_*मुहर्रम - 10 क़ातिलीन हुसैन का अंजाम*_
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_*फुक़्हा - 10 मुहर्रमुल हराम 61 हिजरी को कर्बला में जिसका खून बहाकर यज़ीद पलीद ने हुक़ूमत हासिल की थी वो हुक़ूमत भी ज़्यादा दिन तक ना रही और 3 साल 7 महीने बाद ही 5 रबियुल अव्वल 64 हिजरी में 39 साल की उम्र में वो जहन्नम को रवाना हुआ, उसके बाद उसका बेटा मुआविया तख़्त पर बैठा जो कि नेक शख्स था और बाप के बुरे कामों से नफरत करता था, जब वो तख़्त पर बैठा तो बीमार था और सिर्फ 2-3 महीने ही खिलाफत कर सका और 21 साल की उम्र में उसका इंतेकाल हो गया, अब मिस्र व शाम के लोगों ने हज़रत अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की बैयत कर ली मगर मरवान ने खूफ़िया साजिशों से मिस्र व शाम पर कब्ज़ा कर लिया, जब वो मरने लगा तो अपने बेटे अब्दुल मलिक को गद्दी सौंप दी, अब्दुल मलिक बिन मरवान के बारे में अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु तआला अन्हु फरमाते हैं कि लोग बेटा पैदा करते हैं मगर मरवान ने बाप पैदा किया है, ये पहले तो नेक आदमी था मगर बाद में फासिको फ़ाजिर हो गया, इसके ज़मानये खिलाफत में कूफ़ा पर मुख़्तार बिन उबैद सक़फ़ी का तसल्लुत हुआ, मुख़्तार ने इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की शहादत का खूब इन्तेक़ाम लिया मगर आखिर ज़माने में मुख्तार भी नुबूवत का दावा करके काफिरो मुर्तद हो गया*_
_*! सबसे पहले अम्र बिन सअद व उसके बेटे हफ्स बिन अम्र की गरदन कटवाई*_
_*! खूली बिन यज़ीद जिसने इमाम का सरे मुबारक तन से जुदा किया था उसको सरे राह क़त्ल करवाकर उसकी लाश को जलवाया*_
_*! शिमर ज़िल जौशन खबीस का सर काटकर लाश को कुत्तों के सामने डाला गया*_
_*! अब्दुल्लाह बिन उसैद जुहनी, मालिक बिन नुसैर बद्दी, हमल बिन मालिक महारबी इन तीनों के हाथ पैर काटकर ज़िंदा छोड़ दिया गया, ये तीनों इसी तरह तड़पते बिलखते मर गए*_
_*! हकीम बिन तुफ़ैल ताई वो खबीस है जिसने हज़रत अब्बास अलमदार के कपड़े उतार लिए थे, सो इसको जिंदा ही नंगा करके तीरों से छलनी कर दिया गया*_
_*! अम्र बिन सुबैह ने शोहदाए करबला में से कई को ज़ख़्मी किया था, उसे नेज़ों से छेद छेद कर मारा गया*_
_*! ज़ैद इब्ने रक़ाद वो खबीस था जिसने अब्दुल्लाह बिन मुसलिम बिन अक़ील की पेशानी पर तीर मारा था, इसको तीरों से छलनी किया गया मगर जान बाकी थी तो उसको ज़िंदा जलवाया गया*_
_*! अब्दुल्लाह इब्ने ज़ियाद वो हरामखोर खबीस था जिसने अहले बैत पर काफी ज़ुल्म किये, शहादते कर्बला के ठीक 6 साल बाद 10 मुहर्रम 67 हिजरी को इस कुत्ते का सर काटकर वहीं रखा गया, जहां इसने इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु का सरे मुबारक रखा था, उस ज़लील के सर पर एक सांप नमूदार हुआ जो उसके नथुनों से घुसकर मुंह से निकलता रहा और फिर गायब हो गया*_
_*! 6000 कूफ़ी यानि राफजी मुख़्तार के हाथों मारे गए, कितने अंधे और कोढ़ी हो गए, कुछ की आंखों में जलती हुई सलाई फेरी गयी, कुछ को जिंदा जलाया गया, और कुछ के मुंह सुअर की तरह हो गए, और कुछ तो ऐसे थे कि पानी पीते मगर प्यास न बुझती और युंही तड़प तड़प कर मरे, और जैसा कि रब ने फ़रमाया था कि मैं 140000 को मारूंगा सो उसने अपना वादा पूरा किया और 140000 को हलाक़ किया, यहां पर एक सवाल उठता है कि हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु से जंग को तो 22000 का लश्कर ही गया था तो 140000 क्यों मारे गए, तो इसका जवाब ये है जैसा कि हदीस पाक में है कि जो शख्स गुनाह में शामिल ना हो मगर उसे अच्छा समझता हो तो वो भी उसी के मिस्ल है, तो अगर जंग में 22000 का लश्कर ही मौजूद था मगर हज़ारों मक्कार दोगले कूफ़ी यानि राफजी यानि शिया उसमे शामिल थे तो अल्लाह ने उन सबको तरह तरह की मुसीबतों में डालकर हलाक किया, और आज भी और क़यामत तक ये गद्दार युंहि मुसीबत मे गिरफतार रहेंगे युंहि अपना सीना पीटते रहेंगे और यही कहते रहेगे कि (ऐ हुसैन हम ना थे)*_
_*📕 ख़ुतबाते मुहर्रम, सफह 495-510*_
_*📕 खसाइसे कुबरा, सफह 126*_
_*खत्म.....*_
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