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Tuesday, September 25, 2018



_*Taziyah Ki Asal Kiya Hai,, Shara Mein.*_

_*✅ Shari'at Mein Taziyah Ki Koi Asal Nahi Hai. Yeh Aaj Jis Shakal Mein Paaya Jata Hai Mehez Aafat, Nahusat, Musibat, Islam Ke Rukh Roshan Par Kalank Aur Sarih Bidat O Jahalat Hai.*_

_*Aala Hazrat (Radiallahu Ta'ala Anhu) Farmate Hain :*_

_*Tazih Raijah Majmaa Bidaat E Shaniya Sayyiea Hai, Is Ka Banana Deikhna Jaaiz Nahi, Aur Tazeem O Aqeedat Sakht Haraam O Ashad Bidat.*_

_*📕 Fatawa Rizwiya , Jild 24, Safa 489*_

_*Ek Jagah Farmate Hain :*_

_*Taziyah Raijah Najaaiz O Bidat Hai, Aur Is Ka Banana Gunah O Masiat Aur Is Par Sheereeni Waghera Charhana Mehez Jahalat Aur Is Ki Tazeem Bidat O Jahalat.*_

_*📕 Fatawa Rizwiya , Jild 24, Safa 500*_

_*Ek Jagah Yun farmate Hain :*_

_*Taziyah, Mehndi Roshni Mazkoor Sab Bidat O Najaaiz Hai.*_

_ *📕 Fatawa Rizwiya , Jild 24, Safa 500*_

_*Aur Farmate Hain :*_

                                 _*Taziyah Banana Shirk Nahi, Yeh Wahabiya Ka Khayaal Hai, Haan Bidat O Gunah Hai.*_

_*📕 Fatawa Rizwiya , Jild 24, Safa 503*_

_*Ek Jagah Is Terhan Likhte Hain:*_

_*Taziyah Jis Terhan Raaij Hai Zarur Bidat Shaneiya Hai, Jis Qader Baat Sultan Taimoor Ne Ki Ke Roza Mubarak Hazrat Imam رضي الله تعالى عنه Ki Sahih Naqal Taskeen Shoq Ko Rakhi Woh Aisi Thi Jaisay Roza Munawwara O Kaaba Muazzama Ke Naqshay, Is Waqt Tak Is Qader Mein Harj Nah Tha, Ab Bawaja Shiya O Shabeeh Is Ki Bhi Ijazat Nahi.*_

_*📕 Fatawa Rizwiya , Jild 24, Safa 504*_

_*Yaran Tizgam Aur Awargaan Fikar O Nazar Aala Hazrat (Radiallahu Ta'ala Anhu) Ko Samjhay Baghair Sir Par Uthaye Ghumte Hain Aur Naachtay Thiraktay Hoye Kehte Phirtay Hain Ke Aala Hazrat Ne Taziyah Banana Jaaiz Keh Diya, Halaank Un Badaqlo'n Ko Kon Bataye Ke Aala Hazrat Ne Ghar Mein Rakhnay Ke Liye Banaye Jane Walay Imam Hussain Ke Roze Ki Asal Naqal Ko Bhi Mana Kar Diya.*_

 *فاعتبروا يا أولي الأبصار*

_*Taziyah Jaisi Manhus Balaa Se Mutaliq Sayyidi Aala Hazrat قدس سرہ العزیز Ke Itnay Fatawa Hain Ke Agar Un Ko Jama Kar Diya Jaye To Is Nahusat Ka Janaza Nikal Jaye.*_
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Saturday, September 1, 2018



                _*ताजिया'दारी हराम है*_
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_*ताजिया निकालना, देखना, जुलूस में शामिल होना सरासर खुराफाती अमल!*_

_*अल्लाह सुब्हानहू व तआला का फरमान मुबारक है👇🏻*_

_*“किसी ऐसी चीज की पैरवी  ना करो (यानि उसके पीछे न चलो , उसकी इत्तेबा ना करो) जिसका तुम्हें इल्म ना हो , यकीनन तुम्हारे कान, आँख, दिमाग (की कुव्वत जो अल्लाह ने तुमको अता की है) इसके बारे में तुमसे पूछताछ की जाएगी”*_

_*📕 सूर:बनी इस्राईल 17, आयत 36*_

_*नबी ए करीम (Sallallahu Ta'ala Alaihi Wasallam) ने फ़रमाया “इल्म सीखना हर मुसलमान मर्द-औरत पर फ़र्ज है"*_

_*📕 इब्ने माजा हदीस न. 224*_

_*यानि इतना इल्म जरुर हो कि क्या चीज शरीअत में हलाल है क्या हराम और क्या अल्लाह को पसंद है क्या नापसंद , कौन से काम करना है और कौन से काम मना है और कौन से ऐसे काम है जिनको करने पर माफ़ी नहीं मिल सकती!*_

_*अब लोगों का क्या हाल है एक तरफ तो अपने आपको मुसलमान भी कहते है दूसरी तरफ काम इस्लाम के खिलाफ़ करते है और जब कोई उनको रोके तो उसको कहते है कि ये काम तो हम बाप दादा के ज़माने से कर रहे हैं, यही वो बात है जिसको अल्लाह ने कुरआन में भी फरमा दिया सूर: अलबकर आयत 170 में-*_

_*"और जब कहा जाये उनसे की पैरवी करो उसकी जो अल्लाह ने बताया है तो जवाब में कहते है कि हम तो चलेंगे उसी राह जिस पर हमारे बा दादा चलें, अगर उनके बाप दादा बेअक्ल हो और बे-राह हो तब भी (यानि दीन की समझ बूझ ना हो तब भी उनके नक्शेकदम पर चलेंगे?)*_

_*हक़ीकत खुराफ़ात में खो गई! जी हाँ मुहर्रम की भी हकीकत खुराफ़ात में खो गई उलमाओं के फतवे और अहले हक़ लोगों के बयान मौजूद है फिर भी मुहर्रम की खुराफ़ात पर लोग यही दलील देते है कि यह काम हम बाप दादों के ज़माने से करते आ रहे हैं.? बेशक करते होंगे लेकिन कौन से इल्म की रौशनी में जाहिर है वो इल्म नहीं बेईल्मी होगी क्योंकि इल्म तो इस काम को मना कर रहा है! आप खुद पढ़े*_

_*हजरत सय्यिदना अब्दुल क़ादिर जीलानी (Radiallahu Ta'ala Anhu) का फ़तवा👇🏻*_

_*अगर इमाम हुसैन (Radiallahu Ta'ala Anhu) की शहादत के दिन को ग़म का दिन मान लिया जाए तो पीर का दिन उससे भी ज्यादा ग़म करने का दिन हुआ क्यूंकि रसूले खुदा (Sallallahu Ta'ala Alaihi Wasallam) की वफात उसी दिन हुई है!*_

_*📕 गुन्यतुत्तालिबीन , पेज 454*_

_*हज़रत मौलाना अहमद रज़ा खां साहब बरेलवी अलैहिर्रहमा का फ़तवा👇🏻*_

_*1- अलम, ताजिया, अबरीक, मेहंदी, जैसे तरीके जारी करना बिदअत है, बिदअत से इस्लाम की शान नहीं बढती, ताजिया को हाजत पूरी करने वाला मानना जहालत है, उसकी मन्नत मानना बेवकूफी, और ना करने पर नुकसान होगा ऐसा समझना वहम है, मुसलमानों को ऐसी हरकत से बचना चाहिये!*_

_*📕 रिसाला मुहर्रम व ताजियादारी, पेज 59*_

_*2). ताजिया आता देख मुहं मोड़ ले, उसकी तरफ देखना भी नहीं चाहिये!*_

_*📕 इर्फाने शरीअत, पहला भाग पेज 15*_

_*3). ताजिये पर चढ़ा हुआ खाना न खाये, अगर नियाज़ देकर चढ़ाये या चढ़ाकर नियाज़ दे तो भी उस खाने को ना खाए उससे परहेज करें!*_

_*📕 पत्रिका ताजियादारी ,पेज 11*_

_*मसला:- किसी ने पूछा हज़रत क्या फरमाते हैं, इन अमल के बारे में*_

_*सवाल 1- कुछ लोग मुहर्रम के दिनों में न तो दिन भर रोटी पकाते है और न झाड़ू देते है, कहते है दफ़न के बाद रोटी पकाई जाएगी!*_

_*सवाल 2- मुहर्रम के दस दिन तक कपड़े नहीं उतारते!*_

_*सवाल 3- माहे मुहर्रम में शादी नहीं करते!*_
_*अलजवाब:- तीनों बातें सोग की है और सोग हराम है*_

_*📕 अहकामे शरियत ,पहला भाग, पेज 171*_

_*हज़रत मौलाना मुहम्मद इरफ़ान रिज्वी साहिब बरेलवी का फ़तवा, ताजिया बनाना और उस पर फूल हार चढ़ाना वगेरह सब नाजायज और हराम है!*_

_*📕 इरफाने हिदायत, पेज 9*_

_*हज़रत मौलाना अमजद अली रिज्वी साहिब बरेलवी का फ़तवा👉🏻 अलम और ताजिया बनाने और पीक बनने और मुहर्रम में बच्चों को फ़क़ीर बनाना बद्दी पहनाना और मर्सिये की मज्लिस करना और ताजियों पर नियाज़ दिलाने वगैरह खुराफ़ात है उसकी मन्नत सख्त जहालत है ऐसी मन्नत अगर मानी हो तो पूरी ना करें!*_

_*📕 बहारे शरियत, हिस्सा 9, पेज 35, मन्नत का बयान*_

_*ताजियादारी आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा बरेलवी की नज़र में👉🏻 ये ममनूअ् है, शरीअत में इसकी कुछ असल नहीं और जो कुछ बिदअत इसके साथ की जाती है सख्त नाजायज है, ताजियादारी में ढोल बजाना हराम है!*_

_*📕 फतावा रिजविया, पेज 189, जिल्द 1, बहवाला खुताबते मुहर्रम*_
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Sunday, August 26, 2018



                  _*ताज़िया-दारी हराम है*_
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_*लोग ताजिया बनाकर अहले सुन्नत को बदनाम करते हैं.*_
_*जबकि अहले सुन्नत के उलमा भी ताजिये को मना करते है.*_

_*ताजिया दारी हराम है, हराम है, हराम है,*_

_*कुरान फरमाता है 👇🏻*_

_*"और उन लोगों से दूर रहो जिन्होंने*_
_*अपने दीन को खेल तमाशा बना लिया."*_

_*📕 पारा: 7*_

_*हदीस में है 👇🏻*_

_*जो (मैय्यत के ग़म में) गाल पीटे, गरीबन फाड़े,*_
_*और चीख व पुकार मचाये वो हम में से नहीं"*_

_*📕 बुखारी शरीफ़*_

_*रसूलअल्लाह सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने फरमाया*_
_*मेरी उम्मत में ऐसे लोग भी होंगे जो ढोल बाजो को हलाल (जाइज़) कर देंगे*_

_*📕 बुखारी शरीफ़*_

_*उलमा ए अहले सुन्नत:*_
_*फतवे: मुहर्रम में जो ताजियादारी होती है गुम्बद नुमा ताजिया बनाये जाते है ये नाजायेज़ है*_

_*📕 फतावा अजीजिया*_

_*आला हजरत इमाम अहमद रज़ा खान फरमाते है:*_
_*ताजिया बिदअत, नाजायेज़ व हराम है*_

_*📕 फतवा रजविया*_

_*मुफ्तिये आज़म ए हिन्द, मौलाना मुस्तफ़ा रज़ा खान:*_
_*ताज़ियादारी शर'अन नाजायेज़ है*_

_*📕 फतावा मुस्ताफ्विया*_

_*मुफ़्ती मुहम्मद अमज़द अली आज़मी:*_
_*ये वाकिया तुम्हारे लिए नसीहत था तुमने इसे खेल तमाशा बना लिया,*_

_*📕 बहारे शरीअत*_

_*ताजिया बनाना, बाजे ताशे के साथ उठाना, इस की ज्यारत करना, अदब करना, ताज़ीम करना, सलाम करना, चूमना, बच्चो को दिखाना, हरे कपडे पहनना, फकीर बनाना,*_
_*भिक मंगवाना, ये सब नाजायेज़ व गुनाह है*_

_*📕 शमा ए हिदायत*_

_*मुफ़्ती जलालुद्दीन साहब: हिंदुस्तान में जिस तरह आम तौर में*_
_*ताजियों का रिवाज़ है, बेशक हराम नाजायेज़ व बिद'अत है,*_

_*📕 फतवा फैज़ुर्रुसूल*_

_*ये सारे हवाले अहले सुन्नत की किताबो में से है,*_
_*कहीं भी ये नहीं पाया गया की सुन्नी आलिमो ने ताजिये को जायेज़ कहा।*_

_*लोग बिलावजह नाम बदनाम करते हैं।*_
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_*मुरव्विजह ताज़ियादारी नाजायजो हराम है.!*_
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_*अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त क़ुर्आन में इरशाद फरमाता है*_

_*और छोड़ दे उनको जिन्होंने अपना दीन हंसी खेल बना लिया और उन्हें दुनिया की ज़िन्दगी ने फरेब दिया*_

_*📕 पारा 7, सूरह इनआम, आयत 70*_

_*जिन्होंने अपने दीन को खेल तमाशा बना लिया और दुनिया की ज़िन्दगी ने उन्हें फरेब दिया तो आज उन्हें हम छोड़ देंगे जैसा कि उन्होंने इस दिन के मिलने का ख्याल छोड़ा था और हमारी आयतों से इनकार करते थे*_

_*📕 पारा 8, सूरह एराफ, आयत 51*_

*_क्या आज ताज़ियादारी के नाम पर यही खेल तमाशा नहीं किया जाता, क्या ढ़ोल ताशे नहीं बजाये जाते, क्या लाठियां नहीं नचाई जाती, क्या करतब नहीं दिखाए जाते, क्या मेले ठेले झूले नहीं लगते, क्या अलम के नाम पर नाजायज़ों खुराफात नहीं होती, क्या औरतों और मर्दों का नाजायज़ मेला नहीं लगता, उसमें हराम कारियां नहीं होती क्या इन सबको तमाशा नहीं कहेंगे, और उस पर सबसे बढ़कर ये कि लकड़ियों खपच्चियों से 2 क़ब्रें बनाकर उन पर लाल-हरा कपड़ा चढ़ाकर माज़ अल्लाह एक को हज़रत इमाम हसन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की क़ब्र और दूसरी को हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की क़ब्र समझकर उन पर फूल डालना, नाड़ा बांधना, मन्नत मांगना क्या ये सब खुली हुई जिहालत नहीं है, ऐ इमाम हुसैन के नाम निहाद शैदाईयों क्या इन्ही सब खुराफात के लिए इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु ने करबला में भूखे प्यासे रहकर शहादत पेश फरमाई थी, क्या यही माज़ अल्लाह मसलके इमाम हुसैन था क्या उन्होंने यही कहा था कि भले ही नमाज़ें फौत हो जाएं मगर ऐ जाहिलों तुम अपने कांधों पर से मस्नूई जनाज़ा ना उतारना, तू अपने आपको इमाम हुसैन का शैदाई तो ज़रूर कहता है मगर तू अपने दावे में बिलकुल झूठा है अगर तू सच्चा होता तो वो करता जो मेरे इमाम ने फरमाया बल्कि जो करके दिखाया क्या तुझे याद नहीं कि 3 दिन के भूखे प्यासे इमाम के जिस्म पर 72 तीर और तलवार के ज़ख्म मौजूद थे मगर जब नमाज़ का वक़्त आया तो आपने अपने दुश्मनों से नमाज़ पढ़ने की इजाज़त चाही और नमाज़ अदा की, ताज़िया बनाने उठाने वालों अगर तुम सच्चे शैदाईये हुसैन होते तो याद करते कि बैयत करना सिर्फ एक सुन्नत ही तो है अगर आप चाहते तो युंही यज़ीद की बैयत कर लेते बाद को तोड़ देते मगर आपने उस मक्कार झूठे फरेबी फासिको फाजिर ज़ालिम शराबी ज़ानी बदकार बदकिरदार यज़ीद की बैयत ना की और पूरा घर का घर लुटा दिया मगर दीने मुहम्मद पर आंच ना आने दी, क्या इमाम हुसैन की तरफ से भी ढ़ोल ताशे नगाड़े बजाए जाते थे क्या उनकी तरफ से भी नमाज़ों को फौत किया जाता था क्या उनकी तरफ से भी नाजायज़ों खुराफात हुआ करती थी माज़ अल्लाह, नहीं और हरगिज़ नहीं, वो सच्चे उनका दीन सच्चा तू झूठा, और अगर तू सच्चा है तो मान जा वो बात जो उन्होंने मना फरमाई और जो उनके नाना जान हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम ने मना फरमाई, आप फरमाते हैं कि_*

_*जो मय्यत के ग़म में गाल पीटे गिरेहबान फाड़े और ज़माना जाहिलियत की सी चीखों पुकार करे वो हममे से नहीं*_

_*📕 बुखारी शरीफ, जिल्द 1, सफह 173*_

*_दूसरी जगह हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम इरशाद फरमाते हैं कि_*

_*उम्मे अतिया रज़ियल्लाहु तआला अन्हा कहती हैं कि हुज़ूर ने हमें मय्यत पर नोहा करने से मना किया*_

_*📕 बुखारी शरीफ, जिल्द 1, सफह 175*_

_*लोगों में 2 बातें ज़मानये जाहिलियत यानि कुफ्र के दौर की निशानियां है एक तो किसी के नस्ब पर लअन तअन करना और दूसरा मय्यत पर मातम करना*_

_*📕 मुस्लिम शरीफ, जिल्द 1, सफह 58*_

_*हुज़ूर ने नोहा करने वाले और सुनने वाले दोनों पर लानत फरमाई*_

_*📕 अबू दाऊद, जिल्द 2, सफह 90*_

*_और ताज़ियादारी मातम करने का ही एक तरीक़ा है जिसे हिंदुस्तान में शिया फिर्क़े के एक शख्स तैमूर लंग जो कि 1336 ईसवी में पैदा हुआ और 68 साल की उम्र में यानि 1405 में मरा ने रायज की, ये हर साल अशरये मुहर्रम में ईरान जाया करता था मगर एक साल बीमारी के सबब ना जा सका तो उसके मानने वालों ने यहीं ताज़िये की शक्ल में एक शबीह बना दी जिससे ये बहुत खुश हुआ और धीरे धीरे यही मरदूद रस्म पूरे हिन्दुस्तान में फैल गयी जिससे आज शायद ही कोई गली मुहल्ला बचा हो, हालांकि मुरव्विजह ताज़ियादारी नाजायज़ों हराम है जिस पर आलाहज़रत के ज़माने से कई साल पहले के एक जय्यद आलिम हज़रत शाह अब्दुल अज़ीज़ मुहद्दिस देहलवी रज़ियल्लाहु तआला अन्हु फरमाते हैं कि_*

_*अशरये मुहर्रम में जो ताज़ियादारी होती है कि गुम्बद नुमा ताज़िये बनाये जाते हैं और तरह तरह की तस्वीरें बनायीं जाती है यह सब नाजायज़ है, और इसमें किसी तरह की मदद करना गुनाह है*_

_*📕 फतावा अज़ीज़िया, जिल्द 1, सफह 75*_

_*और उससे भी कई सौ साल पहले सुल्तान औरंगज़ेब आलमगीर रहमतुल्लाह तआला अलैहि ने अपने ज़माने में तमाम ताज़ियों मेंहदियों और झूलों को बनाने और निकालने पर सख्ती से पाबन्दी लगाई थी*_

_*📕 औरंगज़ेब आलमगीर, सफह 274*_
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Al Waziftul Karima 👇🏻👇🏻👇🏻 https://drive.google.com/file/d/1NeA-5FJcBIAjXdTqQB143zIWBbiNDy_e/view?usp=drivesdk 100 Waliye ke wazai...