Tuesday, September 25, 2018



              _*मुहर्रम - 06 शहीदे आज़म*_
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_*अल्लाहुम्मा सल्ले वसल्लिम वबारिक अलैहि व अलैहिम व अलल मौलस सय्यदिल इमामे हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु*_

_*नाम ----- सय्यदना इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु*_

_*लक़ब ---- सिब्ते रसूल, रैहानतुर रसूल, सय्यदुश शुहदा*_

_*वालिद --- मौला अली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु*_

_*वालिदा -- खातूने जन्नत हज़रत फातिमा रज़ियल्लाहु तआला अन्हा*_

_*विलादत - 5 शाबान, 4 हिजरी*_

_*बीवियां  - 4, शहर बानो-रुबाब बिन्त इमरा अलक़ैस-लाईला बिन्त अबी मुर्राह अल थक़ाफी, उम्मे इस्हाक़ बिन्त तल्हा बिन उबैदुल्लाह*_

_*औलाद  -- 6, हज़रत ज़ैनुल आबेदीन व हज़रते सकीना शहर बानो से, हज़रत अली अकबर व फातिमा सुग़रा लाईला से, हज़रत अली असगर व सुकैना रुबाब से*_

_*विसाल --- 10 मुहर्रम,61 हिजरी, जुमा*_

_*उम्र    --  56 साल 5 महीने 5 दिन*_

_*ⓩ आपके फज़ाइल में बेशुमार हदीसें वारिद हैं हुसूले बरकत के लिए चंद यहां ज़िक्र करता हूं*_

_*हुज़ूर सल्लललाहु तआला अलैहि वसल्लम इरशाद फरमाते हैं कि हुसैन मुझसे है और मैं हुसैन से हूं और फरमाते हैं कि जिसने हुसैन से मोहब्बत की उसने अल्लाह से मोहब्बत की*_

_*📕 मिशकात, सफह 571*_

_*हुज़ूर सल्लललाहु तआला अलैहि वसल्लम इरशाद फरमाते हैं कि जो चाहता है कि जन्नती जवानों के सरदार को देखे तो वो हुसैन को देख ले*_

_*📕 नूरुल अबसार, सफह 114*_

_*हुज़ूर सल्लललाहु तआला अलैहि वसल्लम ने एक मर्तबा इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु को देखकर फरमाया कि आज यह आसमान वालों के नज़दीक तमाम ज़मीन वालों से अफज़ल है*_

_*📕 अश्शर्फुल मोअब्बद, सफह 65*_

_*हुज़ूर सल्लललाहु तआला अलैहि वसल्लम ने इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु पर अपने बेटे हज़रत इब्राहीम रज़ियल्लाहु तआला अन्हु को क़ुर्बान कर दिया*_

_*📕 शवाहिदुन नुबुवत, सफह 305*_

_*हुज़ूर सल्लललाहु तआला अलैहि वसल्लम इरशाद फरमाते हैं कि हसन के लिए मेरी हैबत व सियादत है और हुसैन के लिए मेरी ज़ुर्रत व सखावत है*_

_*📕 अश्शर्फुल मोअब्बद, सफह 72*_

_*इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु बहुत बड़ी फज़ीलत के मालिक हैं आप कसरत से नमाज़-रोज़ा-हज-सदक़ा व दीग़र उमूरे खैर अदा फरमाते थे, आपने पैदल चलकर 25 हज किये*_

_*📕 बरकाते आले रसूल, सफह 145*_

_*करामत - अबु औन फरमाते हैं कि एक मर्तबा हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु का गुज़र कस्बा इब्ने मुतीअ के पास से हुआ, वहां एक कुंआ था जिसमे पानी बहुत कम रह गया था यहां तक कि डोल भी भरकर ऊपर ना आ पाता था जब लोगों ने आपको देखा तो पानी की किल्लत की शिकायत की तो आपने फरमाया कि एक डोल पानी लाओ जब पानी आ गया तो आपने उसमें थे थोड़ा सा मुंह में लिया और डोल में कुल्ली कर दी और फरमाया कि इसे कुंअे में डाल दो, जैसे ही कुंअे में वो पानी डाला गया कुंआ पानी से लबरेज़ हो गया और पहले से ज़्यादा ज़ायकेदार भी हो गया*_

_*📕 इब्ने सअद, जिल्द 5, सफह 144*_

_*ⓩ ये वही हुसैन बिन अली हैं जिन पर कर्बला में 3 दिन तक पानी बंद कर दिया गया ये रब की रज़ा थी जिस पर आप राज़ी थे वरना कसम खुदा की आप ज़मीन पर एक ठोकर मार देते तो फुरात आपके खेमे से होकर बहती*_

_*करामत - मैदाने कर्बला में एक जहन्नमी मालिक बिन उरवा ने आपके खेमो में आग जलती हुई देखी तो बेबाकी से कहा कि ऐ हुसैन तुमने तो जहन्नम से पहले ही आग जला ली इतना सुनना था कि आप जलाल में फरमाते हैं कि ज़ालिम क्या तेरा ये गुमान है कि हुसैन जहन्नम में जायेगा आपने दुआ की कि ऐ मौला इसे जहन्नम से पहले ही दुनिया की आग का मज़ा चखा, अभी ज़बान से ये निकला ही था कि उसका घोड़ा बिदका वो गिरा उसका पैर लगाम में उलझा और घोड़ा उसे घसीटते हुए एक आग की खन्दक में फेंक आया*_

_*📕 रौज़तुश शुहदा, सफह 230*_

_*ⓩ कर्बला की ये करामत भी ज़ाहिर करती है कि आप मजबूर ना थे बल्कि मुखतार थे मगर बस वही कि खुदा की रज़ा में राज़ी थे*_

_*करामत - सय्यदुश शुहदा हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की शहादत के बाद जब यज़ीदियों ने आपके सर मुबारक को नेज़े पर चढ़ाकर कूफा की गलियों में घुमाया तो सहाबिये रसूल हज़रत अरक़म रज़ियल्लाहु तआला अन्हु फरमाते हैं कि मैं उस वक़्त अपने घर की खिड़की पर मौजूद था जब आपका सर मुबारक मेरे करीब से गुज़रा तो मैंने देखा कि आप सूरह कहफ की ये आयत तिलावत फरमा रहे थे "क्या तुम्हें मालूम हुआ कि पहाड़ की कोह और जंगल के किनारे वाले हमारी एक अजीब निशानी थे, आयत-9" ये सुनकर मेरे बदन के रोंगटे खड़े हो गए और मैंने कहा कि "ऐ इब्ने रसूल बाख़ुदा आपका किस्सा इससे भी ज़्यादा तअज्जुब खेज़ है" और जब आपका सर मुबारक इब्ने ज़्याद के पास लाकर उतारा गया तब आप सूरह इब्राहीम की ये आयत पढ़ रहे थे "और हरगिज़ अल्लाह को बे खबर ना जानना ज़ालिमों के काम से, आयत-42"*_

_*📕 तज़किरा, सफह 68*_

_*ⓩ अंदाज़ा लगाईये कि जिसका सिर उसके धड़ से जुदा हो क्या वो कुछ हरकत कर सकता है नामुमकिन है, मगर अल्लाह वालों के लिए कोई भी काम नामुमकिन नहीं ये खुली हुई करामत है कि बज़ाहिर तो आप शहीद हुए मगर इसके बावजूद आप अपने जिस्म जिस्मानियत के साथ ज़िंदा हैं, तो जब शहीद ज़िंदा हैं और क़ुर्आन इस बात की गवाही दे रहा है तो फिर कुछ लोगों का ये कहना कि नबी मरकर मिट्टी में मिल गए मआज़ अल्लाह इसे उनकी जिहालत और अम्बिया से दुश्मनी के अलावा और क्या समझा जाये*_

_*जारी रहेगा.....*_
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