_*बहारे शरीअत, हिस्सा- 01 (पोस्ट न. 175)*_
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_*👑विलायत का बयान👑*_
_*🌟मसअ्ला : - औलिया से इस्तिमदाद और इस्तिआनत ( मदद चाहना या माँगना ) बेहतर है । यह लोग मदद माँगने वालों की मदद करते हैं उनसे मदद माँगना किसी जाइज़ लफ्ज़ से हो , मुसलमान औलिया को कभी मुस्तकिल फाइल ( करने वाला ) नहीं मानते वहाबियों का फरेब है कि वे मुसलमानों के अच्छे कामों को भोंडी शक्ल में पेश करते हैं और यह वहाबियत का खास्सा हैं । ( कहने का मतलब यह है कि वहाबी जाइज़ अल्फाज़ से मदद को भी शिर्क बताते हैं जबकि जाएज़ तरीके से मदद माँगना जाइज़ और नाजाइज़ तौर पर मदद माँगना गुनाह । हाँ अगर किसी ने मदद करने वाले को अल्लाह का शरीक जाना या यह जाना कि बिना अल्लाह तआला के दिए किसी और से मिला तो ऐसा करने वाला मुश्रिक और काफिर हुआ और मुसलमान ऐसा हरगिज़ नहीं करते ।*_
_*🌟मसअ्ला : - औलिया के मज़ारात पर हाज़िरी मुसलमानों के लिए नेकी और बरकत का सबब है ।*_
_*🌟मसअ्ला : - अल्लाह के वलियों को दूर और नज़दीक से पुकारना बुजुर्गों का तरीका है ।*_
_*🌟मसअ्ला : - औलियाए किराम अपनी कब्रों में हमेशा रहने वाली ज़िन्दगी के साथ ज़िन्दा हैं । उनके इल्म इदराक ( समझ बूझ ) उनके सुनने और देखने में पहले के मुकाबले में कहीं ज़्यादा तेज़ी है ।*_
_*🌟मसअ्ला :- औलिया को ईसाले सवाब करना न मुस्तहब चीज़ है और बरकतों का ज़रिया है । उसे आरिफ लोग नज्र व नियाज़ कहते हैं । यह नज़र शरई नहीं जैसे बादशाह को नज़्र देना उन में ख़ास कर ग्यारहवीं शरीफ की फातेहा निहायत बड़ी बरकत की चीज़ है ।*_
_*🌟मसअ्ला : - औलियाए किराम का उर्स यानी कुर्आन शरीफ़ पढ़ना , फातिहा पढ़ना , नात शरीफ पढ़ना , वाज़ , नसीहत और ईसाले सवाब अच्छी चीज़ हैं । रही वह बातें कि उर्स में नासमझ लोग कुछ खुराफातें शामिल कर देते हैं तो इस किस्म की खुराफातें तो हर हाल में बुरी हैं और मुकद्दस मज़ारों के पास तो और भी ज्यादा बुरी हैं ।*_
_*बहारे शरिअत हिस्सा 1, सफा 71*_
_*🤲 तालिबे दुआँ क़मर रज़ा ह़नफ़ी*_
_*📮जारी रहेगा.....*_
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