Thursday, September 27, 2018



                       _*छांई और मुहासे*_
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*_चेहरे पर एक किस्म का सियाह दाग या धब्बा पड़ जाता है उसे छांई कहते हैं, कुछ नुस्खे दर्ज हैं_*

*_अनार का छिल्का और संतरे का छिल्का दोनों को अंगूर के सिरके में भिगोकर रखें और इन छिल्कों से दाग पर मालिश करें, छांई दूर करने के लिए बेहद मुफीद है_*

_*📕 गंजीनये तबीब, सफह 167*_

*_कागज़ी नींबू में हल्दी मिलाकर मलें फायदा होगा_*

_📕 *इलाजुल गुरबा, सफह 190*_

 *_चुकंदर और फिटकरी दोनों को पीसकर प्याज के रस में मिलाकर लगाने से बहुत जल्द फायदा होता है_*

_*📕 मुजर्बाते सुयूती, 87*_

_*और अगर चेहरे पर मुंहासे हो तो ये इस्तेमाल करें*_

_*बथुवे की जड़ को गाय के दूध में पीसकर लगाने से मुंहासे दूर हो जाते हैं*_

_*कलौंजी को सिरके में पीस लें रात को लगाएं और सुबह को मुंह धो लिया करें*_

_*सरस की छाल और काली तिल दोनों को बराबर सिरके में पीसकर चेहरे पर लगाएं इंशा अल्लाह मुहासे दूर हो जाएंगे*_

_📕 *इलाजुल गुरबा, सफह 188*_
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Wednesday, September 26, 2018



                    _*इबलीस का पोता*_
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_*बेहकी में अमीर-उल-मोमिनीन हजरते उमर फारूक रजी अल्लाहो व सल्लम के हमराह से रिवायत हैं के एक रोज हम हुजूर सल-लल्लाहो अलेह व सल्लम के हमराह तहामा की पहाड़ी पर बैठें थे के अचानक एक बूढ़ा हाथ मे असा लिए हुजूर रसूल-उल-सकलेन सय्यद-उल-अम्बिया सल लल्लाहो तआला अलेह व सल्लम के सामने हाजिर हुआ और सलाम अर्ज किया।*_

_*हुजूर ने जवाब दिया और फरमाया उसकी आवाज जिनों की सी है।फिर आपने उससे दरयाफ्त किया तु कौन हैं..?*_

_*उसने अर्ज किया मैं जिन्न हूँ। मेरा नाम हामा हैं , बेटा हेम का और हेम बेटा लाकिस का और लाकीस बेटा इबलीस का है। हुजूर ने फरमाया तो गोया तेरे और इबलीस के दरमियान सिर्फ दो पुश्तें है।*_

_*फिर फरमाया अच्छा ये बताओ तुम्हारी उम्र कितनी हैं..?*_

_*उसने कहा या रसूल अल्लाह!जितनी उम्र दुनिया की हैं उतनी ही मेरी हैं।कुछ थोड़ी सी कम है। हुजूर जिन दिनो काबील ने हाबिल को कत्ल किया था उस वक्त मैं कई बरस का बच्चा ही था मगर बात समझता था पहाड़ो में दौड़ता फिरता था और लोगों का खाना व गल्ला चोरी कर लिया करता था और लोगों के दिलों में वसवसे भी डाल देता था के वो अपने अपने खवीश व अक्रबत से बदसलूकी करे।*_

_*हुजूर ने फरमाया- तब तो तुम बहुत बुरे हो उसने अर्ज की हुजूर मुझे मलामत ना फरमाईये इसलिए के अब मैं हुजूर कि खिदमत में तौबा करने हाजिर हुआ हूँ। या रसूल अल्लाह !*_

_*मैंने हजरते नूह अलेहिस्सलाम से मुलाकत की है और एक साल तक उनके साथ उनकी मस्जिद में रहा हूँ उससे पहले मैं उनकी बारगाह में भी तौबा  कर चुका हूँ ।हजरते हूद, हजरते याकूब और हजरते युसूफ अलेहिस्सलाम की सोहब्बतो में भी रह चुका हूँ।और उन से तौरात सीखी है और उनका सलाम हजरत ईसा अलेहिस्सलाम को पहुँचाया था।और ऐ नबीयो के सरदार ईसा अलेहिस्सलाम ने फरमाया था के अगर तु मोहम्मद रसूल अल्लाह सल -लल्लाहो तआला अलेही व सल्लम से मुलाकात करें तो मेरा सलाम उनको पहुँचाना सो हुजूर! अब मैं इस अमानत से सबुकदोश होने को हाजिर हुआ हूँ। और ये भी आरजु हैं के आप अपनी जुबाने हक तर्जुमान से मुझे कुछ कलाम अल्लाह तलीम फरमाईये। हुजूर अलेहिस्सलाम ने उसे सूरह मुरसलात, सुरह अम्मायतासअलून, अख्लास और मऊजतीन और इजा अश्शम्स तालीम फरमायी।और ये भी फरमाया के ऐ हारा ! जिस वक्त तुम्हें कोई अहेतियाज हो फिर मेरे पास आ जाना और हम से मुलाकात ना छोड़ना।*_

_*हजरते उमर रजी अल्लाहो फरमाते है कि हुजूर अलेहिस्सलाम ने तो विसाल फरमाया लेकिन हामा की बाबत फिर कुछ ना फरमाया, खुदा जाने हामा अब जिन्दा है या मर गया है।*_

_*📝सबक- हमारे हुजूर सल-लल्लाहो तआला अलेह व सल्लम रसूल-उल-सकलेन और रसूल अलकुल है और आपकी बारगाहे आलियो जिन्नो इन्स की मरजऐ हैं।*_

_*📕 खुलासत-उल-तफासीर सफा 170*_
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                    _*खालिद की टोपी*_
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_*🔘 हजरत खालिद बिन वलीद रजी अल्लाहो अन्ह जो अल्लाह की तलवारों में से एक तलवार थे आप जिस मैदाने जंग तशरीफ ले जाते अपनी टोपी को जरूर सर पर रख कर जाते और हमेशा फतेह ही पाकर लौटते कभी शिकस्त का मुँह ना देखते.! एक मर्तबा जंगे यरमूक में जब के मैदाने जंग गर्म हो रहा था हजरत खालिद की टोपी गुम हो गई। आपने लड़ना छोड़ कर टोपी की तलाश शुरू कर दी।*_

_*लोगों ने जब देखा के तीर और पत्थर बरस रहे है।तलवार और नेजेह अपना काम कर रहे है।मौत सामने है और उस आलम मे खालिद को अपनी टोपी की पड़ी हुई है और वो भी उसी को ढूँढने मे मसरूफ हो गए है तो उन्होंने हजरत खालिद से कहा -जनाब टोपी का खयाल छोड़िये और लड़ना शुरू किजिए।*_

_*हजरत खालिद ने उनकी उस बात की परवाह ना की और टोपी की बदस्तूर तलाश शुरू रखी आखिर टोपी उनको मिल गई तो उन्होंने खुश होकर कहा *भाईयो ! जानते हो मुझे ये टोपी क्यों इतनी अजिज हैं ..?*_

_*जान लो के मैंने आज तक जो जंग भी जिती इसी टोपी के तुफैल।मेरा क्या है सब इसी की बरकत है।मैं इसके बगैर कुछ भी नहीं और अगर ये मेरे सर पर हो तो फिर दुश्मन मेरे सामने कुछ भी नहीं। लोगों ने कहा आखिर इस टोपी की क्या खूबी हैं..?*_

_*तो फरमाया- ये देखो इसमें क्या है! ये हुजूर सरवरे आलम सल-लल्लाहो तआला अलेह व सल्लम के सर अनवर के बाल मुबारक है जो मैंने इसी मे सी रखे है।*_

_*हुजूर एक मर्तबा उमरह बजा लाने को बैअत-उल्लाह शरीफ तशरीफ ले गए।और सर मुबारक के उतरवाऐ तो उस वक्त हम में से हर एक शख्स बाल मुबारक लेने की कोशिश कर रहा था।और हर एक दूसरे पर गिरता था।तो मैंने भी इसी कोशिश में आगे बढ़ कर चन्द बाल मुबारक हासिल कर लिए थे और फिर इस टोपी में सी लिए। ये टोपी अब मेरे लिए जुमला बर्कात व फतूहात का जरिया है।मै इसी के सदके मे हर मैदान का  फातहे बनकर लौटता हूँ।फिर बताओ ! ये टोपी अगर ना मिलती तो मुझे चैन कैसे आता..?*_

_*📝सबक- हुजूर सरवरे आलम सल-लल्लाहो तआला अलेह व सल्लम ही जुमला बर्कात व इनामत का जरिया है और आपका बाल बाल शरीफ बर्कत व रहमत हैं और ये भी मालूम हुआ के सहाबा इकराम अलेहिम अर्रिजवान हुजूर सल-लल्लाहो तआला अलेह व सल्लम से मुतअल्लिक अशिया को बतौर तबर्रूक अपने पास रखते थे और जिसके पास आपका बाल मुबारक भी होता अल्लाह तआला उसे कामयाबियों से सरफराज फरमाता था।*_

_*📕 हुज्जत-उल्लाह अलल आलमीन सफा-202*_
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                          _*दुरूदे पाक*_
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*_1.  जो कोई एक बार दुरूदे पाक पढ़ता है तो उसके दुरूद से एक परिंदा पैदा होता है जिसके 70000 बाज़ू हैं हर बाज़ू में 70000 पर हैं हर पर में 70000 चेहरे हैं हर चेहरे में 70000 मुहं हैं हर मुहं में 70000 ज़बान है और वो हर ज़बान से 70000 बोलियों में रब की तस्बीह पढ़ता है और इन तमाम तस्बीहों का सवाब उस पढ़ने वाले के नामये आमाल में लिखा जाता है_*

_*📕 नूर से ज़हूर तक, सफह 15*_

_*सल्लललाहो तआला अलैही वसल्लम*_

 *_जो नबी पर एक बार दुरूद शरीफ पढ़े तो मौला तआला उस पर 10 रहमते नाज़िल फरमायेगा उसके 10 गुनाह मिटा देगा और उसके 10 दर्जे बुलन्द करेगा और दूसरी रिवायत में है कि मौला और उसके फरिश्ते उस पर 70 मर्तबा दुरूद पढ़ते हैं_*

_*📕 बहारे शरीयत, हिस्सा 3, सफह 76*_

_*सल्लललाहो तआला अलैही वसल्लम*_

*_जो रोज़ाना 100 बार नबी करीम सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम पर दुरूदे पाक पढ़े और शहादत की तमन्ना रखे तो वह शहीद मरेगा_*

_*📕 बहारे शरीयत, हिस्सा 4, सफह 174*_

_*सल्लललाहो तआला अलैही वसल्लम*_

*_जो कोई दिन भर में 1000 बार दुरूद शरीफ पढ़ेगा तो वो उस वक़्त तक नहीं मरेगा जब तक की अपनी जगह जन्नत में ना देख ले_*

_*📕 खज़ीनये दुरूद शरीफ, सफह 14*_

_*सल्लललाहो तआला अलैही वसल्लम*_

 *_जब भी जहां भी और जितनी बार भी नबी करीम सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम का नाम मुबारक आये तो हर बार आप पर दुरूदे पाक पढ़ना बाज़ उल्मा के नज़दीक वाजिब है और ऐसा ना करने वालों पर सख्त वईदें आई है_*

_*📕 बहारे शरीअत, हिस्सा 1, सफह 21*_

_*सल्लललाहो तआला अलैही वसल्लम*_

*_हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम फरमाते हैं कि जिसने रमज़ान पाया और अपनी बख्शिश ना करा सका वो हलाक हुआ जिसने अपने वालिदैन को पाया और उनकी खिदमत करके अपनी बख्शिश ना करा सका वो हलाक हुआ और जिसके पास मेरा ज़िक्र हुआ और उसने मुझपर दुरूद ना पढ़ा वो हलाक हुआ_*

_*📕 बहारे शरीअत, हिस्सा 5, सफह 97*_

_*सल्लललाहो तआला अलैही वसल्लम*_

 *_बाज़ लोग हिंदी में नामे अक़्दस के आगे बजाये सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम लिखने के सिर्फ सल्ल. लिखते हैं या अंग्रेजी में S.A.W. और उर्दू में ص ل ع م लिख देते हैं ऐसा करना सख्त नाजायज़ो हराम है_*

_*📕 बहारे शरीअत, हिस्सा 1, सफह 21*_

_*सल्लललाहो तआला अलैही वसल्लम*_

 *_हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम फरमाते हैं कि जिसने मेरे नाम के साथ दुरूदे पाक लिखा तो जब तक वो वहां लिखा रहेगा फरिश्ते उसके लिए मग़फिरत की दुआ करते रहेंगे और उसका सवाब जारी रहेगा_*

_*📕 कुर्बे मुस्तफा, सफह 79-80*_

_*सल्लललाहो तआला अलैही वसल्लम*_

*_जिसने दुआ के अव्वल और आखिर में दुरूद शरीफ पढ़ा तो उसकी दुआ रद्द नहीं की जाती_*

_*📕 क़ुर्बे मुस्तफा, सफह 75*_

_*सल्लललाहो तआला अलैही वसल्लम*_

 *_जिसने दुरूदे पाक को ही अपना वज़ीफा बना लिया तो ये उसकी दुनिया और आखिरत के लिए तन्हा काफी है और उसको दूसरे किसी वज़ीफे की जरूरत नहीं है_*

_*📕 बहारे शरीयत, हिस्सा 3, सफह 77*_

_*सल्लललाहो तआला अलैही वसल्लम*_

_*हदीसे पाक में आता है कि इल्म फैलाने वाले के बराबर कोई आदमी सदक़ा नहीं कर सकता*_

_*📕 क़ुर्बे मुस्तफा, सफह 100*_
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                          _*हिकायत*_
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*_हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम के ज़माने में एक बुढ़िया थी जिसने एक दिन तीन रोटियां सदक़ा की, मगर उसके बाद अचानक एक हवा चली और उसका बचा हुआ पूरा आटा हवा में उड़ गया, बुढ़िया को बहुत गुस्सा आया और वो हवा की शिकायत लेकर हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम की बारगाह में हाज़िर हुई, हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम ने हवा को बुलाया और पूछा कि तुमने इसका आटा क्यों उड़ाया तो हवा ने कहा इसके बारे में आप हवा के फरिश्ते से दरयाफ़्त करें फिर आपने हवा के फरिश्ते को बुलवाया और सवाल किया तो उसने कहा कि आप खुदा से पूछिए फिर आपने बारगाहे खुदावन्दी में अर्ज़ की तो मौला फरमाता है कि मेरा कोई भी काम अबस नहीं होता, समंदर में एक कश्ती जा रही थी उसमें चूहे ने सुराख कर दिया, कश्ती डूबने को हुई तो मैंने हवा को हुक्म दिया कि वो ये आटा उड़ाकर कश्ती में डाल दे ताकि वो लोग इससे कश्ती के सूराख को भर लें, चुनांचे उन्होंने ऐसा ही किया और वो सही सलामत किनारे पर पहुंच गए, हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम ने 3 लाख दीनार बुढ़िया को दिया और फरमाया कि ये तेरे सदक़े की बरकत है और खुदा का शुक्र अदा किया_*

_*📕 नुज़हतुल मजालिस, जिल्द 1, सफह 162*_

 *_एक मर्तबा हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने छत पर छिपकली को लटकते हुए देखा तो तो खुदा से पूछा कि ऐ मौला तूने छिपकली को किस लिए पैदा फरमाया तो मौला फरमाता है कि ऐ मूसा अभी तुमसे पहले ये छिपकली भी मुझसे यही पूछ रही थी कि ऐ मौला तूने मूसा को क्यों पैदा फरमाया है_*

_*📕 शैतान की हिकायत, सफह 7*_

*_एक बादशाह का एक वज़ीर जो कि बड़ा नेक बख्त था और बादशाह का बहुत ही अज़ीज़ भी था हमेशा हर काम में बादशाह के साथ ही रहता, उसकी आदत थी कि कुछ भी हो जाए मगर उसके मुंह से यही जुमला निकलता था कि "अल्लाह जो करता है अच्छा करता है" अजीब इत्तेफाक ये हुआ कि बादशाह ने किसी शहर पर हमले के लिए फौज भेजी मगर वहां उसे शिकस्त हुई, जब ये खबर बादशाह को दी गयी तो वज़ीर की ज़बान से यही निकला कि "अल्लाह जो करता है अच्छा करता है" खैर बादशाह ने वज़ीर की बात को अनसुना कर दिया, कुछ दिनों के बाद बादशाह की मां का इन्तेक़ाल हो गया और वज़ीर यही बोला कि "अल्लाह जो करता है अच्छा करता है" अबकी बादशाह को बड़ा गुस्सा आया मगर कुछ ना कहा, अचानक एक दिन किसी काम को करते हुए बादशाह की एक ऊंगली कटकर गिर गई बादशाह दर्द से तड़प उठा मगर जैसा कि वज़ीर का मामूल था उसकी ज़बान से यही निकला कि "अल्लाह जो करता है अच्छा करता है" अब बादशाह से ज़ब्त ना हो सका और उसने सिपाहियों को हुक्म दिया कि वज़ीर को काल कोठरी में डाल दे और रोज़ाना कोड़े लगाये जाएं, सिपाही वज़ीर को ले जाने लगे तब भी वज़ीर यही बोला कि "अल्लाह जो करता है अच्छा करता है" खैर 6 महीने गुज़र गए ज़ख्म तो भर ही गया मगर ऊंगली तो कट ही चुकी थी, फिर एक दिन बादशाह कहीं शिकार को गया उसके सिपाही साथ ही थे मगर शिकार के पीछे ऐसा घोड़ा दौड़ाया कि सिपाही कहां छूट गए पता ही नहीं चला, बादशाह जंगल में कहीं गुम हो गए और जहां पहुंचे वहां आदि-वासियों का डेरा था उन्हें पकड़ लिया गया, अब ये चिल्ला रहे हैं कि मैं बादशाह हूं मगर सुने कौन, उनके यहां बलि देने का भी कानून था सो इनको नहलाया धुलाया गया और बलि देने के लिए हाज़िर किया गया, मगर जैसे ही इन्हें लिटाया गया और गर्दन काटने वाले की नज़र बादशाह की कटी ऊंगली पर गयी तो वो चिल्लाने लगा और अपने सरदार से बादशाह की कटी हुई ऊंगली दिखाई, सरदार ने बादशाह को छोड़ दिया, ये गिरते पड़ते दरबार पहुंचे समझ तो गए थे कि कटी ऊंगली की वजह से ही बचे हैं, फौरन वज़ीर को जेल से निकलवाया गया, वज़ीर से बादशाह ने कहा कि इतना तो मेरी समझ में आ गया कि उस दिन अगर मेरी उंगली ना कटती तो आज गर्दन ना बचती ये मेरे लिए अच्छा हुआ मगर तुम पिछले 6 महीने से जेल में हो तुम्हारे हक़ में कैसे अच्छा हुआ तो वज़ीर ने जवाब दिया कि हुज़ूर मैं आपका खास था आपके हर काम में साथ देता था तो अगर मैं भी आपके साथ शिकार पर गया होता तो कटी हुई ऊंगली की वजह से आप तो बच जाते मगर मेरी गर्दन तो मारी जाती इसी लिए अल्लाह ने पहले ही मुझे सज़ा के तौर पर आपसे जुदा करवा दिया था, ये सुनकर बादशाह को भी उसकी बात पर यक़ीन आ गया कि "अल्लाह जो करता है अच्छा करता है"_*

*_अलहासिल कहना ये है कि मौला ने जो भी पैदा फरमाया है सब ही हिक़मत के तहत है और उसका कोई भी काम हिक़मत से खाली नहीं होता, लिहाज़ा बन्दे पर जो भी गुज़रे उसे हर हाल में अपने रब का शुक्र और सब्र ही करना चाहिए कि "अल्लाह जो करता है अच्छा करता है"_*
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          _*पांच कलीमे और उनके तर्जुमा*_
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_*1). पहला कलमा तय्यब: ला इलाहा इलल्लाहु मुहम्मदुर्रसूलुल्लाहि*_

_*📝तर्जुमा: अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं और हज़रत मुहम्मद सलल्लाहो अलैहि वसल्लम अल्लाह के नेक बन्दे और आखिरी रसूल है.*_

_*2). दूसरा कलमा शहादत: अश-हदु अल्लाह इल्लाह इल्लल्लाहु वह दहु ला शरी-क लहू व अशदुहु अन्न मुहम्मदन अब्दुहु व रसूलुहु*_

_*📝तर्जुमा: मैं गवाही देता हु के अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं. वह अकेला है उसका कोई शरीक नहीं. और मैं गवाही देता हु कि (हज़रत) मुहम्मद सलल्लाहो अलैहि वसल्लम अल्लाह के नेक बन्दे और आखिरी रसूल है।*_

_*3). तीसरा कलमा तमजीद: सुब्हानल्लाही वल् हम्दु लिल्लाहि वला इला-ह इलल्लाहु वल्लाहु अकबर, वला हौल वला कूव्-व-त इल्ला बिल्लाहिल अलिय्यील अजीम*_

_*📝तर्जुमा: अल्लाह पाक है और सब तारीफें अल्लाह ही के लिए है और अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं. इबादत के लायक तो सिर्फ अल्लाह है और अल्लाह सबसे बड़ा है और किसी में न तो ताकत है न बल लेकिन ताकत और बल तो अल्लाह ही में है जो बहुत शान वाला और बड़ा है.*_

_*4). चौथा कलमा तौहीद: ला इलाह इल्लल्लाहु वह्-दहु ला शरीक लहू लहुल मुल्क व लहुल हम्दु युहयी व युमीतु व हु-व हय्युल-ला यमूतु अ-ब-दन अ-ब-दा जुल-जलालि वल इक् रामि वियदि-हिल खैर व हु-व अला कुल्लि शैइन क़दीर*_

_*📝तर्जुमा: अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं इबादत के लायक, वह एक है, उसका कोई साझीदार नहीं, सबकुछ उसी का है. और सारी तारीफ़ें उसी अल्लाह के लिए है. वही जिलाता है और वही मारता है. और वोह जिन्दा है, उसे हरगिज़ कभी मौत नहीं आएगी. वोह बड़े जलाल और बुजुर्गी वाला है. अल्लाह के हाथ में हर तरह कि भलाई है और वोह हर चीज़ पर क़ादिर है.*_

_*5). पांचवाँ कलमा इस्तिग़फ़ार: अस्तग़-फिरुल्ला-ह रब्बी मिन कुल्लि जाम्बिन अज-नब-तुहु अ-म-द-न अव् ख-त-अन सिर्रन औ अलानियतंव् व अतूवु इलैहि मिनज-जम्बिल-लजी ला अ-अलमु इन्-न-क अन्-त अल्लामुल गुयूबी व् सत्तारुल उवूबि व् गफ्फा-रुज्जुनुबि वाला हो-ल वला कुव्-व-त इल्ला बिल्लाहिल अलिय्यील अजीम*_

_*📝तर्जुमा: मै अपने परवरदिगार (अल्लाह) से अपने तमाम गुनाहो कि माफ़ी मांगता हुँ जो मैंने जान-बूझकर किये या भूल कर किये, छिप कर किये या खुल्लम खुल्ला किये और तौबा करता हु मैं उस गुनाह से, जो मैं जनता हु और उस गुनाह से जो मैं नहीं जानता. या अल्लाह बेशक़ तू गैब कि बाते जानने वाला और ऐबों को छिपाने वाला है और गुनाहो को बख्शने वाला है और (हम मे) गुनाहो से बचने और नेकी करने कि ताक़त नहीं अल्लाह के बगैर जो के बोहोत बुलंद वाला है.*_
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                     _*रमज़ान मे मौत*_
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_*रमज़ान मे मरने वाले से कोई भी सवाल जवाब नहीं होता है*_

_*जिसका खात्मा इमान पर हुआ उससे क़ब्र पे सवाल जवाब और आज़ाब कभी नहीं होता*_

_*📕 क़ानून ए शरिअत, पेज नं. 29*_
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Al Waziftul Karima 👇🏻👇🏻👇🏻 https://drive.google.com/file/d/1NeA-5FJcBIAjXdTqQB143zIWBbiNDy_e/view?usp=drivesdk 100 Waliye ke wazai...