Monday, August 26, 2019



  _*बहारे शरीअत, हिस्सा- 01 (पोस्ट न. 010)*_
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_*अब कज़ा या तकदीर की तीन किस्में जिनके बारे में कुछ तफसील से लिखा जाता है*_

_*1). मुबरमे हक़ीक़ी : यह वह कज़ा है जिसकी तबदीली मुमकिन नहीं अगर इस बारे में अल्लाह के खास बन्दे कुछ कहते हैं तो उन्हें वापस कर दिया जाता है जैसा कि जब क़ौमे लूत पर फ़रिश्ते अजाब लेकर आये तो हजरत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने उन काफिरों को अजाब से बचाने के लिए कोशिश की और यहां तक कि, जैसा कि अल्लाह ﷻ ने क़ुर्आन शरीफ में इस बात को इस तरह बताया है कि :*_

_*📝तर्जमा - हमसे कौमे लूत के बारे में झगड़ने लगा। जो बेदीन यह कहते हैं कि अल्लाह के आगे कोई दम नहीं मार सकता और जो लोग अल्लाह की बारगाह में अल्लाह के महबूबों की कोई इज्जत नहीं मानते वह क़ुर्आन के इस टुकड़े को देखें कि अल्लाह ने अपने महबूब की इज्जत और शान को इन अल्फाज में बढ़ाया है कि इब्राहीम हम से झगड़ने लगा।*_

_*📕 बहारे शरीअत, हिस्सा 1, सफा 9*_
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  _*बहारे शरीअत, हिस्सा- 01 (पोस्ट न. 009)*_
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_*☝🏻अकीदा - अल्लाह तआला ने हर भलाई और बुराई को अपने अजली इल्म के मुवाफिक मुकद्दर कर दिया है यानी जैसा होने वाला था और जो जैसा करने वाला था उसने अपने इल्म से जाना और वही लिख लिया। इसका यह मतलब हरगिज नहीं कि जैसा उसने लिख दिया वैसा ही हमको करना पड़ता है बल्कि हम जैसा करने वाले थे वैसा उसने लिख दिया है। अगर अल्लाह ने जैद के जिम्मे में बुराई लिखी तो इसलिये कि जैद बुराई करने वाला था अगर जैद भलाई करने वाला होता तो वह उसके लिये भलाई लिखता। अल्लाह तआला के लिख देने ने किसी को मजबूर नहीं कर दिया। यह तकदीर की बातें हैं और तकदीर की बातों का इन्कार नहीं किया जा सकता। तकदीर के इन्कार करने वालों को हुजूर (सल्लल्लाहू तआ़ला अलैहि वसल्लम) ने इस उम्मत का मजूस बताया है।*_

_*☝🏻अक़ीदा : - कज़ा या तकदीर की तीन किस्में हैं ।*_

_*1). मुबरमें हक़ीक़ी : कि इल्म इलाही में किसी शय पर मुअल्लक नहीं।*_

_*2). मुअल्लके महज : जो फरिश्तों के लिखे में किसी चीज पर उसका मुअल्लक होना। जाहिर फरमा दिया गया है यानी जो दुआ या सदकों से बदल जाए।*_

_*3). मुअत्लके शबीह व मुबरम : जिसके मुअल्लक होने का फ़रिश्तों के लेखों में जिक्र नहीं लेकिन अल्लाह के इल्म में मुअल्लक है। इस कज़ा की घटना होने न होने का दोहरा उल्लेख किसी शर्त के साथ है।*_

_*📕 बहारे शरीअत, हिस्सा 1, सफा 8*_
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  _*बहारे शरीअत, हिस्सा- 01 (पोस्ट न. 008)*_
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_*☝🏻अक़ीदा :अल्लाह का इल्म, जुज़्यात, कुल्लियात, मोजूदात मादुमात मुमकिनात और मुहालात को मुहित (घेरे हुए) है यानी सबको अज़ल में जानता था और अब भी जानता है और अबद तक जानेगा ! चीज़े बदल जाया करती है लेकिन अल्लाह तआला का इल्म नही बदलता ! वह दिलों की बातें और वसवसों को जानता है यहां तक कि उसके इल्म की कोई थाह नही !*_

_*☝🏻अक़ीदा : वह हर खुली और ढकी चीज़ों जानता है और उसका इल्म ज़ाती है और ज़ाती इल्म उसी के लिए ख़ास है ! जो कोई ढकी छिपी या जाहिरी चीज़ों का ज़ाती इल्म अल्लाह के सिवा किसी दूसरे के लिए साबित करे वह क़ाफ़िर है ! क्योंकि किसी दूसरे के लिए ज़ाती इल्म मानने का मतलब यह है कि बग़ैर खुदा के दिये खुद हासिल हो !*_

_*☝🏻अक़ीदा : अल्लाह ही हर तरह की ज़ातों और कामों की पैदा करने वाला है ! हक़ीक़त में रोज़ी पहुचाने वाला सिर्फ अल्लाह ही है और फ़रिश्ते रोज़ी पहुचाने के ज़रिए हैं !*_

_*📕 बहारे शरीअत, हिस्सा 1, सफा 8*_
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  _*बहारे शरीअत, हिस्सा- 01 (पोस्ट न. 007)*_
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_*☝🏻अक़ीदा : हयात, क़ुदरत, सुनना, देखना, कलाम, इल्म और इरादा उसकी ज़ाती सिफ़तें हैं मगर आंख कान और जुबान से उसका सुनना, देखना और कलाम करना नही क्योंकि यह सब जिस्म  हैं और वह जिस्म से पाक है अल्लाह हर धीमी से धीमी आवाज़ को सुनता है ! वह ऐसी बारीक़ चीज़ों को भी देखता है जो किसी खुर्दबीन या दूरबीन से न देखी जा सकें बल्कि उसका देखना और सुनना इन्हीं चीज़ों पर मुनहसिर (निर्भर) नहीं बल्कि वह हर मौजूद को देखता और सुनता है !*_

_*☝🏻अक़ीदा : अल्लाह की दूसरी सिफ़तों की तरह उसका कलाम भी क़दीम है ! हादिस और मख़लूक़ नही जो कुरान शरीफ़ को मख़लूक़ माने उसे हमारे इमाम आज़म हज़रत इमामे अबु हनीफ़ा, दूसरे ईमामों, और सहाबा रदियल्लाहु तआला अन्हुम ने काफ़िर कहा है !*_

_*☝🏻अक़ीदा : अल्लाह का कलाम आवाज़ से पाक है और यह कुरान शरीफ़ जिसकी हम अपनी ज़ुबान से तिलावत करते हैं और किताबों तथा कागज़ में लिखते लिखाते है उसी का बिना आवाज़ के क़दीम कलाम है ! हमारा पढ़ना लिखना और यह हमारी आवाज़ हादिस और जो हमने सुना क़दीम ! हमारा ययद करना हादिस और हमने जो याद किया वो क़दीम ! इसे यूं समझो की तजल्ली हादिस और मुतजल्ली (तजल्ली डालने वाला) क़दीम है !*_

_*📕 बहारे शरीअत, हिस्सा 1, सफा 7, 8*_
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  _*बहारे शरीअत, हिस्सा- 01 (पोस्ट न. 006)*_
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_*☝🏻अकीदा :- अल्लाह हर कमाल और खूबी का जामेअ् है यानी उसमें सारी खूबियाँ हैं और अल्लाह हर उस चीज से पाक है जिसमें कोई भी ऐब बुराई या कमी हो यानी उसमें ऐब और नुकसान का होना मुहाल है।*_

_*बल्कि जिसमें न कोई कमाल हो और न कोई नुकसान वह भी उसके लिए मुहाल है।*_

_*मिसाल के तौर पर झूट बोलना, दगा देना, खियानत करना, जुल्म करना और जिहालत और बेहयाई वगैरा ऐब अल्लाह के लिए मुहाल है।*_

_*और यह कहना कि झूट पर कुदरत इस माना कर कि वह खुद झूट बोल सकता है मुहाल को मुमकिन ठहराना और खुदा को ऐबी बताना है बल्कि खुदा का इन्कार करना है*_

_*और यह समझना कि यदि वह मुहाल पर कादिर न होगा तो उसकी कुदरत नाकिस रह जायेगी बिल्कुल बातिल है यानी बेअस्ल और बेकार की बात है कि उसमें कुदरत का क्या नुकसान हैं। कमी तो उस मुहाल में है कि कुदरत से तअल्लुक की उसमें सलाहियत नहीं।*_

_*📕 बहारे शरीअत, हिस्सा 1, सफा 8*_

_*📮जारी रहेगा.....*_
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  _*बहारे शरीअत, हिस्सा- 01 (पोस्ट न. 005)*_
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_*☝🏻अक़ीदा : वह हर मुमकिन पर क़ादिर है और कोई मुमकिन उसकी क़ुदरत से बाहर नही ! जो चीज़ मुहाल हो अल्लाह तआला उससे पाक है कि उसकी उसे शामिल हो क्योंकि मुहाल उसे कहतें हैं जो मोजूद न हो सके और जब उस पर क़ुदरत होगी तो मौजूद हो सकेगा ! ओर जब मौजूद हो सकेगा तो मुहाल कैसे हो सकेगा ! इसे इस तरह समझिए जैसे कि दूसरा खुदा मुहाल है यानी दूसरा खुदा हो ही नही सकता !*_

_*अगर दूसरा खुदा होना क़ुदरत के मातहत (अधीन) हो तो मौजुद हो सकेगा तो मुहाल नही रहा ! और दूसरे खुदा को मुहाल न मानना अल्लाह के एक होने का इनकार है !*_

_*यूँही अल्लाह का फ़ना हो जाना मुहाल है ! अगर अल्लाह तआला के फ़ना होने को क़ुदरत में दाख़िल माना जाए तो अल्लाह के अल्लाह होने से ही इनकार करना है !*_

_*एक बात समझने की है कि हर वह चीज़ जो अल्लाह की क़ुदरत कर मातहत हो वह मौजूद हो ही जाए यह कोई जरूरी नही ! जैसे कि यह मुमकिन है कि सोने चांदी की ज़मीन हो जाये लेकिन ऐसा नही है ! लेकिन ऐसा हो जाना हर हाल में मुमकीन रहेगा चाहे ऐसा कभी न हो !*_

_*📕 बहारे शरीअत, हिस्सा 1, सफा 7*_

_*📮जारी रहेगा.....*_
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  _*बहारे शरीअत, हिस्सा- 01 (पोस्ट न. 004)*_
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_*☝🏻अक़ीदा - जिस तरह अल्लाह तआला की ज़ात क़दीम, अज़ली व अबदी है उसी तरह उसकी सिफ़तें भी क़दीम, अज़ली और अबदी है !*_

_*☝🏻अक़ीदा - अल्लाह की कोई सिफ़त मख़लूक़ नही न ज़ेरे क़ुदरत दाख़िल !*_

_*☝🏻अक़ीदा - अल्लाह की जात और सिफ़ात के अलावा सब चीजें हादिस यानी पहले न थीं अब मौजूद हैं !*_

_*☝🏻अक़ीदा - जो अल्लाह की सिफ़तों को मख़लूक़ कहे य्या हादिस बताये व ग़ुमराह और बद्दीन है !*_

_*☝🏻अक़ीदा - जो आलम में से कोई चीज़ को ख़ुद से मौजूद माने या उसके हादिस होने में शक़ करे वह क़ाफ़िर है !*_

_*☝🏻अक़ीदा - अल्लाह तआला न किसी का बाप है न किसी का बेटा और न उसके लिए कोई बीवी ! यदि कोई अल्लाहः के लिये बाप, बेटा, या जोरू(बीवी) बताये वह भी क़ाफ़िर है ! बल्कि जो मुमकिन भी बताए वह गुमराह बद्दीन है !*_

_*📕 बहारे शरीअत, हिस्सा 1, सफा 6-7*_

_*📮जारी रहेगा.....*_
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Al Waziftul Karima 👇🏻👇🏻👇🏻 https://drive.google.com/file/d/1NeA-5FJcBIAjXdTqQB143zIWBbiNDy_e/view?usp=drivesdk 100 Waliye ke wazai...