Showing posts with label बहारे शरीअ्त (हिस्सा - 01). Show all posts
Showing posts with label बहारे शरीअ्त (हिस्सा - 01). Show all posts

Wednesday, November 13, 2019




  _*बहारे शरीअत, हिस्सा- 01 (पोस्ट न. 176)*_
_*―――――――――――――――――――――*_

             _*👑विलायत का बयान👑*_

_*👁️तम्बीह : - चूंकि आम तौर पर मुसलमानों को अल्लाह के फज्ल और करम से औलिया - ए - किराम से नियाजमन्दी और पीरों के साथ एक खास अकीदत होती है । उन के सिलसिले में दाखिल होने को दीन और दुनिया की भलाई । समझते हैं । इसीलिये इस जमाने के वहाबियों ने लोगों को गुमराह करने कि लिए यह जाल फैला रखा है कि पीरी मुरीदी भी शुरू कर दी । हालांकि यह लोग औलिया के मुन्किर हैं इसीलिए जब किसी का मुरीद होना हो तो खूब अच्छी तरह तहकीक कर लें । नहीं तो अगर कोई बदमजहब हुआ तो ईमान से भी हाथ धो बैठेंगे ।*_

_*ऐ बसा इबलीस आदम रूये हस्त पस ब हर दस्ते न बायद दाद दस्त*_

_*📝तर्जमा : - " होशियार , खबरदार अक्सर इबलीस आदमी की शक्ल में होता है । इसलिये हर ऐरे के हाथ में हाथ नहीं देना चाहिए । " पीरी के लिये शर्त : - पीर के लिए चार शर्ते हैं । बैअत करने और मुरीद होने से पहले उनको ध्यान में रखना फर्ज है ।*_

_*( 1 ) पीर सुम्नी सहीहुल अकीदा हो ।*_
_*( 2 ) पीर इतना इल्म रखता हो कि अपनी जरूरत के मसाइल किताबों से निकाल सके ।*_
_*( 3 ) फासिके मोलिन न हो । यानी खुले आम गुनाहे कबीरा में मुलव्विस न हो जैसे नमाज छोड़ना , गाने बजाने में मशगूल रहना या दाढ़ी मुंडाना वगैरा ।*_
_*( 4 ) उसका सिलसिला हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम तक मुत्तसिल हो ।*_
_*📝तर्जमा : - " हम दीन दुनिया और आख़िरत में अल्लाह से माफी और आफियत माँगते हैं और पाकीज़ा शरीअत पर इस्तिकामत ( मज़बूती के साथ काइम रहना ) चाहते हैं । और मुझे अल्लाह ही की जानिब से तौफीक है उसी पर मैंने भरोसा किया और उसी की जानिब माइल हुआ और दूरूद नाजिल फरमाये अल्लाह तआला अपने हबीब पर , उन की आल असहाब उनके फर्जन्दों और उनकी जमात पर हमेशा हमेशा , और तमाम तारीफ खास कर अल्लाह को जो तमाम आलम का रब है ।*_

_*फ़कीर अमजद अली आज़मी हिन्दी तर्जमा मुहम्मद अमीनुल कादरी बरेलवी*_

_*📕 बहारे शरिअत हिस्सा 1, सफा 71/72*_

_*🤲 तालिबे दुआँ क़मर रज़ा ह़नफ़ी*_

_*📮बहारे शरिअत हिस्सा 1 खत्म हुआ इंशा'अल्लाह अब हिस्सा 2 से पोस्ट शुरुआत करेंगे*_
━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━


  _*बहारे शरीअत, हिस्सा- 01 (पोस्ट न. 175)*_
_*―――――――――――――――――――――*_

                 _*👑विलायत का बयान👑*_

_*🌟मसअ्ला : - औलिया से इस्तिमदाद और इस्तिआनत ( मदद चाहना या माँगना ) बेहतर है । यह लोग मदद माँगने वालों की मदद करते हैं उनसे मदद माँगना किसी जाइज़ लफ्ज़ से हो , मुसलमान औलिया को कभी मुस्तकिल फाइल ( करने वाला ) नहीं मानते वहाबियों का फरेब है कि वे मुसलमानों के अच्छे कामों को भोंडी शक्ल में पेश करते हैं और यह वहाबियत का खास्सा हैं । ( कहने का मतलब यह है कि वहाबी जाइज़ अल्फाज़ से मदद को भी शिर्क बताते हैं जबकि जाएज़ तरीके से मदद माँगना जाइज़ और नाजाइज़ तौर पर मदद माँगना गुनाह । हाँ अगर किसी ने मदद करने वाले को अल्लाह का शरीक जाना या यह जाना कि बिना अल्लाह तआला के दिए किसी और से मिला तो ऐसा करने वाला मुश्रिक और काफिर हुआ और मुसलमान ऐसा हरगिज़ नहीं करते ।*_

 _*🌟मसअ्ला : - औलिया के मज़ारात पर हाज़िरी मुसलमानों के लिए नेकी और बरकत का सबब है ।*_

_*🌟मसअ्ला : - अल्लाह के वलियों को दूर और नज़दीक से पुकारना बुजुर्गों का तरीका है ।*_

_*🌟मसअ्ला : - औलियाए किराम अपनी कब्रों में हमेशा रहने वाली ज़िन्दगी के साथ ज़िन्दा हैं । उनके इल्म इदराक ( समझ बूझ ) उनके सुनने और देखने में पहले के मुकाबले में कहीं ज़्यादा तेज़ी है ।*_

 _*🌟मसअ्ला :- औलिया को ईसाले सवाब करना न मुस्तहब चीज़ है और बरकतों का ज़रिया है । उसे आरिफ लोग नज्र व नियाज़ कहते हैं । यह नज़र शरई नहीं जैसे बादशाह को नज़्र देना उन में ख़ास कर ग्यारहवीं शरीफ की फातेहा निहायत बड़ी बरकत की चीज़ है ।*_

_*🌟मसअ्ला : - औलियाए किराम का उर्स यानी कुर्आन शरीफ़ पढ़ना , फातिहा पढ़ना , नात शरीफ पढ़ना , वाज़ , नसीहत और ईसाले सवाब अच्छी चीज़ हैं । रही वह बातें कि उर्स में नासमझ लोग कुछ खुराफातें शामिल कर देते हैं तो इस किस्म की खुराफातें तो हर हाल में बुरी हैं और मुकद्दस मज़ारों के पास तो और भी ज्यादा बुरी हैं ।*_

_*बहारे शरिअत हिस्सा 1, सफा 71*_

_*🤲 तालिबे दुआँ क़मर रज़ा ह़नफ़ी*_

_*📮जारी रहेगा.....*_
━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━


  _*बहारे शरीअत, हिस्सा- 01 (पोस्ट न. 174)*_
_*―――――――――――――――――――――*_

                 _*👑विलायत का बयान👑*_

_*🌟मसअ्ला : - कोई कितना ही बड़ा वली क्यों न हो जाये शरीअत के अहकाम की पाबन्दी में छुटकारा नहीं पा सकता । कुछ जाहिल जो यह कहते हैं कि ' शरीअत रास्ता है और रास्ते की जरूरत उनको है जो मक़सद तक न पहुँचे हों हम तो पहुँच गये । हज़रते जुनैद बगदादी रदियल्लाह तआला अन्हु ऐसे लोगों के बारे में यह फरमाते हैं कि*_

_*📝तर्जमा : - " वह सच कहते हैं बेशक पहुँचे मगर कहाँ ? जहन्नम को " अलबत्ता अगर मजजूबियत की वजह से अक्ल जाइल हो गई हो जैसे बेहोशी वाला तो उससे शरीअत का कलम उठ जायेगा । मगर यह भी समझ लीजिए कि जो इस किस्म का होगा उसकी ऐसी बातें कभी न होंगी और कभी शरीअत का मुकाबला न करेगा ।*_

_*🌟मसअल : - औलियाए किराम को बहुत बड़ी ताकत दी गई है । उनमें जो असहाबे ख़िदमत हैं उनको तसर्रुफ का इख्तियार दिया जाता है । और स्याह सफेद के मुख्तार बना दिये जाते हैं । औलिया - ए - किराम नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के सच्चे नाइब हैं उनको इख्तियारत और तसर्रुफात हुजूर की नियाबत में मिलते हैं । गैब के इल्म उन पर खोल दिये जाते हैं । उनमें से बहुतों को ' माकान व मायकुन ' और लौहे महफूज की खबर दी जाती है । मगर यह सब हुजूर अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के वास्ते और देन से है । बगैर रसूल के वास्ते किसी गैरे नबी को किसी गैब की कोई खबर नहीं हो सकती ।*_

 _*☝🏻अकीदा : - औलियाए किराम की करामतें हक हैं । इस हकीकत का इन्कार करने वाला गुमराह है ।*_

_*🌟मसअ्ला : - मुर्दा ज़िन्दा करना , पैदाइशी अन्धे और कोढ़ी को शिफा देना , मशरिक से मगरिब तक सारी जमीन एक कदम में तय करना , गर्ज तमाम ख़वारिके आदात करामतें ( वह बातें जो एक आम आदमी से मुमकिन नहीं यानी आदत के खिलाफ हैं ) औलियाए किराम से मुमकिन हैं । अलबत्ता वह खवारिके आदत जिनकी नबी के अलावा दूसरों के लिए मुमानअत हो चुकी है वलियों के लिए नहीं हासिल होंगी जैसे कुर्आन मजीद की तरह कोई सूरत ले आना या दुनिया में जागते हुए अल्लाह पाक के दीदार या कलामे हकीकी से मुशर्रफ होना । इन बातों का जो अपने या किसी वली के लिए दावा करे वह काफिर है ।*_

_*बहारे शरिअत हिस्सा 1, सफा 70/71*_

_*🤲 तालिबे दुआँ क़मर रज़ा ह़नफ़ी*_

_*📮जारी रहेगा.....*_
━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━


  _*बहारे शरीअत, हिस्सा- 01 (पोस्ट न. 173)*_
_*―――――――――――――――――――――*_

                _*👑विलायत का बयान👑*_

 _*विलायत अल्लाह तबारक व तआला से बन्दे के एक खास कुर्ब का नाम है । जो अल्लाह तआला अपने बर्गुज़ीदा बन्दों को अपने फज्ल और करम से अता करता है । इस सिलसिले में - मसले बताये जाते हैं ।*_

 _*🌟मसअला : - विलायत ऐसी चीज़ नहीं कि आदमी बहुत ज्यादा मेहनत करके खुद हासिल कर ले बल्कि विलायत मौला की देन है । अलबत्ता आमाले हसना यानी अच्छे अमल अल्लाह तआला की इस देन के ज़रिये होते हैं । और कुछ लोगों को विलायत पहले ही मिल जाती है । मसअला : - विलायत बे - इल्म को नहीं मिलती । इल्म दो तरह के होते हैं । एक वह जो ज़ाहिरी तौर पर हासिल किया जाये । दूसरे वह उलूम जो विलायत के मरतबे पर पहुँचने से पहले ही अल्लाह तआला उस पर उलूम के दरवाजे खोल दे ।*_

_*☝🏻अकीदा : - तमाम अगले पिछले वलियों में से हुजूर अलैहिस्सलातु वस्सलाम की उम्मत के औलिया सारे वलियों से अफजल हैं । और सरकार की उम्मत के सारे वलियों में अल्लाह की मारिफत और उससे कुरबत चारों खुलफा की सब से ज़्यादा है । और उनमें अफ़ज़लीयत की वही तरतीब है जिस तरतीब से वे खलीफा हैं यानी सब से ज्यादा कुरबत हज़रते अबू बक्र रदियल्लाहु तआला अन्हु को फ़िर हज़रते फारुके आजम रदियल्लाहु तआला अन्हु को फिर हज़रते उसमान गनी रदियल्लाह तआला अन्हु को और फ़िर मौला अली मुशकिल कुशा रदियल्लाहु तआला अन्हु को है । हज़रते अली की विलायत के कमालात मुसल्लम हैं इसीलिए उनके बाद सारे वलियों ने उन्हीं के घर से नेमत पाई । उन्हीं के मुहताज थे , हैं और रहेंगे ।*_

 _*☝🏻अक़ीदा : - तरीक़त शरीअत के मनाफ़ी नहीं है बल्कि तरीकत शरीअत का बातिनी हिस्सा है । कुछ जाहिल और बने हुए सूफी , जो यह कह दिया करते हैं कि तरीकत और है शरीअत और है यह महज़ गुमराही है और इस बातिल ख्याल की वजह से अपने आप को शरीअत से ज़्यादा समझना खुला हुआ कुफ्र और इलहाद है ।*_

_*बहारे शरिअत हिस्सा 1, सफा 70*_

_*🤲 तालिबे दुआँ क़मर रज़ा ह़नफ़ी*_

_*📮जारी रहेगा.....*_
━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━


  _*बहारे शरीअत, हिस्सा- 01 (पोस्ट न. 172)*_
_*―――――――――――――――――――――*_

                 _*🕌इमामत का बयान👑*_

_*☝🏻अकीदा : - यज़ीद पलीद फासिक फाज़िर और गुनाहे कबीरा का मुर्तकिब था । आजकल कुछ गुमराह लोग यह कह देते हैं कि हमारा उनके . मामले में क्या दखल । हमारे वह भी शहज़ादे और इमाम हुसैन भी शहज़ादे । भला इमामे हुसैन से यज़ीद की क्या निस्बत । ऐसी बकवास करने वाला मरदूद है , खारिजी है और जहन्नम का मुस्तहिक है । हाँ यज़ीद को काफिर कहने और उस पर लानत करने के बारे में उलमाए अहले सुन्नत के तीन कौल हैं । और हमारे इमामे आज़म अबू हनीफा रदियल्लाहु तआला अन्हु का मसलक ख़ामोशी है यानी हम यज़ीद को फ़ासिक फाजिर कहने के सिवा न काफिर कहें न मुसलमान ।*_

_*☝🏻अकीदा : - अहले बैते किराम रदियल्लाहु तआला अन्हुम अहले सुन्नत के पेशवा हैं जो उनसे महब्बत न रखे मरदूद , मलऊन और खारिजी है ।*_

_*☝🏻अकीदा : - उम्मल मोमिनीन ख़दीजतुल कुबरा , उम्मुल मोमिनीन आइशा सिद्दीका और हजरत सय्यदा फातिमा जहरा रदियल्लाहु तआला अन्हा कतई जन्नती हैं । उन्हें और तमाम लड़कियों और पाक बीवियों ( रदियल्लह तआला अन्हुन्ना ) को तमाम सहाबियात पर फजीलत है । यहाँ तक कि उनकी पाकी की गवाही कुर्आन ने दी है ।*_

_*बहारे शरिअत हिस्सा 1, सफा 69*_

_*📮जारी रहेगा.....*_
━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━


  _*बहारे शरीअत, हिस्सा- 01 (पोस्ट न. 171)*_
_*―――――――――――――――――――――*_

                 _*🕌इमामत का बयान👑*_

_*☝️अकीदा : - हज़रते आइशा सिद्दीका रदियल्लाहु तआला अन्हा कतई जन्नती हैं और आख़िरत में भी यकीनी तौर पर महबूबे खुदा की महबूब दुल्हन हैं जो उन्हें तकलीफ दे वह रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को ईज़ा देता है और हज़रते तल्हा और हज़रते जुबैर रदियल्लाहु तआला अन्हुमा तो अशरा मुबश्शिरा में से हैं । इन साहिबों से हज़रते अली रदियल्लाहु तआला अन्हु के मुकाबले की वजह से खताए इजतेहादी वाके हुई मगर यह लोग आखिर कार उनकी मुखालफ़त और मकाबले से बाज़ आगये थे और रुजू कर लिया था । शरीअत में मुतलक बगावत तो इमामे बरहक से मुकाबले को कहते हैं । यह मुकाबला चाहे ' इनादी हो या ' इजतेहादी लेकिन इन हज़रात के रुजू कर लेने यानी बगावत से फिर जाने की वजह से उन्हें बागी नहीं कहा जा सकता वह बेशक जन्नती हैं । हजरते अमीरे मुआविया रदियल्लाहु तआला अन्हु के गिरोह को शरीअत के एतिबार से बागी लश्कर कहा जाता था मगर अब जबकि बागी का मतलब मुफसिद और सरकश हो गया है और यह अल्फाज गाली समझा जाने लगा है इसलिये अब किसी सहाबी के लिये बागी का अल्फाज़ इस्तेमाल किया जाना जाइज़ नहीं ।*_

 _*☝️अकीदा : - उम्मुल मोमिनीन आइशा सिददीका रदियल्लाहु तआला अन्हा रब्बुल आलमीन के महबूब की महबूबा हैं । उन पर इफ्क से अपनी ज़बान गन्दी करने वाला यकीनी तौर पर काफ़िर मुरतद है । और इसके सिवा और तअ्न करने वाला राफिजी तबर्राई , बद्दीन और जहन्नमी है ।*_

_*☝️अकीदा : - हजरते इमामे हसनैन रदियल्लाहु तआला अन्हुमा यकीनी तौर पर ऊँचे दर्जे के शहीदों में से हैं । उनमें से किसी की शहादत का इन्कार करने वाला गुमराह और बद्दीन है ।*_

_*बहारे शरिअत हिस्सा 1, सफा 69*_

_*📮जारी रहेगा.....*_
━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━


  _*बहारे शरीअत, हिस्सा- 01 (पोस्ट न. 170)*_
_*―――――――――――――――――――――*_

                 _*🕌इमामत का बयान👑*_

_*🌟मसअ्ला : - कुछ जाहिल यह कहते हैं कि जब हज़रते अली के साथ हज़रते अमीरे मुआविया की नाम लिया जाये तो ' रदियल्लाहु तआला अन्हु न कहा जाये । इसकी कोई अस्ल नहीं और ऐसा अकीदा बिल्कुल बातिल और नई शरीअत गढ़ना है । उलमाए किराम ने सहाबा के नामों के साथ रदियल्लाहु तआला अन्हु कहने का हुक्म दिया है ।*_

 _*☝️अकीदा : - नुबुव्वत के तरीके पर तीस साल तक खिलाफत रही और हज़रते इमामे मुजतबा रदियल्लाहु तआला अन्हु को 6 महीने की खिलाफत पर खत्म हो गई । फिर अमीरूल मोमिनीन उमर इब्ने अब्दुल अज़ीज़ रदियल्लाहु तआला अन्हु की खिलाफते राशिदा हुई और आखिर जमाने में हज़रते इमाम महदी रदियल्लाहु तआला अन्हु खलीफा होंगे । और हज़रते अमीरे मुआविया रदियल्लाह तआला अन्हु इस्लामी तारीख के सब से पहले सुलतान हैं । तौराते मुकद्दस का इशारा है कि*_
 
_*📝तर्जमा : - " हुजूर अलैहिस्सलाम मक्के में पैदा होंगे मदीने को हिज़रत करेगे और उनकी सलतनत शाम में होगी ।*_
                     _*" हज़रते अमीरे मुआविया की बादशाही अगर्चे सलतनत है मगर किस की हकीकत में हज़रते मुहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की सलतनत है क्यूँकि हज़रते इमामे हसन मुजतबा रदियल्लाहु तआला अन्हु एक बार जंग के मैदान में थे और उनपर जान फिदा करने वाला बहुत  बड़ा लशकर या इस के बावुजूद हज़रते इमामे हसन रदियल्लहु तआला अन्हु ने जान बूझ कर हथियार रख दिये और हज़रते अमीर मुआविया के हाथों पर ' बैअत ' फरमा ली । हुजूर अलैहिस्सलाम ने इस सुलह की बशारत दी है और खुशी में इमामे हसन के बारे में यह फरमाया है कि।*_

 _*📝तर्जमा : - मेरा यह बेटा सय्यद है । मैं उम्मीद करता हूँ कि अल्लाह तआला इसकी वजह से इस्लान के दो बड़े गिरोहों में सुलह करा दे " ।*_
                 
  _*इसके बाद भी अगर कोई हज़रते अमीरे मुआविया पर फासिक फ़ाज़िर होने का इलजाम लगाये तो उसका इल्जाम लगाना और तअना कसना हज़रते इमामे हसन , हुजूर अलैहिस्सलाम बाल्कि  अल्ल्लाह तआला पर होगा।*_

_📕*बहारे शरिअत हिस्सा 1, सफा 67/68*_

_*📮जारी रहेगा.....*_
━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━



  _*बहारे शरीअत, हिस्सा- 01 (पोस्ट न. 169)*_
_*―――――――――――――――――――――*_

                 _*🕌इमामत का बयान👑*_

_*☝️अकीदा : - सहाबा नबी न थे । फरिश्ते न थे किं मासूम हों । उनमें कुछ के लिए लग़ज़िशें हुई मगर उनकी किसी बात पर गिरफ्त करना अल्लाह और रसूल के ख़िलाफ़ है । अल्लाह तआला ने जहाँ सूरए हदीद में सहाबा की दो किस्में की हैं । यानी फतहे मक्का से पहले के मोमिन और फतहे मक्का के बाद के मोमिन और उनको उन पर फजीलत दी और फरमा दिया कि*_

_*📝तर्जमा : - " सब से अल्लाह ने भलाई का वादा फरमा लिया । " और साथ ही यह भी फरमाया कि*_

_*📝तर्जमा : - " और अल्लाह खुब जानता है जो कुछ तुम काम करोगे ।*_

_*तो जब उसने उनके तमाम आमाल जानकर हुक्म फरमा दिया कि उन सब से हम जन्नत का बे अजाब व करामत और सवाब का वादा कर चुके तो दूसरे को क्या हक रहा कि उनकी किसी बात  पर तअन करे । क्या तअन करने वाला अल्लाह से अलग कोई मुस्तकिल हुकूमत काइम करना चाहता है ?*_

_*☝️अकीदा : - हज़रते अमीर मुआविया रदियल्लाहु तआला अन्हु मुजतहिद थे उनके मुजतहिद होने के बारे में हजरते अब्दुल्लाह इने अब्बास रदिल्लाहु तआला अन्हुमा ने सहीह बुखारी में बयान फ़रमाया है मुजतहिद से सवाब और खता दोनों सादिर होती हैं । इस बारे में खता की दो किस्में है । खताए ' इनादी ' यह मुजतहिद की शान नहीं । खताए ' इजतेहादी ' यह मुजतहिद से होती है और उसमें उस पर अल्लाह के नजदीक हरगिज़ कोई पकर नहीं । मगर अहकामे दुनिया में खता की दो किस्में हैं । खताए ' मुकर्रर उसके करने वाले पर इन्कार न होगा यह वह खताए इजतेहादी है जिससे दीन में कोई फितना नही होता हो । जैसे हमारे नजदीक मुकतदी का इमाम के पीछे सूरए फातिहा पढ़ना । दूसरी खताए ' मुन्कर ' यह वह खताए इजतेहादी है जिसके करने वाले पर इन्कार किया जायेगा कि उसकी खता फितने का सबब है । हज़रते अमीर मुआविया का हजरते अली से इख्तेलाफ इस किस्म की खता का था । और हुजूर अलैहिस्सलाम ने जो खुद फैसला फरमाया है कि मौला अली की डिगरी और अमीरे मुआविया की मगफिरत ।*_

_*📕बहारे शरीअत, हिस्सा 1, सफा 67/68*_

_*बाकी अगले पोस्ट में*_

_*📮जारी रहेगा.....*_
━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━



  _*बहारे शरीअत, हिस्सा- 01 (पोस्ट न. 168)*_
_*―――――――――――――――――――――*_

                 _*🕌इमामत का बयान👑*_

 _*☝️अकीदा : - किसी सहाबी के साथ बुरा अकीदा रखना बद्जहबी और गुमराही है । अगर कोई बुरी अकीदत रखे तो वह जहन्नम का मुस्ताहक है । क्यूँकि इनसे बुरी अकीदत रखना नबी अलैस्सिलाम के साथ बुग़ज़ है । ऐसा आदमी राफिजी है अगरचे चारों खुलफा को माने और अपने आपको सुन्नी कहे ।  हजरते अमीर मुआविया , उनके वालिदे माजिद हज़रते अबू सुफयान , उनकी वालिदा हज़रते हिन्दा हजरते सय्यदना अम्र इब्ने आस व हजरते मुगीरा इने शोअ्बा हज़रते अबू मूसा अशअरी यहाँ तक कि हजरते वहशी रदियल्लाहु तआला अन्हुम में से किसी की शान में गुस्ताखी तबर्रा है ।*_
                     
                      _*हज़रते वहशी वह हैं जिन्होंने इस्लाम से पहले सय्यदुश्शुहदा हजरते हमज़ा रदियल्लाहु तआला अन्हु को शहीद किया और इस्लाम लाने के बाद बहुत बड़े ख़बीस मुसैलमा कज्जाब को जहन्नम के घाट उतारा  वह खुद कहा करते थे मैंने बहुत अच्छे इन्सान को और बहुत बुरे इन्सान को क़त्ल किया । और सहाबियों की शान में बेअदबी और गुस्ताखी करने वाला ' राफ़िज़ी है । अब रही बात हज़रतें अबू बक्र और हज़रते उमर रदियल्लाहु तआला अन्हुमा की तौहीन तो यह उनकी खिलाफत से ही इन्कार है और फुकहा के नज़दीक इनकी तौहीन या इनकी खिलाफत से इन्कार कुफ्र है ।*_

_*☝️अकीदा : - सहाबी का मर्तबा यह है कि कोई वली किसी मर्तबे का हो किसी सहाबी के रुतबे को नहीं पहुँच सकता । मसअला : - सहाबए किराम रदियल्लाहु तआला अन्हुम के आपसी जो वाकिआत हुये उनमें पड़ना हराम और सख्त हराम है । मुसलमानों को तो यह देखना चाहिए कि वह सब आकाये दो जहाँ सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम पर जान निसार करने वाले और सच्चे गुलाम हैं ।*_

 _*☝️अकीदा : - तमाम सहाबए किराम आला और अदना ( और उनमें अदना कोई नहीं ) कुर्आन के इरशाद के मुताबिक़ सब जन्नती हैं । वह जहन्नम की भनक न सुनेंगे और हमेशा अपनी मनमानी मुरादों में रहेंगे । महशर की वह बड़ी घबराहट उन्हें गमगीन न करेगी । फ़रिश्ते उनका इस्तिकबाल करेंगे कि यह है वह दिन जिसका तुम से वादा था ।*_

_*📕 बहारे शरीअत, हिस्सा 1, सफा 67*_

_*बाकी अगले पोस्ट में*_

_*📮जारी रहेगा.....*_
━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━


  _*बहारे शरीअत, हिस्सा- 01 (पोस्ट न. 167)*_
_*―――――――――――――――――――――*_

                 _*🕌इमामत का बयान👑*_

_*☝️अकीदा : - उनकी खिलाफत बर तरतीबे फजीलत है यानी जो अल्लाह के नज़दीक अफजल , आला . और अकरम था वही पहले खिलाफत पाता गया न कि अफ़ज़लीयत बर तरतीबे खिलाफ़त यानी अफ़ज़ल यह कि मुल्कदारी व मुल्क गीरी में ज्यादा सलीका । जैसा कि आजकल सुन्नी बनने वाले तफज़ीलिये कहते हैं । अगर यूँ होता तो हज़रते फारूक आज़म रदियल्लाहु तआला अन्हु सबसे अफजल होते क्यूँकि उनकी खिलाफ़त को यह कहा गया है कि ।*_

 _*📝तर्जमा : - " मैंने किसी मर्दे कवी को उनकी तरह अमल करते हुए नहीं देखा यहाँ तक कि लोग सैराब हो गये और पानी से करीब ऊँट बैठाने की जगह बनाई " ।*_
                 _*और हज़रते सिद्दीके अकबर रदियल्लाहु तआला अन्हु की ख़िलाफ़त को इस तरह फरमाया गया कि ।*_

_*📝तर्जमा : - " उनके पानी निकालने में कमजोरी रही अल्लाह तआला उनको बख़्शे ' ।*_
                     _*यह हदीस इस तरह है कि हज़रते अबू हुरैरा रदियल्लाहु तआला अन्हु फ़रमाते हैं कि मैंने हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सुना कि उन्होंने फरमाया कि मैंने ख्वाब में कुएँ पर एक डोल रखा देखा तो मैंने उससे जितना अल्लाह तआला ने चाहा पानी निकाला फिर हजरते अबू बक्र सिद्दीक रदियल्लाहु तआला अन्हु ने वह डोल लिया । उन्होंने एक या दो भरे डोल निकाले । उनके निकालने में कमजोरी रही ।*_

 _*☝️अकीदा : - चारों खुलफाए राशिदीन के बाद बकीया अशरह मुबश्शेरह और हज़राते हसनैन और असहाबे बद्र और असहाबे बैअतुर्रिजवान के लिए अफजलियत है । और यह सब कतई जन्नती हैं । और तमाम सहाबए किराम रदियल्लाहु तआला अन्हुम अहले खैर और आदिल हैं । उनका भलाई के साथ ही जिक्र होना फर्ज है ।*_

_*📕 बहारे शरीअत, हिस्सा 1, सफा 66*_

_*बाकी अगले पोस्ट में*_

_*📮जारी रहेगा.....*_
━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━


  _*बहारे शरीअत, हिस्सा- 01 (पोस्ट न. 166)*_
_*―――――――――――――――――――――*_

                 _*🕌इमामत का बयान👑*_

 _*☝️अक़ीदा : - हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के बाद ख़लीफ़ा बरहक और इमामे मुतलक हज़रते अबू बक्र सिद्दीक फिर हज़रते उमर फारूक फिर हज़रते उसमाने गनी फिर हजरते अली 6 महीने के लिये हज़रते इमाम हसन रदियल्लाहु तआला अन्हुम खलीफा हुए । इन बुजूर्गों को खुलफाये राशिदीन और उनकी खिलाफ़त को खिलाफते राशिदा कहते हैं । इन नाइबों ने हुजूर की सच्ची नियाबत का पूरा पूरा हक अदा फरमाया है ।*_

 _*☝️अकीदा : - नबियों और रसूलों के बाद हज़रते अबू बक्र इन्सान , जिन्नात , फरिश्ते और अल्लाह तआल । की हर मखलूक से अफजल हैं फिर हज़रते उमर फिर हज़रते उसमान गनी और फिर हज़रते अली रादयल्लाहु तआला अन्हुम जो आदमी मौला अली मुशकिल कुशा रदियल्लाहु तआला अन्हु को पहले या दूसरे खलीफा से अफजल बताये वह गुमराह और बद मजहब है ।*_

_*☝️अकीदा : - अफ़जल का मतलब यह है कि अल्लाह तआला के यहाँ ज्यादा इज्जत वाला हो । इसी को कसरते से सवाब भी ताबीर करते हैं न कि कसरते अज़्र कि बारहा मफजूल के लिए होती है । सय्यदना हज़रते इमाम महदी के साथियों के लिए हदीस शरीफ में यह आया है कि उनके एक के लिये पचास का अज़्र है । सहाबा ने हुजूर से पूछा उन में के पचास का या हम में के । फरमाया बल्कि तुममें के । तो अज्र उनका ज़ाइद हुआ मगर अफजलीयत में वह सहाबा के हमसर भी नहीं हो सकते ज़्यादा होना तो दर किनार । कहाँ इमाम महदी की रिफाकत कहाँ हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की सहाबियत उसकी मिसाल बिना तश्बीह यूँ समझिये कि सुलतान ने किसी मुहिम पर वज़ीर और कुछ दूसरे अफसरों को भेजा उसकी फतह पर हर अफ़सर को लाख लाख रुपये इनाम के दिये और वज़ीर को खाली उसके मिज़ाज की खुशी के लिए एक पर्वाना दिया तो इनाम दूसरे अफसरों को ज्यादा मिला लेकिन इस इनाम को उस परवाने से कोई निसबत नहीं ।*_
       
_*📕 बहारे शरीअत, हिस्सा 1, सफा 65/66*_

_*बाकी अगले पोस्ट में*_

_*📮जारी रहेगा.....*_
━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━


  _*बहारे शरीअत, हिस्सा- 01 (पोस्ट न. 165)*_
_*―――――――――――――――――――――*_

                 _*🕌इमामत का बयान👑*_

 _*🕌इमामत की दो किस्मे है👑 ।*_

 _*🕌1 . इमामते सुग़रा : - नमाज़ की इमामत का नाम इमामते सुग़रा है ।*_

_*👑2 इमामते कुबरा : - नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की नियाबत यानी काइम मकाम काम करने को इमामते कुबरा कहते हैं । इस तरह कि इमामों से मुसलमानों की तमाम दीनी और दुनियावी ज़रूरतें वाबस्ता हैं । इमाम जो भी अच्छे कामों का हुक्म दें उनकी पैरवी तमाम दुनिया के मुसलमानों पर फर्ज है । इमाम के लिए आज़ाद आकिल , बालिग कादिर और करशी होना शर्त है ।*_
     
                _*⚫राफिजी लोगों का मज़हब यह है कि इमाम के लिये हाशिमी , अलवी और मासूम होना शर्त है । इससे उनका मकसद यह है कि तीनों ख़लीफ़ा जो हक पर हैं उनको खिलाफ़त से अलग करना चाहते हैं । जब कि तमाम सहाबए किराम और हज़रते अली रदियल्लाहु तआला अन्हुम और हजरते इमाम हसन और हज़रते इमाम हुसैन रदियल्लहु तआला अन्हुमा ने पहला खलीफा हज़रते अबू बक्र दूसरे खलीफा हजरते उमर तीसरे खलीफा हज़रते उसमाने गनी रदियल्लाहु तआला अन्हुम को माना है । राफिजी मजहब में इमाम की शर्तों में से एक शर्त जो अलवी होने की बढ़ाई गई है उससे हजरत अली भी इमाम नहीं , हो सकते क्यूँकि अलवी उसे कहेंगे जो हज़रते अली की औलाद में से हो । राफिजी मज़हब में इमाम की शर्तों में एक शर्त इमाम का मासूम होना भी है जबकि मासूम होना अम्बिया और फरिश्तों के लिए खास है ।*_

_*🌟मसअ्ला : - इमाम होने के लिए यही काफी नहीं कि खाली इमामत का मुस्तहक हो बल्कि उसे दीनी इन्तिज़ाम कार लोगों ने या पिछले इमाम ने मुकर्रर किया हो ।*_

_*🌟मसअ्ला : - इमाम की पैरवी हर मुसलमान पर फर्ज़ है जबकि उसका हुक्म शरीअत के खिलाफ न हो । बल्कि शरीअत के खिलाफ किसी का भी हुक्म नहीं माना जा सकता ।*_

_*🌟मसअ्ला : - इमाम ऐसा शख्स मुकर्रर किया जाए जो आलिम हो या आलिमों की मदद से काम करे और बहादुर हो ताकि हक बात कहने में उसे कोई खौफ न हो ।*_

_*🌟मसअ्ला : - इमामत औरत और नाबालिग की जाइज़ नहीं । अगर पहले इमाम ने नाबालिग को इमाम मुकर्रर कर दिया हो तो उसके बालिग होने के लिए लोग एक वली मुकर्रर करें कि वह शरीअत के अहकाम जारी करे और यह नाबालिग इमाम सिर्फ रस्मी होगा और हकीकत में वह उस वक़्त तक इमाम का वाली है ।*_
       
_*📕 बहारे शरीअत, हिस्सा 1, सफा 65*_

_*बाकी अगले पोस्ट में*_

_*📮जारी रहेगा.....*_
━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━


  _*बहारे शरीअत, हिस्सा- 01 (पोस्ट न. 164)*_
_*―――――――――――――――――――――*_

_*4 . गैर मुकल्लिदीन फिरका*_

_*ज़रूरी तम्बीह*_

_*📝तर्जमा : - और नहीं है कोई ताकत और कुव्वत मगर अल्लाह की तरफ़ से ।*_

_*मुख़्तसर यूँ समझिए कि बिदअत दो तरह की हुई एक अच्छी और दूसरी बुरी । बुरी बिदअत तो बहरहाल बुरी है और अगर कोई अच्छी नर्ह बात यानी अच्छी नई बिदअत निकाली जाए तो वह हर्गिज़ बुरी नहीं । बहुत साफ़ मिसाल इसकी यह है कि कुर्आन पाक हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के दौर में कागज़ पर यूँ लिखा न था तो क्या कुर्आन का काग़ज़ पर लिखना बिदअत या नया काम कह के हराम करार दिया जाएगा हर्गिज़ नहीं ।*_

      ‌‌               _*इसी तरह बहुत से नए जाएज काम ऐसे हैं जिन्हें हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने नहीं किया मगर बुजुर्गों ने उन्हें अच्छा जान कर शुरू किया । लिहाजा वह अच्छे काम बिदअत नहीं हैं बल्कि अच्छे हैं । यूँ भी शरीअत ने जिस काम का न तो हुक्म दिया न उसे मना किया उसे मुबाह कहते हैं और मुबाह के करने पर न  गुनाह है न सवाब । हाँ अगर नियत अच्छी है तो सवाब और नियत अच्छी नहीं तो गुनाह होगा । लिहाज़ा हर नया काम बुरी बिदअत न हुई ।*_
             
_*📕 बहारे शरीअत, हिस्सा 1, सफा 63*_

_*📮जारी रहेगा.....*_
━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━


  _*बहारे शरीअत, हिस्सा- 01 (पोस्ट न. 163)*_
_*―――――――――――――――――――――*_

_*4 . गैर मुकल्लिदीन फिरका*_

_*ज़रूरी तम्बीह*_

                _*वहाबियों के यहाँ बिदअत का बहुत चर्चा है । जिस चीज़ को देखिये बिदअत है । इसलिये मुनासिब यह है कि बता दिया जाये कि बिदअत किसे कहते हैं । बिदअते मज़मूमा व कबीहा यानी ख़राब ' बिदअत वह है जो किसी सुन्नत के मुखालिफ हो और सुन्नत से टकराती हो और यह मकरूह या हराम है । और मुतलक बिदअत तो मुस्तहब बल्कि सुन्नत और वाजिब तक होती है । हज़रते अमीरुल मोमिनीन उमर फारूक रदियल्लाहु तआला अन्हु तरावीह के बारे में*_

 _*📝( तर्जमा : - यह अच्छी बिदअत है । )*_

                 _*फरमाते है कि  हालाँकि तरावीह सुन्नते मुअक्कदा है । जिस चीज़ की अस्ल शरीअत से साबित हो वह हरगिज़ बुरी बिदअत नहीं हो सकती । नहीं तो खुद वहाबियों के मदरसे और इस मौजूदा खास सूरत में उनके वाज़ के जलसे ज़रूर बिदअत होंगे । फिर यह वहाबी इन बिदअतों को क्यूँ नहीं छोड़ देते । मगर उनके यहाँ तो यह ठहरी है कि अल्लाह के महबूबों की अज़मत की जितनी चीजें हैं सब बिदअत और जिसमें उनका मतलब हो वह हलाल और सुन्नत ।*_

_*📕 बहारे शरीअत, हिस्सा 1, सफा 63*_

_*बाकि अगले पोस्ट में*_

_*📮जारी रहेगा.....*_
━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━


  _*बहारे शरीअत, हिस्सा- 01 (पोस्ट न. 162)*_
_*―――――――――――――――――――――*_

_*4 . गैर मुकल्लिदीन फिरका*_

 _*यह भी वहाबियत की एक शाख़ है । वह चन्द बातें जो हाल में वहाबियों ने अल्लाह तआला और नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की शान में गुस्ताखी के तौर पर बकी हैं वह गैर मुकल्लिदीन से साबित नहीं । बाकी दूसरे तमाम अकीदों में दोनों शरीक हैं । और हाल के देवबन्दियों की इबारतों को देख भाल और जान बूझ कर उन्हें काफिर तसलीम नहीं करते और शरीअत का हुक्म है कि जो अल्लाह और रसूल की शान में गुस्ताखी करने वालों के काफिर होने में शक करे वह भी काफ़िर है । गैर मुकल्लिदों का एक बुरा अकीदा यह है कि वह चारों मज़हबों*_
_*( 1 ) हनफी*_
 _*( 2 ) शफिई*_
 _*( 3 ) मालिक*_
 _*( 4 ) हम्बली*_
 _*से अलग और तमाम मुसलमानों से अलग थलग एक रास्ता निकाल कर तकलीद को हराम और बिदअ़त कहते हैं और दीन के इमामों जैसे*_
 _*इमामे आज़म अबू हनीफा*_
_*इमामे शाफिई*_
 _*इमामे मालिक*_
_*इमामे अहमद इब्ने हम्बल*_
 _*को बुरा भला कहते हैं । यह लोग इमामों की तकलीद ( पैरवी नहीं करते बल्कि शैतान की करते हैं । गैर मुकल्लिदीन ' तकलीद ' और ' कियास ' का इन्कार करते है । जब कि मुतलक तकलीद और कियास का इन्कार कुफ्र है । इसलिये गैर मुकल्लिदीन का मजहब बातिल है ।*_

_*नोट : - फरअ् में अस्ल की तरह हुक्म को साबित करने को कियास कहते हैं । कियास कुर्आन और हदीस से साबित है ।*_

_*📕 बहारे शरीअत, हिस्सा 1, सफा 63*_

_*बाकि अगले पोस्ट में*_

_*📮जारी रहेगा.....*_
━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━


  _*बहारे शरीअत, हिस्सा- 01 (पोस्ट न. 161)*_
_*―――――――――――――――――――――*_

 _*3 . वहाबी फ़िरका*_

_*15 . 📕हिफजुल ईमान सफा न . 7 में है*_
                _*हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के इल्म के बारे में यह तकरीर की कि : " आप की जाते मुकद्दसा पर इल्मे गैब का हुक्म किया जाना अगर ब कौले जैद सही हो तो दरयाफ्त तलब यह अम्र है कि इस गैब से मुराद बाज़ ( कुछ ) गैब हैं या कुल गैब ? अगर बाज उलूमे गैबिया मुराद हैं तो इसमें हुजूर की क्या तखसीस ( खसूसियत ) है ? ऐसा इल्मे गैब तो जैद व अम्र बल्कि हर सबी ( बच्चे ) व मजनून ( पागल ) बल्कि जमीअ ( तमाम ) हैवानात  व बहाइम ( चौपाया ) के लिये भी हासिल है ।*_
          _*" मुसलमानों ! गौर करो कि इस शख्स ने नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की शान में कैसी खुली हुई गुस्ताखी की कि हुजूर जैसा इल्म जैद व अम्र तो दर किनार हर बच्चे और पागल बल्कि तमाम जानवरों और , चौपार्यों के लिए हासिल होना कहा । क्या कोई भी ईमान वाला दिल ऐसे के काफिर होने में शक कर सकता है ? हरगिज़ नहीं ।*_
          _*इस कौम का यह आम तरीका है कि जिस चीज़ को अल्लाह और रसूल ने मना नहीं किया बल्कि कुर्आन और हदीस से उसका जाइज होना साबित है उसको नाजाइज़ कहना तो दर किनार उस पर शिर्क और बिदअत का हुक्म लगा देते हैं जैसे मीलाद शरीफ की मजलिस , कियाम , ईसाले सवाब , कब्रों की जियारत , बारगाहे बेकस पनाह सरकारे मदीना तय्यबा व औलिया की रूहों से इस्तिमदाद ( मदद चाहना ) और मुसीबत के वक़्त नबियों और वलियों को पुकारना वगैरा बल कि मीलाद शरीफ के बारे में तो ऐसा नापाक लफ्ज़ लिखा है कि ऐसे नापाक अलफ़ाज़ रसूल के दुश्मन के अलावा कोई मोमिन नहीं लिख सकता । वह अलफ़ाज़ यह हैं ।*_

_*16 . 📕बराहीने कातिआ सफा न . 148 में हैं ।*_
                 _*" पस यह हर रोज़ इआदा ( दोहराना ) विलादत का तो मिस्ल हुनूद ( हिन्दूओं ) के कि स्वांग कन्हय्या की विलादत का हर साल कहते हैं या मिस्ल रवाफ़िज़ के कि नक्ल शहादते अहले बैत हर साल मनाते हैं । मआज़ल्लाह स्वांग आपकी विलादत का ठहरा और खुद हरकते कबीहा काबिले लौम व हराम व फिस्क है । बल्कि यह लोग उस कौम से बढ़ कर हुए । वह तो तारीख मुअय्यन पर करते है । इनके यहाँ कोई कैद ही नहीं । जब चाहें यह खुराफातें फर्जी बनाते हैं ।*_
                  _*" वहाबियों की और भी बहुत गन्दी गन्दी इबारते हैं जो दूसरी किताबों में देखी जा सकती हैं ।*_

_*📕 बहारे शरीअत, हिस्सा 1, सफा 63*_

_*📮जारी रहेगा.....*_
━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━


  _*बहारे शरीअत, हिस्सा- 01 (पोस्ट न. 160)*_
_*―――――――――――――――――――――*_

 _*3 . वहाबी फ़िरका*_

_*14 . इस गिरोह का आम तरीका यह है कि जिस चीज़ में अल्लाह के महबूबों की फजीलत जाहिर हो तो उसे तरह तरह की झूटी तावीलों से बातिल करना चाहेंगे हर वह बात साबित करना चाहेंगे जिस में तनकीस और खोट हो जैसे :-*_

 _*📕बराहीने कातेआ सफा न . 51 में है कि - " नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को दीवार के पीछे का भी इल्म नहीं " । और इसको शैख़ मुहद्दिस अब्दुल हक़ देहलवी रहमतुल्लाहि तआला अलैहि की तरफ गलत मनसूब कर दिया । बल्कि उसी सफे पर नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के वुसअते इल्म की बाबत यहाँ तक लिख दिया कि*_
               _*अल हासिल गौर करना चाहिए कि शैतान कि व मलकुल मौत का हाल देख कर इल्मे मुहीते जमीन का फखरे आलम को ख़िलाफे नुसूसे कतईया के बिला दलील ' महज़ कियासे फ़ासिदा से साबित करना शिर्क नहीं तो कौन सा हिस्सा ईमान का है । शैतान व मलकुल मौत को यह बुसअत नस से साबित हुई फखरे आलम की वुसअते इल्म की कौन सी नस्से कतई है जिस से तमाम नुसूस को रद कर के एक शिर्क साबित करता है शिर्क नहीं तो कौनसा हिस्सा ईमान का है ।*_
         _*हर मुसलमान अपने ईमान की आँखों से देखें कि इस काइल ने इबलीसे लईन के इल्म का नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के इल्म से ज्यादा बताया या नहीं ? और शैतान को खुदा का शरीक माना या नहीं ? हर ईमान वाला यही कहेगा कि जरूर बताया और जरूर माना । फिर इस शिर्क को नस से साबित किया । यहाँ तीनों बातें सरीह कुफ्र और इनका कहने वाला यकीनी तौर पर काफिर है । कौन मुसलमन उसके काफिर होने में शक करेगा ?*_

_*📕 बहारे शरीअत, हिस्सा 1, सफा 62/63*_

_*बाकि अगले पोस्ट में*_

_*📮जारी रहेगा.....*_
━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━


  _*बहारे शरीअत, हिस्सा- 01 (पोस्ट न. 159)*_
_*―――――――――――――――――――――*_

 _*3 . वहाबी फ़िरका*_

 _*गाह बाशद कि कोदके नादाँ ब गलत बर हदफ जनद तीरे*_

 _*📝तर्जमा : - " कभी ऐसा होता है कि नादान बच्चा गलती से निशाने पर कोई तीर मार देता है ।*_

_*" " हाँ बादे वुजूहे हक ( हक की वज़ाहत के बाद ) अगर फकत इस वजह से कि यह बात मैंने कही और वह अगले कह गये थे मेरी न माने और वह पुरानी बात गाये जायें तो कतए नज़र इसके कि कानून महब्बते नबवी सल्लल्लाह तआला अलैहि वसल्लम से यह बात बहुत बईद है । वैसे भी अपनी अक्ल व फहम की खूबी पर गवाही देनी है " ।*_
             _*यहीं से ज़ाहिर हो गया कि जो मअनी उसने तराशे सलफ में कहीं उसका पता नहीं और नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के ज़माने से आज तक जो सब समझे हुए थे उसको अवाम को ख्याल बता कर रद कर दिया कि इसमें कुछ फजीलत नहीं । इस कहने वाले पर उलमाये हरमैन तय्यबैन ने जो फ़तवे दिये वह ' हुसामुल हरमैन ' के देखने से ज़ाहिर हैं । और उसने खुद भी उसी किताब में सफा 46 में अपना इस्लाम बराये नाम तसलीम किया ।*_
                _*मुद्दई लाख पे भारी है गवाही तेरी ' इन नाम के मुसलमानों से अल्लाह बचाये ।*_

 _*📕12 . ' तहज़ीरुन्नास ' सफा न . 5 पर है कि : -" अम्बिया अपनी उम्मत से मुमताज़ होते हैं तो उलूम ही में मुमताज़ होते हैं बाकी रहा अमल उसमें बसा औकात बजाहिर उम्मती मसावी ( बराबर हो जाते हैं बल्कि बढ़ जाते हैं "*_

 _*13 . और सुनिये इन काइल साहब ने हुजूर की नुबुव्वत को कदीम और दूसरे नबियों की नुबुव्वत को हादिस बताया जैसा कि सफा न . 7 पर है । " क्यूँकि फ़रके किदमे नुबव्वत और हुदूसे नुबुव्वत बावुजूद इत्तेहादे नौई खूब जब ही चसपाँ हो सकता है । क्या जात व सिफ़ाते बारी के सिवा . मुसलमानों के नज़दीक कोई और चीज़ भी कदीम है । नबुव्वत सिफत है और बिना मौसूफ के सिंफ़त का पाया जाना मुहाल है । जब हुजूर अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम भी ज़रूर हादिस न हुए बल्कि अजली ठहरे और जो अल्लाह और अल्लाह की सिफ़तों के सिवा को कदीम माने . ब इजमाये मुसलिमीन काफ़िर है ।*_

_*📕 बहारे शरीअत, हिस्सा 1, सफा 61/62*_

_*बाकि अगले पोस्ट में*_

_*📮जारी रहेगा.....*_
━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━


  _*बहारे शरीअत, हिस्सा- 01 (पोस्ट न. 158)*_
_*―――――――――――――――――――――*_

 _*3 . वहाबी फ़िरका*_

 _*📕( 10 ) तक़वीयतुल ईमान सफा 22 में है कि*_

 _*" जिसका नाम मुहम्मद या अली है वह किसी चीज़ का मुख्तार नहीं ' । तअज्जुब है कि वहाबी साहब तो अपने घर की तमाम चीजों का इख्तियार रखें और मालिके हर दोसरा सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम किसी चीज के मुख्तार न हों । इस गिरोह का एक मशहूर अकीदा यह है कि अल्लाह तआला झूठ बोल सकता है बल्कि उनके एक सरगना ने तो अपने एक फतवे में लिख दिया कि : ' वुकूए किज्य के माना दुरुस्त हो गये जो यह कहे कि अल्लाह तआला झूठ बोल चुका ऐसे की तजलील ( जलील करना ) और तफसीक ( फासिक कहने ) से मामून करने चाहिये ।*_
‌‌                  _*सुबहानल्लाह खुदा को झूठा माना फिर भी इस्लाम , सुन्नियत , और सलाह किसी बात में फर्क न आया । मालूम नहीं इन लोगों ने किस चीज़ को खुदा ठहरा लिया है ।"*_
                    _*एक अकीदा उनका यह है कि नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को ' खातमुन्नबीय्यीन ' व माना आखिररुल अम्बिया नहीं मानते और यह सरीह कुफ्र है ।*_

 _*📕( 11 ) चुनाँचे तहजीरुन्नास सफा न . 2 में है कि*_

_*अवाम के ख्याल में तो रसूलुल्लाह सल्लल्लाह तआला अलैहि वसल्लम का खातम होना बई माना है कि अपको जमाना अम्बियायए साबिक के बाद और आप सब में आखिर नबी हैं मगर अहले फहम पर रौशन होगा कि तकदुम या तअख्खुर बिज्जात कुछ फजीलत नहीं । फिर मकामे मदह में यह फरमाना*_

 _*📝तर्जमा - " हाँ अल्लाह के रसूल हैं और सब नबियों में पिछले हैं ।*_

 _*" . . इस सूरत में क्यों कर सही हो सकता है ? हाँ अगर इस वस्फ को औसाफे मदह में से न कहे और इस मकाम को . मकामे , मदह न करार दीजिये तो अलबत्ता खातिमीयत ब एअतेबारे तअख्खुरे जमाना सहीह हो सकती है । पहले तो इस काइल ने खातमुन्नबीय्यीन के मथुनी तमाम अम्बिया से जमाने के एतिबार से मुतअख्खर होने को अवाम का ख्याल कहा और यह कहा कि अहले फहम पर रौशन है कि इसमें बिज्जात कुछ फजीलत नहीं हालाँकि हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने खातमुन्नबीय्यीन के यही मअ्ना कसरत से हदीसों में इरशाद फरमाये तो मआजल्लाह इस काइल ने तो हुजूर को अवाम में दाखिल किया और अहले फहम से खारिज किया । फिर खत्मे जमानी को मुतलकन फजीलत से खारिज किया हालाँकि इसी तअख्खुरे जमानी को हुजूर ने मकामे मदह में जिक्र फरमाया फिर यह कि*_

_*📕तहजीरुन्नास सफा न . 4 में लिखा कि - "*_
_*आप मौसूफ ब वस्फे नुबुब्बत बिज्जात हैं और सिवा आप के और नबी मौसूफ ब वस्फ नुबुव्वत बिल अर्ज " तहज़ीरुन्नास सफा न . 16 पर है कि बल्कि बिलफर्ज आपके जमाने में भी कहीं और कोई नबी हो आपका खातम होना बदस्तूर बाकी रहता है ।*_
              _*📕तहज़ीरुन्नास सफा न . 33 पर है कि*_
                   _*" बल्कि अगर बिलफर्ज बाद ज़मानये नबी भी कोई नबी पैदा हो तो भी खातमीयते मुहम्मदी में कुछ फर्क न आयेगा चे जाये कि आपके मुआसिर ( एक वक़्त में रहने वाले ) किसी और ज़मीन में था फर्ज कीजिये उसी ज़मीन में कोई और नबी तजवीज़ किया जाये । " लुत्फ यह कि इस काइल ने उन तमाम खुराफात का ईजादे बन्दा होना खुद तसलीम कर लिया ।*_
           _*📕तहजीरुन्नास सफा न . 34 पर है कि*_
                  _*अगर ब वजहे कम इल्तेफाती बड़ों का फहम किसी मजमून तक न पहुँचा तो उनकी शान में क्या नुकसान आ गया और किसी किसी तिफले नादान ने कोई ठिकाने की बात कह दी तो क्या इतनी बात से वह अजीमुश्शान हो गया ?*_

_*📕 बहारे शरीअत, हिस्सा 1, सफा 60/61*_

_*बाकि अगले पोस्ट में*_

_*📮जारी रहेगा.....*_
━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━


  _*बहारे शरीअत, हिस्सा- 01 (पोस्ट न. 157)*_
_*―――――――――――――――――――――*_

 _*3 . वहाबी फ़िरका*_

_*📕( 6 ) तकवीयतुल ईमान सफा 11 में है कि*_

_*" गिर्द व पेश के जंगले का अदब करना यानी वहाँ शिकार न करना दरख्त न काटना यह काम अल्लाह ने अपनी इबादत के लिये बनाये हैं फिर जो कोई किसी पैगम्बर या भूत के मकानों के गिर्द व पेश के जंगल का अदब करे उस पर शिर्क साबित है ख्वाह यूँ समझे कि यह आप ही इस ताजीम के लाइक या यूँ कि उनकी इस ताजीम से अल्लाह खुश होता है हर तरह शिर्क है । " कई सही हदीसों में इरशाद फरमाया कि इबराहीम  ने मक्का को हरम बनाया और मैंने मदीने को हरम किया । उसके बबूल के दरख्त न काटे जायें और उसका शिकार न किया जाये । मुसलमानों !*_

 _*ईमान से देखना कि उस शिर्क फरोश का शिर्क कहाँ तक पहुँचता है ?तुमने देखा कि इस गुस्ताख ने नबी सल्लल्लाह तआला अलैहि वसल्लम पर क्या हुक्म जड़ा ।*_

 _*📕( 7 ) तकवीयतुल ईमान सफा न . 8 में है कि*_

_*"पैगम्बरे खुदा के वक़्त में काफिर भी अपने बुतों को अल्लाह के बराबर नहीं जानते थे बल्कि उसी का मखलूक और उसका बन्दा समझते थे और उनको उसके मुकाबिल की ताकत साबित नहीं करते थे मगर यही पुकारना और मन्नत माननी और नजर व नियाज़ करनी और उनको अपना वकील व सिफारिशी समझना यही उनका कुफ्र व शिर्क था सो जो कोई किसी से यह मुआमला करेगा कि उसको अल्लाह का बन्दा व मखलूक ही समझे सो अबू जहल और वह शिर्क मे बराबर हैं ।*_

 _*" यानी जो नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की शफाअत माने कि हुजूर अल्लाह तआला के दरबार में हमारी सिफारिश फरमायेंगे तो मआजल्लाह उसके नजदीक वह अबू जहल के बराबर मुशरिक है । इसमें शफाअत के मसले का सिर्फ इन्कार ही नहीं बल्कि उसको शिर्क साबित किया और तमाम मुसलमानों सहाबा , ताबेईन . दीन के इमाम और औलियाए सालेहीन सब को मुशरिक और अबू जहल बना दिया ।*_

 _*📕( 8 ) तकवीयतुल ईमान सफा न . 58 में है कि :*_

 _*" कोइ शख्स कहे फलाने दरख्त में कितने पत्ते हैं या आसमान में कितने तारे हैं तो उसके जवाब में यह न कहे कि अल्लाह और रसूल जानें क्योंकि गैब की बात अल्लाह ही जानता है रसूल को क्या खबर ? " सुबहानल्लाह खुदाई इसी काम का नाम रह गया कि किसी पेड़ के पत्ते की तादाद जान ली जाये*_

 _*📕( 9 ) तकवीयतुल ईमान सफा न . 7 में यह है कि : -*_

 _*अल्लाह साहब ने किसी को आलम में तसर्रुफ करने की कुदरत नहीं दी इसमें अम्बियाये किराम के मोजिज़ात और औलियाए इजाम की करामत का साफ इन्कार है ।*_

 _*👑अल्लाह फरमाता है कि*_

_*📝तर्जमा : - “ कसम फ़रिश्तों की जो कामों की तदबीर करते हैं ।*_

 _*कुर्आन तो यह कहता है । लेकिन तकवीयतुल ईमान वाला कुर्आन का साफ इन्कार कर रहा है ।*_

_*📕 बहारे शरीअत, हिस्सा 1, सफा 59/60*_

_*बाकि अगले पोस्ट में*_

_*📮जारी रहेगा.....*_
━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

Al Waziftul Karima 👇🏻👇🏻👇🏻 https://drive.google.com/file/d/1NeA-5FJcBIAjXdTqQB143zIWBbiNDy_e/view?usp=drivesdk 100 Waliye ke wazai...