Friday, September 28, 2018



             _*हज़रत शीश अलैहिस्सलाम*_
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*_हज़रत शीश अलैहिस्सलाम के बारे में ज़्यादा कुछ किताबों में नहीं लिखा है मगर जितना मेरी नज़र में आया दर्ज करता हूं_*

*_हज़रते हव्वा रज़ियल्लाहु तआला अन्हा 40 मर्तबा हामिला हुईं, 39 बार 2 बच्चे साथ में पैदा हुए एक लड़का और एक लड़की, और चालीसवीं बार में हज़रत शीश अलैहिस्सलाम अकेले पैदा हुए_*

_*📕 तज़किरातुल अम्बिया, सफह 56*_

*_आपका लक़ब हिब्तुल्लाह है वो युं कि आपको अल्लाह ने हज़रते हाबील के बदले में हज़रत आदम अलैहिस्सलाम को अता फरमाया था_*

_*📕 तफसीरे सावी, जिल्द 1, सफह 242*_

*_आपके निकाह का खुतबा हज़रत जिब्रील अलैहिस्सलाम ने पढ़ाया, आपकी उम्र 912 साल हुई और आपकी मज़ार के बारे में इख्तिलाफ है बाज़ जबले अबी क़ुबैस में बताते हैं_*

_*📕 ज़रकानी, जिल्द 1, सफह 65*_

*_और बाज़ लोग हिंदुस्तान के शहर आयोध्या में जो कि शहर फैज़ाबाद के करीब है वहां बताते हैं_*

_*📕 तफसीरे नईमी, जिल्द 3, सफह 664*_

            _*हज़रत इदरीस अलैहिस्सलाम*_

*_आपका नाम अख्नूख है कसरते दर्स की वजह से आपको इदरीस का लक़ब मिला_*

_*📕 तफसीरे सावी, जिल्द 3, सफह 32*_

*_आपका नस्ब नामा यूं है अख्नूख बिन यूरिद बिन महलाबील बिन अनूश बिन क़ैतान बिन शीश बिन आदम_*

_*📕 अलइतक़ान, जिल्द 2, सफह 175*_

*_आप हज़रत आदम अलैहिस्सलाम की ज़िन्दगी में पैदा हो चुके थे, आपको हज़रत आदम अलैहिस्सलाम का 100 साल का ज़माना मिला मगर नबी होने का ऐलान आपने हज़रत आदम अलैहिस्सलाम के विसाल के 200 साल बाद किया_*

_*📕 तफसीरे सावी, जिल्द 3, सफह 73*_

*_आपने 65 साल की उम्र में बरुखा नामी औरत से निकाह किया जिससे आपको मतुशल्ख नाम का एक फरज़न्द हुआ_*

_*📕 माअरेजुन नुबूवत, जिल्द 1, सफह 67*_

*_सबसे पहले सितारों के ज़रिये हिसाब करना, कलम से लिखना, सिला हुआ कपड़ा पहनना, चीज़ों का वज़न और कपड़ों की पैमाईश करना, और असलहों की ईजाद आपने ही की_*

_*📕 तज़किरातुल अम्बिया, सफह 63*_

*_आप पर 30 सहीफे नाज़िल हुए_*

_*📕 तफसीरे खज़ाएनुल इर्फान, सफह 369*_

*_आप ज़िंदा हैं मगर कहां हैं इसमें इख्तिलाफ है, बुखारी शरीफ की रिवायत के मुताबिक आप चौथे आसमान पर हैं और कअब अहबार की रिवायत के मुताबिक आप जन्नत में हैं, वाकया कुछ यूं है कि एक रोज़ आप खेतों में काम कर रहे थे सूरज की तपिश से आपकी पीठ मुबारक जल गई, आपने सोचा कि जब ये सूरज ज़मीन से 2000 साल की दूरी पर है तो हमारा ये हाल है तो जो फरिश्ता सूरज को चलाने पर मामूर होगा उसका क्या हाल होगा, ये सोचकर आपने रब की बारगाह में दुआ की कि ऐ मौला उस फरिश्ते पर जो कि सूरज पर मामूर है उसवपर रहम फरमा नबी की दुआ थी सो फौरन क़ुबूल हुई और फरिश्ते को आराम मिला, तो उसने रब की बारगाह में अर्ज़ किया कि ऐ मौला मुझपर ये नरमी किस लिए तो मौला फरमाता है कि मेरे बन्दे इदरीस ने तेरे लिए दुआ की है जिसका तुझे फायदा मिला है,तो फरिश्ता अर्ज़ करता है कि ऐ मौला मुझे अपने बन्दे का शुक्रिया अदा करने का मौक़ा दे, तो मौला ने उसको इजाज़त दे दी, वो हज़रत इदरीस अलैहिस्सलाम की बारगाह में हाज़िर होकर उनका शुक्रगुज़ार हुआ और आपसे कहा की अगर आपको मेरी कोई भी ज़रूरत हो तो बताएं मैं आपकी पूरी मदद करूंगा, तब हज़रत इदरीस अलैहिस्सलाम ने जन्नत को देखने की तम्मन्ना ज़ाहिर की तो वो कहने लगा कि मैं खुद तो इसमें आपकी कोई मदद नहीं कर सकता मगर मेरी पहचान इस्राईल से है मैं आपको उनके पास ले चलता हूं वो आपकी ज़रूर मदद करेंगे, तब आप हज़रते मलकुल मौत के पास हाज़िर हुए और पूरा वाक़िया कह सुनाया तो हज़रत इस्राईल अलैहिस्सलाम कहते हैं कि बग़ैर मरे हुए तो कोई जन्नत में नहीं जा सकता हां मैं ये कर सकता हूं कि आपकी रूह क़ब्ज़ करके फौरन आपके जिस्म में डाल दूं तो ये मुमकिन है, तो हज़रत इदरीस अलैहिस्सलाम फरमाते हैं कि ठीक है ऐसा ही करो तो उन्होंने रूह क़ब्ज़ करके फौरन जिस्म में डाल दी फिर उन्हें जहन्नम के ऊपर बने हुए पुल यानि पुल-सिरात से गुज़ारकर जन्नत में पहुंचा दिया और खुद बाहर रुक गए कि आप जन्नत की सैर करके वापस तशरीफ ले आयें, जब बहुत देर हो गई तो हज़रत इस्राईल अलैहिस्सलाम ने आपको आवाज़ दी कि हज़रत अब चला जाए तो हज़रत इदरीस अलैहिस्सलाम फरमाते हैं कि कहां चला जाये रब फरमाता है कि हर बन्दे को मौत का मज़ा चखना है सो मैं चख चुका फिर फरमाता है कि हर बन्दे को पुल-सिरात से गुज़रना होगा सो मैं वहां से भी गुज़र चुका फिर फरमाता है कि जो एक बार जन्नत में दाखिल हो गया वो कभी भी उससे बाहर नहीं निकाला जायेगा तो अब मैं यहां आ चुका और यहां से कहीं नहीं जाऊंगा, जब हज़रत इदरीस अलैहिस्सलाम ने हज़रत इस्राईल अलैहिस्सलाम को ये दलील दी तो मौला ने फरमाया कि ऐ इस्राईल मेरे बन्दे ने सच कहा और जो कुछ किया वो मेरे इज़्न से ही किया सो उसे वहीं रहने दो_*

_*📕 तज़किरातुल अम्बिया, सफह 64*_

*_ये वाक़िया दोशम्बे के दिन पेश आया_*

_*📕 नुज़हतुल मजालिस 4, सफह 47*_

*_किस उम्र में ये वाक़िया पेश आया इसमें कई क़ौल हैं बाज़ ने 350 साल कहा और बाज़ ने 400 साल और बाज़ ने 450 साल की उम्र बताई_*

_*📕 अलइतकान, जिल्द 2, सफह 175*_
_*📕 जलालैन, हाशिया 9, सफह 276*_
_*📕 तफसीरे सावी, जिल्द 3, सफह 73*_
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                     _*वली की पहचान*_
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*_हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम इरशाद फरमाते हैं कि क़यामत के दिन अल्लाह के कुछ बन्दे ऐसे होंगे जो ना नबी होंगे और ना शुहदा मगर उनके मक़ाम और बुलंदी को देखकर बाज़ अम्बिया और शुहदा भी रश्क करेंगे_*

_*📕 अबू दाऊद, जिल्द 3, सफह 288*_

*_अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त क़ुरान मुक़द्दस में इरशाद फरमाता है कि_*

*_बेशक अल्लाह के वली मुत्तक़ी ही होते हैं_*

_*📕 पारा 9, सूरह इंफाल, आयत 34*_

*_और तक़वा परहेज़गारी खशीयत बग़ैर इल्म के नामुमकिन है जैसा कि मौला क़ुरान में इरशाद फरमाता है कि_*

*_अल्लाह से उसके बन्दों में वही डरते हैं जो इल्म वाले हैं_*

_*📕 पारा 22, सूरह फातिर, आयत 28*_

*_हुज़ूर ग़ौसे पाक रज़ियल्लाहु तआला अन्हु फरमाते हैं कि तसव्वुफ़ सिर्फ गुफ्तुगू नहीं बल्कि अमल है और फरमाते हैं कि जिस हक़ीक़त की गवाही शरीयत ना दे वो गुमराही है_*

_*📕 फुतुहूल ग़ैब, सफह 82*_

*_हज़रत मुजद्दिद उल्फ सानी रज़ियल्लाहु तआला अन्हु फरमाते हैं कि जो शरीयत के खिलाफ हो वो मरदूद है_*

_*📕 मकतूबाते इमाम रब्बानी, हि 1, मकतूब 36*_

*_हज़रत शहाब उद्दीन सहरवर्दी रज़ियल्लाहु तआला अन्हु फरमाते हैं कि जिसको शरीयत रद्द फरमाये वो हक़ीक़त नहीं बेदीनी है_*

_*📕 अवारेफुल मआरिफ, जिल्द 1, सफह 43*_

*_हज़रत इमाम गज़ाली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु फरमाते हैं कि जिस हक़ीक़त को शरीयत बातिल बताये वो हक़ीक़त नहीं बल्कि कुफ्र है_*

_*📕 तजल्लियाते शेख मुस्तफा रज़ा, सफह 149*_

*_हज़रत बायज़ीद बुस्तामी रज़ियल्लाहु तआला अन्हु फरमाते हैं कि अगर तुम किसी को देखो कि वो हवा में उड़ता है पानी पर चलता है ग़ैब की खबरें बताता है मगर शरीयत की इत्तेबा नहीं करता तो समझलो कि वो मुल्हिद व गुमराह है_*

_*📕 सबा सनाबिल शरीफ, सफह 186*_

*_एक शख्स हज़रत जुनैद बग़दादी रज़ियल्लाहु तआला अन्हु से ये सोचकर मुरीद होने के लिए आया कि हज़रत से कोई करामात देखूंगा तो मुरीद हो जाऊंगा, वो आया और आकर आस्ताने में रहने लगा इस तरह पूरे 10 साल गुज़र गए और 10 सालों के बाद वो नामुराद होकर वापस जाने लगा, हज़रत ने उसे बुलवाया और कहा कि तुम 10 साल पहले आये यहां रहे और अब बिना बताए जा रहे हो क्यों, तो कहने लगा कि मैंने आपकी बड़ी तारीफ सुनी थी कि आप बा करामत बुज़ुर्ग हैं इसलिए आया था कि आपसे कोई करामात देखूंगा तो आपका मुरीद हो जाऊंगा मगर पिछले 10 सालों में मैंने आपसे एक भी करामात सादिर होते हुए नहीं देखी इसलिए जा रहा हूं, हज़रत जुनैद बग़दादी रज़ियल्लाहु तआला अन्हु फरमाते हैं कि ऐ जाने वाले तूने पिछले 10 सालों में मेरा खाना पीना, सोना जागना, उठना बैठना सब कुछ देखा मगर क्या कभी ऐसा कोई खिलाफे शरह काम भी होते देखा, इसपर वो कहने लगा कि नहीं मैंने आपसे कभी कोई खिलाफे शरह काम होते नहीं देखा, तो आप फरमाते हैं कि ऐ शख़्स क्या इससे बड़ी भी कोई करामात हो सकती है कि 10 सालों के तवील अरसे में एक इंसान से कोई खिलाफे शरह काम ही ना हो_*

_*📕 तारीखुल औलिया, जिल्द 1, सफह 67*_

*_हुज़ूर ग़ौसे पाक रज़ियल्लाहु तआला अन्हु फरमाते हैं कि मैं एक जंगल में था भूख और प्यास का सख्त गल्बा था, अचानक मेरे सामने एक रौशनी छा गयी और एक आवाज़ आई कि ऐ अब्दुल कादिर मैं तेरा रब हूं और तुझसे बहुत खुश हूं इसलिए आजसे मैंने तुमपर हर हराम चीज़ें हलाल फरमा दी और तुम पर से नमाज़ भी माफ फरमा दी, ये सुनते ही मैंने लाहौल शरीफ पढ़ा तो फौरन वो रौशनी गायब हो गयी और एक धुवां सा रह गया फिर आवाज़ आई कि ऐ अब्दुल कादिर मैं शैतान हूं तुझसे पहले इसी जगह पर मैंने 70 औलिया इकराम को गुमराह किया है मगर तुझे तेरे इल्म ने बचा लिया, इसपर हुज़ूर ग़ौसे पाक रज़ियल्लाहु तआला अन्हु फरमाते हैं कि ऐ मरदूद मुझे मेरे इल्म ने नहीं बल्कि रब के फज़्ल ने बचाया है, ये सुनते ही इब्लीस फरार हो गया_*

_*📕 बेहिज्जतुल असरार, सफह 120*_

_*इन सब बातों का निचोड़ ये है कि*_

*_अगर हवा में उड़ना विलायत होती तो इब्लीस लईन सबसे बड़ा वली होता कि सातवीं ज़मीन के भी नीचे तहतुस्सरा में ठहरता है मगर जैसे ही नाम लिया पास आकर बैठ जाता है कि 3500 साल से भी ज़्यादा का सफर वो पल भर में तय कर लेता है, मगर वो वली नहीं_*

*_अगर पानी पे चलना विलायत होती तो काफिर भी अपने जादू से पानी पर चला करते हैं, मगर वो वली नहीं_*

*_अगर ग़ैब की खबर देना विलायत होती तो कभी कभार नुजूमी यानि स्ट्रोलोजर भी सही भविष्यवाणी कर दिया करते हैं, मगर वो वली नहीं_*

 *_नमाज़ छोड़ने वाला, दाढ़ी मुंडाने वाला, फोटो खींचने खिंचाने वाला, म्यूजिक सुनने वाला,ना महरम औरतों की सोहबत में बैठने वाला, झूठ बोलने वाला फासिक़ है हरगिज़ वली नहीं_*

*_अलहासिल जो इल्म वाला होगा वही तक़वे वाला होगा और जो तक़वे वाला होगा वही अल्लाह का वली होगा लिहाज़ा वली को उसके तक़वे से पहचाने करामात से नहीं, अगर कोई मुझसे मेरे पीरो मुर्शिद हुज़ूर ताजुश्शरिया दामत बरकातोहुमुल आलिया के बारे में पूछता है तो यक़ीन जानिये मैं सिर्फ इतना कहता हूं कि मेरी बातों पर भरोसा मत करो तुम खुद जाकर एक बार अपनी आंखों से उनका दीदार कर आओ खुद बखुद समझ जाओगे कि वली कैसा होता है और करामत क्या होती है_*
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                        _*मुताफर्रिकात*_
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*_1⃣  साइंस्दां कहते हैं कि पृथ्वी यानि ज़मीन घूमती है जबकि ऐसा नहीं है ज़मीन बिल्कुल साकिन यानि ठहरी हुई है और घूमने का काम ये सूरज चांद सितारे करते हैं_*

_*📕 फतावा रज़वियह, जिल्द 9, सफह 177*_

*_2⃣  फासिक़ अगर सलाम करे या मुसाफा करना चाहे तो कर सकता है मगर पहल ना करें_*

_*📕 अलमलफूज़, हिस्सा 3, सफह 72*_

*_3⃣  हज़रत अब्दुल्लाह बिन सलाम रज़ियल्लाहु तआला अन्हु ने हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम से नमाज़ में क़ुरान के साथ कुछ आयतें तौरैत शरीफ से पढ़ने की इजाज़त मांगी जिसपर अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त क़ुरान में इरशाद फरमाता है कि "ऐ ईमान वालो अगर मुसलमान हुए हो तो पूरे पूरे इस्लाम में दाख़िल हो जाओ और शैतान की पैरवी ना करो कि वो तुम्हारा खुला दुश्मन है" सोचिये कि जब एक आसमानी और हक़ किताब पढ़ने की हमें इजाज़त नहीं दी गयी तो जो मुसलमान काफिरों की मुशाबहत करते हैं उनके त्यौहार मनाते हैं या मनाने जाते हैं उसकी मुबारकबाद देते हैं वो किस क़दर ज़ुल्म करते हैं_*

_*📕 अलमलफूज़, हिस्सा 4, सफह 22*_

*_4⃣  वहाबी ना तो मुसलमान है और ना ही उसकी मस्जिद मस्जिद है और ना उसकी नमाज़ नमाज़, जब उनकी नमाज़ बातिल है तो अज़ान भी बातिल हां मगर अल्लाह और उसके हबीब का नाम सुने अगर चे किसी काफिर के भी मुंह से तो ताज़ीमन जल्ला शानहू और सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम कहे_*

_*📕 अलमलफूज़, हिस्सा 1, सफह 95*_

*_5⃣  तफ़ज़ीली वो फिरका है जो कि मौला अली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु को हज़रते अबू बकर रज़ियल्लाहु तआला अन्हु व हज़रते उमर रज़ियल्लाहु तआला अन्हु से अफज़ल जानता है, बाकी तमाम बातों में अहले सुन्नत वल जमात के साथ है, बिला शुबह ऐसा अक़ीदा रखने वाला भी गुमराह व बिदअती है_*

_*📕 फतावा अज़ीज़िया, जिल्द 1, सफह 183*_

*_6⃣  नमाज़ी के सामने से एक तरफ से आते हुए दूसरी तरफ निकल जाना ये बहुत बड़ा गुनाह है लेकिन अगर कोई ऐन नमाज़ी के सामने नमाज़ पढ़ रहा था और उसकी नमाज़ खत्म हो गई तो वो दाएं बाएं जिधर से चाहे निकलकर जा सकता है इसको हटना कहेंगे नमाज़ काटना नहीं_*

_*📕 बहारे शरीयत, हिस्सा 3, सफह 156*_

*_7⃣  ताक, मेहराब या दरख्तों में किसी बुज़ुर्ग या वली का क़याम बताना सरासर जिहालत है, वहां अगरबत्ती मोमबत्ती जलाना या फूल वगैरह डालना फिज़ूल है_*

_*📕 अहकामे शरीयत, हिस्सा 1, सफह 32*_

*_8⃣  आजकल कुछ पीर ऐसे भी सुनने में आ रहे हैं जो कि माज़ अल्लाह मुसलमान किये बग़ैर मुरीद कर लेते हैं, जबकि आलाहज़रत अज़ीमुल बरक़त रज़ियल्लाहु तआला अन्हु फरमाते हैं कि "कोई काफिर ख्वाह मुशरिक हो या मोहिद हरगिज़ दाखिले सिलसिला नहीं हो सकता जबतक कि इस्लाम ना क़ुबूल करे" ऐसे पीर पीर नहीं बल्कि शैतान के चेले हैं लिहाज़ा ऐसो से दूर रहने में ही ईमान की आफियत है_*

_*📕 फतावा रज़वियह, जिल्द 6, सफह 157*_

*_9⃣  बाज़ लोग नमाज़े जनाज़ा में तकबीर के वक़्त अपना मुंह आसमान की तरफ उठाते हैं ऐसा करना सख्त मना है_*

_*📕 गलत फहमियां और उनकी इस्लाह, सफह 54*_

*_🔟 जुमे की रात और दिन में और रमज़ान शरीफ में किसी पर भी अज़ाब नहीं होता, हां मुसलमान हमेशा के लिए महफूज़ हो जाता है मगर काफिर पर इसके बाद अज़ाब लौट आता है_*

_*📕 शराहुस्सुदूर, सफह 76*_
_*📕 अलअश्बाह वन्नज़ायेर, सफह 564*_
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             *_मीलाद शरीफ़ और क़ुर्आन_*
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*_हुज़ूर की ज़ात व औसाफ़ व उनके हाल व अक़वाल के बयान को ही मिलादे पाक कहा जाता है, हुज़ूर की विलादत की ख़ुशी मनाना ये सिर्फ इंसान का ही ख़ास्सा नहीं है बल्कि तमाम खलक़त उनकी विलादत की खुशी मनाती है बल्कि खुद रब्बे क़ायनात मेरे मुस्तफा जाने रहमत का मीलाद पढता है, यहां क़ुरान की सिर्फ चंद आयतें पेश करता हूं वरना तो पूरा क़ुरान ही मेरे आका की शान से भरा हुआ है मगर कुछ आंख के अंधे और अक़्ल से कोढ़ी लोग इसको भी शिर्क और बिदअत कहते हैं, माज़ अल्लाह, हवाला मुलाहज़ा फरमाएं_*

*_1. वही है जिसने अपना रसूल हिदायत और सच्चे दीन के साथ भेजा_*

_*📕 पारा 10, सूरह तौबा, आयत 33*_

*_2. बेशक तुम्हारे पास तशरीफ़ लायें तुममे से वो रसूल जिन पर तुम्हारा मशक़्क़त में पड़ना गिरां है तुम्हारी भलाई के निहायत चाहने वाले मुसलमानों पर कमाल मेहरबान_*

_*📕 पारा 11, सूरह तौबा, आयत 128*_

*_पहली आयत में मौला तआला उन्हें भेजने का ज़िक्र कर रहा है और भेजा उसे जाता है जो पहले से मौजूद हो मतलब साफ़ है कि महबूब पहले से ही आसमान पर या अर्शे आज़म पर या जहां भी रब ने उन्हें रखा वो वहां मौजूद थे, और दूसरी आयत में उनके तशरीफ़ लाने का और उनके औसाफ़ का भी बयान फरमा रहा है, क्या ये उसके महबूब का मिलाद नहीं है, क्या वहाबी खुदा पर भी हुक्म लगायेगा_*

*_3. बेशक तुम्हारे पास अल्लाह की तरफ़ से एक नूर आया और रौशन किताब_*

_*📕 पारा 6, सूरह मायदा, आयत 15*_

*_यहां नूर से मुराद हुज़ूर हैं और किताब से मुराद क़ुराने मुक़द्दस है_*

*_4. और याद करो जब ईसा बिन मरियम ने कहा ................. और उन रसूल की बशारत सुनाता हूं जो मेरे बाद तशरीफ़ लायेंगे उनका नाम "अहमद" है_*

_*📕 पारा 28, सूरह सफ़, आयत 6*_

*_इस आयत में हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम मेरे आक़ा का मीलाद पढ़ रहे हैं, क्या वहाबी उन पर भी हुक्म लगायेगा_*

*_5. और याद करो जब अल्लाह ने पैगम्बरों से अहद लिया, जो मैं तुमको किताब और हिकमत दूं फिर तशरीफ़ लायें तुम्हारे पास वो रसूल कि तुम्हारी किताब की तस्दीक़ फरमाएं तो तुम ज़रूर ज़रूर उनपर ईमान लाना और उनकी मदद करना, क्या तुमने इक़रार किया और उसपर मेरा भारी ज़िम्मा लिया, सबने अर्ज़ की हमने इक़रार किया फ़रमाया तो एक दूसरे पर गवाह हो जाओ और मैं खुद तुम्हारे साथ गवाहों में हूं, तो जो कोई इसके बाद फिरे तो वही लोग फ़ासिक़ हैं_*

_*📕 पारा 3, सूरह आले इमरान, आयत 81-82*_

*_ये आलमे अरवाह का वाकिया है जहां मौला ने अपने महबूब की शान बयान करने के लिए अपने तमाम नबियों को इकठ्ठा कर लिया यानि महफिले मिलाद सजा ली और उनसे फरमा रहा है कि अगर तुम्हारे पास मेरे नबी तशरीफ़ लायें तो तुम्हे सब कुछ छोड़कर उसकी इत्तेबा करनी होगी, और आखिर के जुम्ले क्या ही क़यामत ख़ेज़ हैं क्या फरमा रहा है कि " जो इस अहद को तोड़े तो वो फ़ासिक़ है " अल्लाह अल्लाह ये कौन कह रहा है हमारा और आपका रब कह रहा है, किससे कह रहा है अपने मासूम नबियों से कह रहा है, क्यों कह रहा है क्योंकि बात उसके महबूब की है इसलिए कह रहा है_*

*_आज हम उसके महबूब का ज़िक्र करें तो हम मुश्रिक_*
*_महफिले मिलाद सजाएं तो हम मुश्रिक_*
*_भीड़ इकठ्ठा कर लें तो हम मुश्रिक_*
*_और रब जो कर रहा है उसका क्या, उस पर क्या हुक्म लगेगा वहाबियों_*

*_6. और उन्हें अल्लाह के दिन की याद दिला_*

_*📕 पारा 13, सूरह इब्राहीम, आयत 5*_

*_अल्लाह के दिन से मुराद वो दिन हैं जिन में मौला तआला ने अपने बन्दों पर नेमतें नाज़िल फरमाई जैसा कि बनी इस्राईल पर मन व सल्वा नाज़िल फरमाना और उनको दरिया से पार कराना, जैसा कि खुद हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम का क़ौल क़ुरान में मौजूद है मौला फरमाता है कि_*

*_7. ईसा बिन मरियम ने अर्ज़ की ऐ अल्लाह ऐ हमारे रब हम पर आसमान से एक ख्वान उतार कि वो हमारे लिए ईद हो_*

_*📕 पारा 7, सूरह मायदा, आयत 114*_

*_मुफ़स्सेरीन फरमाते हैं कि जिस दिन आसमान से ख्वान नाज़िल हुआ वो दिन इतवार का था और आज भी ईसाई उस दिन खुशी यानि छुट्टी मनाते हैं, सोचिये कि हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ख्वान के नाज़िल होने पर तो ईद का हुक्म नाज़िल फरमा रहे हैं तो क्या माज़ अल्लाह हमारे नबी की विलादत एक खाने से भरे तश्त से भी कम है कि हम उस पर खुशी नहीं मना सकते, यक़ीनन मेरे आक़ा दुनियाए जहान की सारी नेमतों से बढ़कर हैं ये मैं नहीं कह रहा बल्कि खुद रब्बे क़ायनात फरमा रहा है, पढ़िए_*

*_8. बेशक अल्लाह का बड़ा एहसान हुआ मुसलमानो पर कि उनमे उन्हीं में से एक रसूल भेजा जो उनपर उसकी आयतें पढ़ते हैं और उन्हें पाक करते हैं और उन्हें किताब और हिक़मत सिखाते है_*

_*📕 पारा 4, सूरह आले इमरान, आयत 164*_

*_मौला ने इंसान को कैसी कैसी नेमतें अता फरमाई है, उसकी आंख कान नाक मुंह ज़बान दिल जिगर उसके हाथ पैर उसकी सांसें, मैंने शायद किसी मैगज़ीन में पढ़ा था किसी मेडिकल रिसर्चर का बयान है कि एक इंसान के जितने भी आज़ा है वैसे तो उनकी कोई कीमत नहीं सब अनमोल है मगर फिर भी मेडिकल साइंस एक इंसान को तक़रीबन 300 करोड़ rs. की मिल्क समझती है,सुबहान अल्लाह, हर इंसान 300 करोड़ rs. का फिर उस पर जो रब ने नेमतें दी उस के मां-बाप भाई-बहन दोस्त-अहबाब नाते रिश्तेदार वो अलग फिर उसपर ये कि उसे ज़िन्दगी गुज़ारने के लिए कितने ही साज़ो सामान से नवाज़ा, मगर कसम उस रब्बे क़ायनात की पूरा क़ुरान उठाकर देख लीजिए कि क्या कहीं उसने अपनी किसी नेमत पर एहसान जताया हो अगर जताया है तो अपने महबूब को जब बन्दों के दरमियान भेजा तब जताया है, अब बताइए क्या जिस नेमत को देने पर वो खुद फरमा रहा है कि "मैंने एहसान किया बन्दों पर" ज़रा सोचिये कि कैसी ही अज़ीम नेमत है मेरे मुस्तफ़ा की विलादत, ख्वान के आसमान से आने पर तो ईद मनायी गयी तो फिर मुस्तफा जाने रहमत के आने पर ईद मनाना शिर्क कैसे हो गया, जबकि मौला खुद अपनी दी हुई नेमतों का चर्चा करने का हुक्म दे रहा है, फरमाता है_*

*_8. और अपने रब की नेमत का खूब चर्चा करो_*

_*📕 पारा 30, सूरह वद्दोहा, आयत 11*_

*_क्या महबूबे दो आलम से बढ़कर भी कोई नेमत हो सकती है,नहीं नहीं नहीं और हरगिज़ नहीं,तो हम सुन्नी रब की दी हुई उसी अज़ीम नेमत का चर्चा करते हैं तो हम मुश्रिक कैसे हो गए बल्कि हक़ तो ये है कि जो उसकी दी हुई नेमत का चर्चा नहीं करते वो एहसान फरामोश गद्दार हैं जहन्नम के हक़दार हैं_*
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                   *_ज़िना का बयान - 01_*
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*_🔘यक़ीनन ज़िना गुनाहे अजीम (बडा) और  बहुत बड़ी बला है! यह इन्सान की दुनिया और आखिरत को तबाह व बर्बाद कर देता है!_* 

*_वह नौजवान जो काफीरों   (नास्तीको) की लड़कियों से  नाज़ाइज़ ताल्लुक़ात रखते है! (और यह समझते है के यह कोई गुनाह नही इसलिये के वह काफीरा (नास्तीक) है!) यह सख़्त जेहालत है! काफीरा (नास्तीक) लड़की से मुबाशरत (सोहबत) भी ज़िना ही कहलाएगी!_*

*_इसी तरह  काफीर, (नास्तीक)मजुसी, बुत परस्त, सितारा परस्त,  उन  से  निकाह किया तो निकाह ही नही होंगा बल्की वह भी महज जिना मे ही शुमार होंगा!_*

*_इसी तरह   जितने भी दीन से फिरे हुए बदमजहब  बातील फिर्के है!  उन  से  निकाह किया तो निकाह ही नही होंगा बल्की वह भी महज जिना ही कहलाएंगा जब तक की वह अकाइद ए बातीला से सच्ची तौबा न करे!_*

_*हदीस : अल्लाह के रसूल ﷺ ने इर्शाद फर्माया..*_

*_"शिर्क के बाद अल्लाह के नज़्दीक इस गुनाह से बड़ा कोई गुनाह नही की, एक शख्स किसी ऐसी औरत से सोहबत करे जो उस की बीवी नही!_*

_*और फर्माते है हमारे प्यारे आका हुजुर ﷺ*_

*_"जब कोई मर्द और औरत ज़िना करते है तो ईमान उन के सीने से निकल कर सर पर साए की तरह ठहर जाता है"।_*

*_📕मुका़शीफतुल क़ुलूब, बाब नं 22, सफा नं 168_*

_*हदीस : हज़रत इकरमा ने हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास [रदि अल्लाहु तआला अन्हुमा]से पूछा..*_

_*"ईमान किस तरह निकल जाता है"..? हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास ने अपने एक हाथ की उंगलियॉ दुसरे हाथ की उंगलियो मे डाली और फिर निकाल ली और फर्माया "इस तरह !"*_

*_📕बुखारी शरीफ,  जिल्द नं 3, बाब नं 968, हदीस नं 1713, सफा नं 614, अशअ़तुल लम्आत, जिल्द नं 1, सफा नं 287_*

_*हदीस : हज़रत अबूह़ुरैरा व इब्ने अब्बास [रदि अल्लाहु तआला अन्हुमा] से रिवायत है कि ताजदार ए मदिना ﷺ ने इर्शाद फर्माया..*_

*_"मोमिन होते हुए तो कोई ज़िना कर ही नही सकता"!_*

*_📕 बुखारी शरीफ, जिल्द नं 3, बाब नं 968, हदीस नं 1714, सफा नं 614_*

_*हज़रत इमाम ग़ज़ाली [रदि अल्लाहु तआला अन्हु] रिवायत करते है..*_

*_" जिसने किसी गैर शादी-शुदा औरत का बोसा लिया, उसने गोया सत्तर कुवांरी लडकियों से जिना किया! और जिसने कुवांरी लडकी से जिना किया, तो गोया उसने सत्तर हजार शादी-शुदा औरतों से जिना किया!"_*

 *_📕 मुका़शीफतुल क़ुलूब, बाब नं 22, सफा नं 169_*

 _*हज़रत इमाम ग़ज़ाली और हजरत इमाम अबुल्लैस समरकंदी  [रदि अल्लाहु तआला अन्हुमा] नकल करते है की..*_

_*"बाज सहाब-ए-किराम, से मरवी है कि ज़िना से बचो  इस में  ("छह" 6) मुसीबतें है जिन मे से तीन का तअ़ल्लुक़ दुनिया से और तीन का आख़िरत से है। दुनिया की मुसीबतें यह है..*_

1⃣ *_ज़िन्दगी मुख़्तसर (कम) हो जाती है।_*

2⃣ *_दुनिया में रिज़्क़ कम हो जाता है।_*

 3⃣ *_चेहरे से रौनक (नुरानियत) ख़त्म हो जाती है।_*

*_📌और आख़िरत की मुसीबतें येह है कि..!_*

4⃣ *_आख़िरत में खुदा की नाराज़गी_*

 5⃣ *_आख़िरत में सख़्त पूछ ताछ होगी।_*

 6⃣ *_ज़हन्नम में जाएगा और सख़्त अज़ाब़ पाएंगा!_*

*_📕 तंबीहुल गाफेलीन सफ 381, मुका़शीफतुल क़ुलूब, बाब नं 22, सफा नं 168_*

_*रिवायत : हजरत मुसा अलैहिस्सलाम ने अल्लाह अज्जा व जल्ल से जिना करने वाले की सजा के बारे मे पुछा, तो रब तबारक व तआला ने इर्शाद फर्माया.*_

*_"ऐ मुसा! जिना करने वाले को मै आग की जिरह (आग का लिबास) पहनाऊंगा! जो ऐसा वजनी है की अगर बहुत बडे पहाड पर रख दिया जाएंगा तो वह (पहाड) भी रेजा-रेजा हो जाए"_*

*_📕 मुका़शीफतुल क़ुलूब, बाब नं 22, सफा नं 168_*

_*📮जारी रहेगा.....!*_
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                   *_ज़िना का बयान - 02_*
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*_अल्लाह तबारक तआला इर्शाद फ़र्माता है!.._*

*وَ الَّذِیۡنَ لَا یَدۡعُوۡنَ مَعَ اللّٰہِ  اِلٰـہًا اٰخَرَ  وَ لَا یَقۡتُلُوۡنَ النَّفۡسَ الَّتِیۡ حَرَّمَ اللّٰہُ  اِلَّا بِالۡحَقِّ وَ لَا یَزۡنُوۡنَ ۚ وَ مَنۡ یَّفۡعَلۡ  ذٰلِکَ  یَلۡقَ  اَثَامًا ﴿ۙ۶۸﴾*

*_तर्जुमा : और वह लोग अल्लाह के साथ किसी दुसरे माबूद को नही पुजते, और इस जान को जिसकी अल्लाह ने हुरमत रखी नाहक नही मारते, और बदकारी नही करते, और जो यह काम करे वह सजा पाएंगा..! (यानी ज़िना करने वाले असाम में डाले जाएंगे..!)_*

*_📕 तर्जुमा :  क़ुरआन कंजुल इमान सूर ए फ़ुरक़ान, आयत नं 68_*

*_असाम के बारे में उलमा-ए-किराम ने कहा कि वह ज़हन्नम का एक ग़ार है, जब उस का मुँह खोला जाएगा तो उस की बदबू से तमाम ज़हन्नमी चीख उठेंगे ।_*

*_📕मुका़शफतुल क़ुलूब, बाब नं 22, सफा नं 167_*

*_हदीस : अल्लाह के रसुल ﷺ इर्शाद फरमाते है.._*

*_"सातों आसमान और सातों जमीन और पहाड़ (उम्र दराज) ज़िनाकार पर लानत भेजते है और क़ियामत के दिन ज़िनाकार मर्द व औरत की शर्मगाह से इस कद्र बदबू आती होगी के ज़हन्नम मे जलने वालों को भी उस (बदबु) से तकलीफ़ पहुँचेगी।_*

*_📕 बहारे शरीअ़त, जिल्द नं 1,  हिस्सा 9, सफा 43_*

_*यह तमाम सज़ाए तो आख़िरत मे मिलेगी लेकिन ज़िना करने वाले पर शरीअ़त ने दुनिया में भी सज़ा मुक़र्रर की है। इस्लामी हुकूमत हो तो बादशाहे वक्त़ या फिर क़ाज़ी शरअ पर ज़रूरी है कि जानी  (ज़िना करने वाले ) पर जुर्म साबित हो जाने पर शरीअ़त के हुक़्म के तहत सजा दे! हदीसे पाक में है कि अगर किसी को  दुनिया में सज़ा न मिल सकी (सजा से बच गया) तो आख़िरत मे उस को सख़्त अज़ाब़ दिया जाएगा, और अगर दुनिया में सज़ा मिल गई तो फिर अल्लाह चाहे तो उसे मुआ़फ फरमा दे।*_

_*दुनिया में सज़ा : अल्लाह और उसके रसूल ﷺ ने ज़िनाकार  मर्द और औरत को सज़ा का हुक़्म दिया और उस पर रसुलुल्लाह ﷺ ने अमल भी करवाया। चुनांचे कुरआन ए पाक मे*_

*_अल्लाह तबारक तआला इर्शाद फ़र्माता है!.._*

*اَلزَّانِیَۃُ وَ الزَّانِیۡ فَاجۡلِدُوۡا کُلَّ وَاحِدٍ مِّنۡہُمَا مِائَۃَ جَلۡدَۃٍ ۪ وَّ لَا  تَاۡخُذۡکُمۡ بِہِمَا رَاۡفَۃٌ  فِیۡ  دِیۡنِ اللّٰہِ  اِنۡ کُنۡتُمۡ تُؤۡمِنُوۡنَ بِاللّٰہِ وَ الۡیَوۡمِ الۡاٰخِرِ ۚ وَ لۡیَشۡہَدۡ عَذَابَہُمَا طَآئِفَۃٌ مِّنَ الۡمُؤۡمِنِیۡنَ ﴿۲﴾*
             
*_तर्जुमा : जो औरत बदकार हो, और जो मर्द तो, इन मे हर एक को सौ (100) कोडे लगाओ, और तुम्हे उन पर तरस न आए! अल्लाह के दीन मे अगर तुम ईमान लाते हो, अल्लाह और पिछले दीन पर! और चाहीए की उनकी सजा के वक्त मुसलमानो का एक गिरोह हाजीर हो!_*

*_📕 तर्जुमा :  क़ुरआन कंजुल इमान , सूर ए नुर आयत नं 2_*

*_(यह सजा गैर शादी-शुदा (जिसकी शादी न हुई हो..!) मर्द और औरत के लिये मुकर्रर है..!)_*

*_हुजुर  ﷺ इर्शाद फरमाते है..!_*

*_हदीस : ज़िना करने वाले शादी शुदा है तो खुले मैदान में संगसार किया जाए! (यानी पत्थरों से मार-मार कर जान से खत्म कर दिया जाए!) और गै़र शादी शुदा हो तो सौ (100) दुर्रे (कोडे, चाबुक) मारे जाए_*

_*हदीस : हजरत शोअबी रदि अल्लाहु तआला अन्हु ने हजरत अली रदि अल्लाहु तआला अन्हु से रिवायत की है की..*_

*_हजरत अली ने जुमा के रोज एक जानी औरत को संगसार किया तो फर्माया की मैने उसे रसुलुल्लाह ﷺ की सुन्नत के मुताबीक संगसार किया है!_*

*_📕बुखारी शरीफ, जिल्द नं 3, बाब नं 968, 980, हदीस नं 1715, सफा नं 615, 625_*

*_शादी शुदा जानी मर्द व औरत को संगसार करने और गैर शादी-शुदा जानी (जिनाकार) मर्द व औरत को सौ कोडे लगाने का हुक्म स्याहे सित्ता के अलावा अहादीस की तकरीबन सभी किताबो मे मौजुद है! जिससे इंकार की कोई गुंजाइश नही! यहा पर (Topic)  के लंबाई के खौफ से बुखारी शरीफ की उपर की दो हदिसों पर ही इत्तेफाक किया जाता है!_*

_*📮जारी रहेगा.....!*_
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                   *_ज़िना का बयान - 03_*
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*_🔘 जिना कैसे साबीत होंगा?_*

*_अल्लाह तबारक तआला इर्शाद फ़र्माता है..!_*

*وَ الَّذِیۡنَ یَرۡمُوۡنَ اَزۡوَاجَہُمۡ وَ لَمۡ  یَکُنۡ لَّہُمۡ شُہَدَآءُ  اِلَّاۤ  اَنۡفُسُہُمۡ فَشَہَادَۃُ اَحَدِہِمۡ  اَرۡبَعُ شَہٰدٰتٍۭ بِاللّٰہِ ۙ اِنَّہٗ  لَمِنَ الصّٰدِقِیۡنَ ﴿۶﴾*

*وَ الۡخَامِسَۃُ اَنَّ لَعۡنَتَ اللّٰہِ عَلَیۡہِ  اِنۡ کَانَ مِنَ  الۡکٰذِبِیۡنَ ﴿۷﴾*

*وَ یَدۡرَؤُا  عَنۡہَا الۡعَذَابَ اَنۡ تَشۡہَدَ اَرۡبَعَ شَہٰدٰتٍۭ بِاللّٰہِ ۙ اِنَّہٗ لَمِنَ الۡکٰذِبِیۡنَ ۙ﴿۸﴾*

*وَ الۡخَامِسَۃَ  اَنَّ غَضَبَ اللّٰہِ عَلَیۡہَاۤ  اِنۡ  کَانَ مِنَ  الصّٰدِقِیۡنَ ﴿۹﴾*

*_तर्जुमा आयत नं 6 : और वह जो अपनी औरतो को ऐब लगाए, और इनके पास अपने बयान के सिवा गवाह न हो तो, ऐसे किसी की गवाही यह है के,चार बार गवाही दे अल्लाह के नाम से के वह सच्चा है!_*

*_तर्जुमा आयत नं 7 : और पॉंचवी यह के अल्लाह की लानत हो इस पर अगर झुठा हो!_*

*_तर्जुमा आयत नं 8 : और औरत से युं सजा टल जाएंगी के वह अल्लाह का नाम लेकर चार बार गवाही दे के मर्द झुठा है!_*

*_तर्जुमा आयत नं 9 : और पॉंचवी युं के औरत पर गजब अल्लाह का अगर मर्द सच्चा हो!_*

*_📕 तर्जुमा :  क़ुरआन कंजुल इमान सूर ए नुर आयत नं, 6, 7, 8 और 9_*

*_किन लोगो की गवाही मोतब्बर मानी जाएंगी..?_*

_*जिना का सुबुत बाशरअ, नमाजी, परहेजगार, मुत्तकी, जो न कोई गुनाहे कबीरा करते हो, न किसी गुनाहे सगीरह पर इसरार रखते हो, न कोई बात खिलाफे मुरव्वत छिछोरे पन की करते हो, और न ही बाजारो मे खाते पिते हो, और न ही सडको पर पेशाब करते हो, ऐसे चार मर्दो की गवाही से जिना साबीत होता है! या जिना करने वाले के चार मर्तबा इकरार कर लेने से, फिर भी इमाम बार बार सवाल करेंगा और दर्याफ्त करेंगा की........ तेरी जिना से मुराद क्या है? कहॉं किया..? किससे किया? कब किया..? अगर इन सबको बयान कर दिया तो जिना साबीत होंगा वर्ना नही!*_

_*झुठी गवाही देने वालो की सजा : और गवाहो को खुल कर साफ साफ अपना चश्मदीद मुआइना बयान करना होंगा की हमने मर्द का बदन औरत के बदन के अंदर खास इस तरह देखा (जैसे  सुरमे दानी मे सलाई) अगर इन बातो मे से कोई भी बात कम होंगी मसलन चार गवाहो से कम हो या उन मे एक आला दर्जा का न हो, या मर्द तीन हो और औरते दस-बिस ही क्यो न हो, इन सब सुरतो मे यह गवाहिंयॉ नही मानी जाएंगी! अगर्चे इस किस्म की सौ दो सौ गवाहियॉ गुजरी हरगिज जिना का सुबुत न होंगा और ऐसी तोहमत लगाने वाले खुद ही सजा पाएंगे! और उन्हे बतौर सजा अस्सी कोडे लगाए जाएंगे!*_

*_📕 फतावा रज्वीया, जिल्द 5 सफा नं. 974_*

 *وَ الَّذِیۡنَ یَرۡمُوۡنَ الۡمُحۡصَنٰتِ ثُمَّ لَمۡ یَاۡتُوۡا بِاَرۡبَعَۃِ  شُہَدَآءَ فَاجۡلِدُوۡہُمۡ ثَمٰنِیۡنَ جَلۡدَۃً  وَّ لَا تَقۡبَلُوۡا لَہُمۡ شَہَادَۃً  اَبَدًا ۚ وَ اُولٰٓئِکَ ہُمُ  الۡفٰسِقُوۡنَ ۙ﴿۴﴾*

*_तर्जुमा: जो लोग पाक दामन औरतो पर जिना की तोहमत (इल्जाम) लगाए, फिर चार गवाह न पेश कर सके, तो इन्हे 80 कोडे लगाओ, और कभी भी इनकी गवाही कबुल न करो यह फासीक (झुठे) लोग है!_*

*_📕 तर्जुमा :  क़ुरआन कंजुल इमान सूर ए नुर आयत न. 4_*

_*आला हजरत इमाम अहमद रजा कादरी और हजरत सदरूल-अफाजील अल्लामा नईमुद्दीन मुरादाबादी रहमतुल्लाह अलैही ("फतावा रज्वीया") और तफ्सीर कुरआने करीम "खजाएनुल-इर्फान" मे गैर शादी-शुदा जानी मर्द और जानी औरत के सजा के बारे मे नक्ल  करते है..*_

*_"जानी मर्द को कोडे लगाते वक्त खडा किया जाए! और उसके तमाम बदन के कपडे उतार दिये जाए, सिवाए लुंगी के और उसके तमाम बदन पर कोडे लगाए जाए सिवाए चेहरा और शर्मगाह के! और औरत को कोडे लगाते वक्त खडा न किया जाए न उसके कपडे उतारे जाए अगर पोस्तीन या रूईदार कपडे पहने हुए हो तो उतार लिया जाए!"_*

_*📮पोस्ट ख़त्म.....!*_
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Al Waziftul Karima 👇🏻👇🏻👇🏻 https://drive.google.com/file/d/1NeA-5FJcBIAjXdTqQB143zIWBbiNDy_e/view?usp=drivesdk 100 Waliye ke wazai...