_*मुहर्रम - 03 शहीद की किस्में*_
―――――――――――――――――――――
_*ⓩ शहीद की 3 किस्में हैं,शहीदे हक़ीक़ी शहीदे फ़िक़्ही और शहीदे हुकमी*_
_*1. शहीदे हक़ीक़ी - वो है जो अल्लाह की राह में क़त्ल किया जाए*_
_*2. शहीदे फ़िक़्ही - वो आक़िल बालिग़ मुसलमान है जिस पर ग़ुस्ल फ़र्ज़ ना हो और वो किसी आलये जारिहा यानि बन्दूक या तलवार से ज़ुल्मन क़त्ल किया जाए, और ज़ख़्मी होने के बाद दुनिया से कोई फायदा ना हासिल किया हो या ज़िन्दों के अहकाम में से कोई हुक्म उस पर साबित ना हो मसलन लाठी से मारा गया या किसी और को मारा जा रहा था और ये मर गया या ज़ख़्मी होने के बाद खाया पिया या इलाज कराया या नमाज़ का पूरा वक़्त होश में गुज़रा या किसी बात की वसीयत की तो वो शहीदे फ़िक़्ही नहीं, मगर शहीदे फ़िक़्ही ना होने का ये मतलब हरगिज़ नहीं कि उसे शहादत का सवाब भी ना मिलेगा बल्कि मतलब ये है कि अगर शहीदे फ़िक़्ही होता तो बिना ग़ुस्ल दिये उसे उसके खून और कपड़ों के साथ नमाज़े जनाज़ा पढकर दफ्न कर देते मगर अब उसे ग़ुस्ल भी कराया जाएगा और कफ़न भी दिया जाएगा*_
_*3. शहीदे हुकमी - वो है जो ज़ुल्मन क़त्ल तो नहीं किया गया मगर क़यामत के दिन उसे शहीदों के साथ उठाया जाएगा, जैसे*_
_*! जो डूब कर मरे*_
_*! जल कर मरे*_
_*! किसी चीज़ के नीचे दब कर मरे*_
_*! निमोनिया की बीमारी में*_
_*! पेट की बीमारी से*_
_*! ताऊन से*_
_*! वो औरत जो बच्चा जनने की हालत में मरे*_
_*! जुमे के दिन या रात में*_
_*! तालिबे इल्म*_
_*! जो 100 बार रोज़ाना दुरूद पढ़े और शहादत की तमन्ना रखे*_
_*! जो पाक दामन किसी के इश्क़ में मरे*_
_*! सफर में मरे बुखार या मिर्गी या सिल की बीमारी में*_
_*! जो किसी मुसलमान की जान माल इज़्ज़त या हक़ बचाने में मरे*_
_*! जिसे दरिंदे ने फाड़ खाया*_
_*! जिसे बादशाह ने क़ैद किया और वो मर गया*_
_*! मूज़ी जानवर के काटने से मरा*_
_*! जो मुअज़्ज़िन सवाब के लिए अज़ान देता हो*_
_*! जो चाश्त की नमाज़ पढ़े*_
_*! जो अय्यामे बैद के रोज़े रखे*_
_*! जो फसादे उम्मत के मौक़े पर सुन्नत पर क़ायम हो*_
_*! जो बीमारी की हालत में 40 मर्तबा आयते करीमा पढ़े*_
_*! कुफ्फार से मक़ाबले में*_
_*! जो हर रात सूरह यासीन शरीफ पढ़े*_
_*! जो बावुज़ू सोया और मर गया*_
_*! जो अल्लाह से शहीद होने की दिल से दुआ करे*_
_*📕 खुतबाते मुहर्रम, सफह 20*_
_*📕 क्या आप जानते हैं, सफह 582*_
_*ⓩ अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त क़ुरान में इरशाद फरमाता है कि*_
_*कंज़ुल ईमान - जो खुदा की राह में मारे जाएं उन्हें मुर्दा न कहो बल्कि वो ज़िंदा हैं हां तुम्हें खबर नहीं*_
_*📕 पारा 2, सूरह बक़र, आयत 154*_
_*कंज़ुल ईमान - और जो अल्लाह की राह में मारे गए हरगिज़ उन्हें मुर्दा न ख्याल करना बल्कि वो अपने रब के पास ज़िन्दा हैं रोज़ी पाते हैं*_
_*📕 पारा 4, सूरह आले इमरान, आयत 169*_
_*हदीस - हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम इरशाद फरमाते हैं कि शहीद को क़त्ल की बस इतनी ही तक़लीफ होती है जितनी चींटी के काटने से होती है वरना मौत कि तक़लीफ के बारे मे रिवायत है कि किसी को अगर 1000 तलवार के ज़ख्म दिये जायें तो इसकी तक़लीफ मौत की तक़लीफ से कहीं ज़्यादा हलकी होगी और अल्लाह के यहां उसे 6 इनामात दिए जाते हैं*_
_*1. उसके खून का पहला क़तरा ज़मीन पर गिरने से पहले उसे बख्श दिया जाता है और उसकी रूह को फ़ौरन जन्नत में ठिकाना मिलता है*_
_*2. क़ब्र के अज़ाब से महफूज़ हो जाता है*_
_*3. उसे जहन्नम से रिहाई मिल जाती है*_
_*4. उसके सर पर इज़्ज़त का ताज रखा जाएगा*_
_*5. उसके निकाह में बड़ी बड़ी आंखों वाली 72 हूरें दी जायेंगी*_
_*6. उसके अज़ीज़ों में से 70 के हक़ में उसकी शफाअत क़ुबूल की जायेगी*_
_*📕 मिश्क़ात शरीफ, सफह 333*_
_*📕 शराहुस्सुदूर, सफ़ह 31*_
_*ⓩ अब तक इसलाम की बक़ा के लिए ना जाने कितने ही मुसलमान अपनी जान जाने आफरीन के सुपुर्द कर चुके हैं, मगर जो शहादत कर्बला के मैदान में भूखे प्यासे रहकर अपने मय अहलो अयाल के सय्यदुश शुहदा इमाम आली मक़ाम नवासये रसूल सय्यदना इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु ने पेश फरमाई वो बेमिस्ल और बे मिसाल है, एक शहीद की ज़िन्दगी को समझना हो तो ये ईमान अफ़रोज़ हिक़ायत पढ़ लीजिए*_
_*हिक़ायत:- तीन भाई मुल्के शाम में रहते थे जो बड़े जरी और बहादुर थे,हमेशा अल्लाह की राह में जिहाद किया करते थे, रूमियों ने एक मर्तबा उनको गिरफ्तार कर लिया और अपने इसाई बादशाह के सामने पेश किया उसने कहा कि तुम लोग मज़हबे इसलाम छोड़ दो और ईसाई बन जाओ उन तीनो ने बयक ज़बान कहा कि यह हरगिज़ नहीं हो सकता, बादशाह ने कहा मैं तुम लोगों को सल्तनत दूंगा और अपनी लड़कियों से शादी भी कर दूंगा तुम लोग ईसाई हो जाओ, मगर मुजाहिदीन इस पर भी ईसाई बनने के लिए तैयार न हुए, बादशाह ने कहा अगर हमारी बात नहीं मानोगे तो क़त्ल कर दिए जाओगे, मुजाहिदीन ने कहा*_
_*गुलामाने मुहम्मद जान देने से नहीं डरते*_
_*यह सर कट जाए या रह जाए कुछ परवाह नहीं करते*_
_*बादशाह ने हुक्म दिया की तीन देगों में ज़ैतून का तेल खौलाया जाए जब तेल खौल गया तो मुजाहिदीन को उन देगों के पास लाया गया और कहा गया कि अगर ईसाई नहीं बनोगे तो इसी खौलते हुए तेल में डाल दिए जाओगे, अब भी मौक़ा है खूब सोच लो उन बहादुरों ने कहा कि हमारी आखिरी सांस का जवाब यही होगा की हम जान तो दे सकते हैं मगर मुस्तफ़ा का दिया हुआ ईमान नहीं दे सकते, उन्होंने या मुहम्मदाह पुकारा फिर ईसाईयों ने बड़े भाई को तेल के खौलते हुए देग में डाल दिया, उस के बाद फिर बाकी दोनों भाइयों को समझाने की कोशिश की गयी मगर आंखों से अपने भाई का यह अंजाम देखने के बावजूद उनके अंदर कुछ फ़र्क़ पैदा नहीं हुआ, वह अब ख़ुशी के साथ अल्लाह की राह में शहीद होने के लिए तैयार रहे आखिर मंझले भाई को भी खौलते हुए तेल में डाल दिया गया, छोटे भाई की उभरती जवानी देख कर वज़ीर ने बादशाह से कहा कि इसे हमारे सुपुर्द कर दीजिए, वज़ीर ने उन्हें एक मकान में बंद कर दिया और अपनी हसीन लड़की को उन्हें बहकाने के लिए मुक़र्रर किया, रात के वक़्त लड़की दाखिल हुई वह मर्दे मुजाहिद रात भर नफ़्ल नमाज़े पढ़ता रहा और हसीना की तरफ़ नज़र उठा कर भी न देखा और कैसे देखता, जिन निगाहों में हुस्ने मुस्तफा बस चुका हो वह निगाहें भला किसी और की तरफ कैसे उठ सकती हैं*_
_*ग़ैर पर आंख न डाले कभी शैदा तेरा*_
_*सब से बेगाना है ऐ प्यारे सनाशा तेरा*_
_*लड़की के लिए यह मंज़र बड़ा ही अजीब था कि जिसकी एक झलक देखने के लिए दुनिया बेताब है यह जवान उसको एक नज़र भी देखने के लिए तैयार नहीं, सुबह के वक़्त वह नाकामी के साथ वापस आई और अपने बाप को बताया कि आज उसकी इबादत की कोई रात थी, मगर इसी तरह चालीस रातें गुज़र गयी और वह मर्दे मुजाहिद उसकी तरफ़ मुतवज्जह नहीं हुआ, आखिर में खुद वह लड़की मुतास्सिर हो गयी और कहा ऐ पाकबाज़ नौजवान तू किस का शैदाई और फिदायी है की मेरी तरफ़ निगाह उठा कर भी नहीं देखता, फ़रमाया*_
_*मैं मुस्तफा के जामे मुहब्बत का मस्त हूं*_
_*ये वो नशा नहीं जिसे तुर्शी उतार दे*_
_*लड़की सिद्क दिल से (ला इलाहा इल्लललाह मुहम्मदुर रसूलुल्ललाह) सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम पढ़ कर मुसलमान हो गयी और अस्तबल से दो घोड़े लायी, रात ही में दोनों वहां से फरार हो गए और अभी ज़्यादा दूर नहीं पहुचे थे कि पीछे से घोड़ो के आने की आहट मालूम हुई और जल्द ही वह क़रीब आ गए, देखा तो नौजवान के वही दोनों भाई हैं जो खौलते हुए तेल में डाले गए थे साथ में फरिश्तो का एक गिरोह भी था, नौजवान मुजाहिद ने हाल पूछा तो उन लोगो ने बताया कि बस वही तेल का एक गोता था जो तुम ने देखा उस के बाद हम जन्नतुल फिरदौस में पहुंच गए, फिर दोनों भाईयों ने फरिश्तो की मौजूदगी में उस लड़की का निकाह अपने भाई से कर दिया और वापस चले गए*_
_*ज़िंदा हो जाते हैं जो मरते हैं हक़ के नाम पर*_
_*अल्लाह अल्लाह मौत को किस ने मसीहा कर दिया*_
_*📕 खुतबाते मुहर्रम, सफह 30*_
_*ⓩ इस वाकिया से जहां यह साबित हुआ कि अल्लाह की राह में क़ुर्बान होने वाले शहीद मरते नहीं है बल्कि ज़िंदा हो जाते हैं, साथ ही यह भी मालूम हुआ कि मदद के लिए या रसूल अल्लाह पुकारना जायज़ है कि मुजाहिदीन ने हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम को पुकारा था अगर दूर से पुकारना शिर्क होता तो उन्हें जन्नतुल फिरदौस में जगह ना मिलती और ना छोटे भाई की शादी में फरिश्तों की शिरकत होती, अब इसी एक रिवायत से सय्यदुश शुहदा इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की ज़िन्दगी का भी अंदाज़ा लगा लीजिए, जिनकी हयाते जावेदाना पर बस यही शेअर काफी है*_
_*तू ज़िंदा है वल्लाह तू ज़िंदा है वल्लाह*_
_*मेरी चश्मे आलम से छिप जाने वाले*_
_*जारी रहेगा....*_
━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━
No comments:
Post a Comment