📚चौथी हदीस 📚*_

_*💫फिर इन्हीं हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने उमर रज़ि अल्लाहु अन्हुमा से मुस्लिम शरीफ में तीसरी रिवायत नकल की गई है । बयान करते हैं कि एक दिन हुजूरे अनवर सल्लल्लाहु अलाह व सल्लम सैय्यदा आइशा रजि अल्लाहु तआला अन्हा के हरम से बाहर तशरीफ़ लाए और मश्रिक की तरफ इशारा करते हुए फरमाया कि कुफ्र का मरकज़ यहाँ है जहाँ से शैतान की सींग निकलेगी ।*_

_*📕( मुस्लिम शरीफ़ किताबुल - फ़ितन , जिल्द 2 , स० 394 )*_

_*✨गौर फरमाइए ! इन तीनों हदीसों में सिर्फ मश्रिक की सिम्त ही का ज़िक्र नहीं है कि उस से नज्द का ख़ित्ता मुराद लेने में किसी एहतमाल की गुंजाइश निकल आए बल्कि उसके साथ हर जगह ( मिन हैसु यतलओ करनश्शैतान , शैतान की सींग निकलेगी ) का इज़ाफ़ा वाजेह तौर पर बता रहा है कि मश्रिक की सिम्त से कोई दूसरा इलाका नहीं बल्कि ख़ास नज्द मुराद है क्योंकि बुखारी शरीफ़ की हदीस में नज्द के नाम के साथ नज्द का यह वस्फ जिक्र किया गया है इसलिए हदीस की ज़बान में मश्रिकी सिम्त में वह खित्ता है जहाँ से शैतान की सींग निकलेगी नज्द के सिवा और कोई दूसरा ख़ित्ता नहीं हो सकता ।*_

                   _*📚पाँचवीं हदीस📚*_

_*💫सैय्यदी अल्लामा दहलान रहमतुल्लाहि अलैहि ने अपनी किताब अद्दुररुस्सुन्नीया में कुतुबे हदीस से हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का यह फरमान नकल किया है । कुछ लोग मश्रिक की सिम्त से ज़ाहिर होंगे जो कुरआन पढ़ेंगे लेकिन कुरआन उनके हलक के नीचे नहीं उतरेगा वह लोग दीन से ऐसे निकल जाएंगे जैसे तीर शिकार से निकल जाता है फिर वह दीन में पलट कर नहीं आएंगे । यहां तक कि तीर अपने कमान की तरफ लौट आए । उनकी खास अलामत सर मुंडाना होगी ।*_

_*📕 तबलीग जमाअत हदीस की रोशनी में सफा, 6/7*_

_*📮जारी रहेगा इन्शाअल्लाह.....*_
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_*✍🏻 मुसन्निफ़ : - हज़रत अल्लामा मौलाना अरशदुल क़ादरी रहमतुल्लाह अलैह ।*_
_*📚हदीस की रोशनी में  {पोस्ट न. 01}*_
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                _*🌀तबलीग जमाअत🌀*_

                   _*📚पहली हदीस📚*_

_*💫हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने उमर रज़ि अल्लाहु तआला अन्हुमा से इमाम बुखारी ने यह हदीस नकल की है कि एक दिन हुजूरे अनवर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने शाम और यमन के लिए दुआ फरमाई जिस के अल्फाज़ यह हैं । . खुदावन्दा हमारे लिए शाम और यमन में बरकत नाज़िल फरमा ( दुआ करते वक़्त नज्द के कुछ लोग भी बैठे हुए थे )   उन्होंने अर्ज किया और हमारे नज्द में या रसूलुल्लाह ! उस पर हुजूर ने इरशाद फरमाया खुदावन्दा ! हमारे लिए हमारे शाम और यमन में बरकत नाज़िल फरमा । फिर दोबारा नज्द . के लोगों ने अर्ज किया और हमारे नज्द में या रसूलुल्लाह ! रावी का बयान है कि तीसरी मरतबा में हुजूर ने फरमाया वह जलज़लों और फित्नों की जगह है और् वहाँ से शैतान की सींग निकलेगी ।*_


_*📕( बुखारी शरीफ जिल्द 2 स० 1051 )*_

_*💫आम तौर पर “ करनिश्शैतान ” का तर्जमा “ शैतान की सींग किया जाता है लेकिन देवबन्द के मिस्बाहुल्लुगात में उसका तर्जमा “ शैतान की राय का पाबन्द " भी किया गया है ।*_

_*💫बहरहाल इस हदीस से मालूम हुआ कि नज्द खैर व बरकत की जगह नहीं बल्कि फित्ना व शर की जगह है । क्योंकि रहमतुल - लिल - आलमीन की दुआए खैर से महरूम हो जाने के मानी ही यह हैं कि हमेशा के लिए इस खित्ते पर शकावत और बदबख़्ती की मुहर लग गई । अब वहां से किसी खैर की तवक्कू रखना तक्दीरे इलाही से जंग करना है ।*_

_*✨दूसरी बात यह मालूम हुई कि वहाँ की खाक से कोई ऐसा शख्स ज़रूर उठेगा जो शैतान की राय का पाबन्द होगा या जिस तरह सूरज की फैल जाने वाली पहली किरन को “ करनुशम्स ” कहते हैं इसी तरह शैतान का फित्ना भी वहाँ से सारे जहान में फैल जाएगा ।*_

                  _*✨इशार - ए - महसूस✨*_

_*💫नज्द व हिजाज़ का एटलस ( जुगराफ़ियाई नक्शा ) सामने - रखिए तो आपको वाजेह तौर पर नज़र आएगा कि नज्द का इलाका मदीना मुनव्वरा के बिल्कुल मशरिकी सिम्त में वाके है । मदीने से सरकारे मदीना ने जिन अल्फाज़ में उस सिम्त की तरफ इशारा किए हैं वह एक वफादार मोमिन को चौंका देने के लिए काफी हैं उससे अन्दाज़ा होता है कि निगाहे रिसालत पनाह में नज्द का फ़ित्ना उम्मत के लिए किस दरजा हौलनाक और ईमान शिकन था । अब इस उनवान पर जैल में हदीसों की कतार मुलाहिज़ा फरमाइए ।*_

_*📕 तबलीग जमाअत हदीस की रोशनी में सफा, 4/5*_

_*📮जारी रहेगा इन्शाअल्लाह.....*_
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_*✍🏻 मुसन्निफ़ : - हज़रत अल्लामा मौलाना अरशदुल क़ादरी रहमतुल्लाह अलैह ।*_

Al Waziftul Karima 👇🏻👇🏻👇🏻 https://drive.google.com/file/d/1NeA-5FJcBIAjXdTqQB143zIWBbiNDy_e/view?usp=drivesdk 100 Waliye ke wazai...